National

होर्मुज का टंटा तो बस ट्रेलर, अगले साल आएगी असली तबाही, भारत भी नहीं बचेगा – el nino impact global food crisis 2027 hormuz strait india in danger

होमफोटोदेश

PHOTOS: होर्मुज का टंटा ट्रेलर, अगले साल आएगी असली तबाही, भारत भी नहीं बचेगा

Last Updated:August 18, 2026, 10:13 IST

El Nino Global Food Crisis: अल नीनो मुंह बाए खड़ा है. मौसम विज्ञानियों का कहना है कि अल नीनो साल के अंत में असली रंग में आएगा. इसके बाद तबाही और संकट का नया दौर शुरू होने की आशंका है. अल नीनो की वजह से तापमान बढ़ेगा और बारिश भी कम होगी. हालांकि, भारत पर अभी तक अल नीनो का खास असर नहीं पड़ा है, लेकिन सर्दी के दिनों में इसका प्रभाव दिखने की प्रबल संभावना है. एक्‍सपर्ट अब अल नीनो की वजह से होने वाले एक और ग्‍लोबल क्राइसिस की आशंका जता रहे हैं. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अल नीनो की वजह से साल 2027 को ग्‍लोबल फूड क्राइस‍िस यानी खाद्य संकट आ सकता है. बड़ा सवाल यह है कि क्‍या भारत भी इससे प्रभावित होगा.

El Nino Global Food Crisis: अल नीनो की संभावित असाधारण तीव्रता, युद्ध के कारण सप्‍लाई चेन में बढ़ता दबाव और खाद एवं ईंधन की कीमतों में उछाल दुनिया को साल 2027 में गंभीर खाद्य संकट की ओर धकेल सकते हैं. जेपी मॉर्गन समेत कई संस्थानों ने चेतावनी दी है कि जलवायु संबंधी झटकों का असर फसलों की पैदावार, खाद्य कीमतों और महंगाई पर अगले साल तक बना रह सकता है. ‘न्‍यूजवीक’ की रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना महामारी के बाद से लगातार सामने आ रहे आपूर्ति झटकों ने वैश्विक खाद्य प्रणाली की कमजोरियों को और गहरा कर दिया है. जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट Food Security Is National Security: A Compounding Storm के मुताबिक अगला वैश्विक खाद्य संकट पहले से आकार ले रहा हो सकता है. रिपोर्ट में इसके पीछे ‘फाइव डब्ल्यू’ यानी War, Weather, Warehousing, Water और Waste को प्रमुख कारक बताया गया है. सीनियर इकोनोमिस्‍ट नोरा स्जेंटिवान्यी के अनुसार खाद्य महंगाई का दबाव 2027 की पहली छमाही तक बना रह सकता है और इस दौरान खाद्य महंगाई की दर 2026 की पहली छमाही के 2.8 प्रतिशत से बढ़कर करीब 5 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. (फोटो: AP)

अल नीनो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने की स्थिति है. इसके कारण दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश और तापमान के सामान्य पैटर्न में बड़े बदलाव आते हैं. अमेरिका के दक्षिणी हिस्से और गल्फ कोस्ट में आम तौर पर अधिक बारिश, जबकि उत्तरी अमेरिका और कनाडा में अपेक्षाकृत गर्म और शुष्क परिस्थितियां देखने को मिल सकती हैं. अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर के मुताबिक अक्टूबर से दिसंबर के बीच अल नीनो के ऐतिहासिक रूप से मजबूत स्तर तक पहुंचने की 69 प्रतिशत संभावना जताई गई है. यदि यह स्थिति ‘सुपर अल नीनो’ में बदलती है तो कई महाद्वीपों में महीनों तक तापमान और वर्षा के पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं. इसका सीधा असर कृषि, जल उपलब्धता और मछली के उत्पादन पर पड़ सकता है. (फोटो: AP)

संयुक्त राष्ट्र की चेतावनियों के मुताबिक अल नीनो मध्य अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया, साहेल और दक्षिणी अफ्रीका में सूखे का जोखिम बढ़ाता है, जबकि पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में बाढ़ की आशंका बढ़ सकती है. ऐसे में जिन देशों की अर्थव्यवस्था कृषि पर अधिक निर्भर है, वहां उत्पादन में गिरावट का असर खाद्य कीमतों और ग्रामीण आय दोनों पर पड़ सकता है. जेपी मॉर्गन ने कहा है कि अल नीनो का सबसे बड़ा असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है. खासकर एशिया और लैटिन अमेरिका के वे देश ज्यादा संवेदनशील हैं जहां कृषि का अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है. भारत, इंडोनेशिया, ब्राजील, कोलंबिया, ताइवान और दक्षिण कोरिया को संवेदनशील अर्थव्यवस्थाओं में गिना गया है. (फोटो: Reuters)

