सरिस्का बना देश का ‘टाइगर मॉडल’, 18 साल की सफलता पर राष्ट्रीय मंथन, राजस्थान ने मांगा यह प्रोजेक्ट

अलवर. राजस्थान के अलवर स्थित सरिस्का टाइगर रिजर्व में “बाघ पुनर्स्थापन अवसर एवं चुनौतियां” विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राजस्थान सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला में देशभर के बाघ संरक्षण विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, वन अधिकारी और विभिन्न राज्यों के प्रधान मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक शामिल हुए. कार्यक्रम का उद्घाटन केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने किया, जबकि राजस्थान के वन मंत्री संजय शर्मा समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे.
यह कार्यशाला ऐसे समय आयोजित हुई है, जब सरिस्का में बाघ पुनर्स्थापन परियोजना ने 18 वर्ष पूरे कर लिए हैं. वर्ष 2008 में रणथंभौर से केवल तीन बाघों के स्थानांतरण के साथ शुरू हुई यह परियोजना आज दुनिया के सबसे सफल वैज्ञानिक बाघ पुनर्स्थापन कार्यक्रमों में गिनी जाती है. वर्तमान में सरिस्का में बाघों की संख्या बढ़कर 56 तक पहुंच चुकी है. केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरिस्का का 18 वर्षों का सफर ऐतिहासिक रहा है. बेहतर मॉनिटरिंग, मजबूत हैबिटेट प्रबंधन और संस्थागत प्रयासों के कारण सरिस्का आज देश ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए भी एक अनुकरणीय मॉडल बन चुका है.
जहां बाघों की संख्या नहीं बढ़ रही वहां अपनाए जाएंगे विशेष रणनीति
उन्होंने कहा कि 20 वर्ष पूरे होने पर इस उपलब्धि का विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा. उन्होंने टाइगर रिजर्व के आसपास रहने वाले ग्रामीणों के कौशल विकास, सामुदायिक भागीदारी, जल संरक्षण, पक्षी संरक्षण और प्रकृति आधारित पर्यटन को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया. साथ ही कहा कि जिन टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ रही है, वहां विशेष रणनीति के साथ काम किया जाएगा. राजस्थान के वन मंत्री संजय शर्मा ने कहा कि एक समय सरिस्का में बाघ पूरी तरह समाप्त हो गए थे, लेकिन आज यहां 56 बाघों का कुनबा तैयार हो चुका है और जल्द ही यह संख्या 60 तक पहुंचने की उम्मीद है. उन्होंने बाघ संरक्षण में ग्रामीणों की भागीदारी को सबसे अहम बताते हुए राजस्थान के लिए चीता पुनर्स्थापन परियोजना की भी मांग रखी.
पुनर्स्थापन कार्यक्रम ने देश में बाघ संरक्षण की नई दिशा तय की
एनटीसीए के मानद सचिव संजय कुमार ने कहा कि वर्ष 2004 में सरिस्का से बाघों के समाप्त होने के बाद संरक्षण व्यवस्था में बड़े सुधार किए गए. इसके बाद वर्ष 2008 में शुरू हुए पुनर्स्थापन कार्यक्रम ने देश में बाघ संरक्षण की नई दिशा तय की. उन्होंने कहा कि अब सरिस्का केवल बाघों का संरक्षण क्षेत्र नहीं, बल्कि ‘सोर्स एरिया’ बन चुका है, जहां से बाघ अन्य क्षेत्रों की ओर भी जा सकते हैं. कार्यशाला में इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस के महानिदेशक डॉ. एस.पी. यादव ने बाघ संरक्षण के लिए मजबूत आधारभूत ढांचे, वैज्ञानिक मॉनिटरिंग और क्षमता निर्माण पर जोर दिया.
भारत में हो रहा दुनिया के 70 प्रतिशत जंगली बाघों का संरक्षण
उन्होंने कहा कि रूस में बाघ पुनर्स्थापन का प्रयास सफल नहीं हो पाया, लेकिन राजस्थान ने इसे सफल बनाकर दुनिया के सामने उदाहरण पेश किया है. भारत आज दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत जंगली बाघों का संरक्षण कर रहा है. देश में वर्तमान में 58 टाइगर रिजर्व हैं, जहां अनुमानित 3,682 बाघ निवास करते हैं. पिछले एक दशक में टाइगर रिजर्व की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो गई है. कार्यशाला में इस बात पर भी जोर दिया गया कि भविष्य में केवल बाघों की संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र, वन्यजीव आवास, जल स्रोतों और स्थानीय समुदायों के समग्र विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा.