Add as Preferred Source on Google

प्रोक्योरमेंट इंटेलिजेंस फर्म बेरो की वरिष्ठ प्रबंधक मल्लिगेश्वरी पन्नीरसेल्वम के मुताबिक अल नीनो भारत और दुनिया में चावल की पैदावार को प्रभावित कर सकता है. उनके आकलन में उत्पादन में कमी और उपलब्धता घटने की स्थिति में वैश्विक चावल कीमतों में 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है. भारत के लिए जोखिम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चावल घरेलू खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक बाजार में देश के निर्यात का भी प्रमुख हिस्सा है. भारत में अल नीनो का खतरा कमजोर मानसून की आशंका के साथ जुड़ रहा है. पन्नीरसेल्वम के अनुसार 2026-27 सीजन में गन्ने का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है और इसमें 6 प्रतिशत तक कमी आने की संभावना है. इसका असर चीनी की कीमतों और संबंधित खाद्य उत्पादों की महंगाई पर पड़ सकता है. (फोटो: PTI)

जलवायु जोखिम के साथ भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक खाद्य आपूर्ति की चुनौती को और जटिल बना दिया है. रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान से वैश्विक व्यापार प्रभावित होने का खतरा है. मध्य पूर्व दुनिया के पोटाश और यूरिया जैसे महत्वपूर्ण उर्वरकों के निर्यात में बड़ी भूमिका निभाता है. यदि इनकी आपूर्ति प्रभावित होती है तो किसानों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है और अगली फसल की पैदावार पर भी असर पड़ सकता है. मानवीय सहायता संगठन मर्सी कॉर्प्स ने 30 जून को चेतावनी दी थी कि ईरान युद्ध और मजबूत होते अल नीनो का मेल खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा झटका बन सकता है. संगठन के मुताबिक उर्वरक और ईंधन से जुड़े झटके पहले ही कमजोर खाद्य प्रणालियों में बुआई के महत्वपूर्ण समय से टकरा रहे हैं. यदि अभी हस्तक्षेप नहीं किया गया तो इसका असर इस साल की छोटी फसल, महंगे खाद्य पदार्थ और 2027 में बढ़ती भूख के रूप में सामने आ सकता है.

खाद्य संकट का खतरा केवल खेतों तक सीमित नहीं है. ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के मुताबिक अल नीनो के कारण पनामा नहर के जलस्तर पर दबाव पड़ सकता है. इस साल जहाजों के ड्राफ्ट को कई बार सीमित किया गया है. इसका अर्थ है कि कम माल लेकर जहाजों को गुजरना पड़ सकता है, जिससे परिवहन लागत और वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर दबाव बढ़ सकता है. इसी दौरान दुनिया के प्रमुख कंटेनर बंदरगाहों पर तूफानों से ऑपरेशन बाधित होने की घटनाएं भी सामने आई हैं. खाद्य उत्पादन वाले क्षेत्रों से उपभोक्ता बाजार तक पहुंचने में यदि देरी होती है तो उत्पादन उपलब्ध होने के बावजूद स्थानीय बाजारों में कीमतें बढ़ सकती हैं. (फोटो: Reuters)

विशेषज्ञों के मुताबिक अल नीनो का प्रभाव तुरंत खुदरा कीमतों में पूरी तरह दिखाई नहीं देता. खेती से जुड़ी आपूर्ति और खुदरा बाजार के बीच मौजूदा अनुबंध, भंडार और खरीदारों की हेजिंग व्यवस्था कुछ समय तक झटके को रोक सकती है. लेकिन जैसे-जैसे भंडार घटते हैं और नई फसल का उत्पादन प्रभावित होता है, कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स ने भी कहा है कि पिछले अल नीनो घटनाक्रमों का सबसे गंभीर असर अक्सर उस साल के बाद दिखाई दिया, जिसमें अल नीनो चरम पर पहुंचा था. इसी वजह से 2027 को सबसे अधिक जोखिम वाला साल माना जा रहा है. बेरो के आकलन के मुताबिक, सप्‍लाई चेन में देरी, भंडार, सरकारी नीतियों और महंगाई के असर के कारण बड़े आर्थिक झटकों का प्रभाव करीब 24 महीने तक बना रह सकता है. गंभीर परिस्थितियों में इसका असर 2027 के अंत तक खिंच सकता है.

यानी चुनौती केवल एक मौसमीय घटना की नहीं है. यदि मजबूत अल नीनो, कमजोर मानसून, युद्ध, उर्वरक आपूर्ति में बाधा और परिवहन संकट एक साथ बने रहे तो दुनिया को उत्पादन घटने, खाद्य कीमतें बढ़ने और गरीब देशों में भूख बढ़ने की दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है. यही कारण है कि विशेषज्ञ अब 2027 को वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए निर्णायक वर्ष के रूप में देख रहे हैं. (फोटो: AP)

न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।First Published :

August 18, 2026, 10:13 IST

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj