Rajasthan

Success Story: सरहदें बदलीं, लेकिन हुनर नहीं… बाड़मेर की पाक विस्थापित महिलाओं की अमेरिका-यूरोप तक पहुंची सूप-कढ़ाई

Barmer: रेगिस्तानी जिला बाड़मेर, जो कभी भारत-पाकिस्तान सीमा पर केवल सामरिक महत्व के लिए जाना जाता था, आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हस्तशिल्प का एक बड़ा केंद्र बनकर उभर रहा है. सरहदें बदल गईं, मुल्क बदल गए, लेकिन पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर आज भी बिल्कुल वैसा ही जिंदा है. पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आए सैकड़ों हिंदू परिवारों की महिलाओं ने अपनी कला को ही अपनी तकदीर और पहचान बना लिया है.

ये विस्थापित परिवार आज भी अपने हाथों से कपड़ों पर सुई-धागे के जरिए पारंपरिक ‘सूप-कढ़ाई’ (सूफ कढ़ाई) का जादुई संसार रच रहे हैं. कभी विभाजन और विस्थापन के दंश के बाद रोजी-रोटी का एकमात्र जरिया रही यह बारीक कारीगरी अब इन परिवारों की सशक्त पहचान बन चुकी है. इन महिलाओं की कड़ी मेहनत और बारीकी से तैयार किए गए उत्पाद भारत की सीमाएं लांघकर सात समंदर पार विदेशों तक पहुंच रहे हैं, जहां फैशन और होम डेकोर के बाजार में इनकी भारी डिमांड है.

रंग-बिरंगे धागों और कांच का जादू: हस्तशिल्प की अनूठी विरासतबाड़मेर में रह रही ये विस्थापित महिलाएं रंग-बिरंगे धागों, छोटे-छोटे चमकदार कांच (मिरर वर्क) और ज्यामितीय व आकर्षक डिजाइनों से कपड़ों पर कलाकृतियां उकेरती हैं. श्योर (SURE) संस्थान के सहयोग से इस विरासत को सहेजते हुए ये महिलाएं न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि अपनी इस पुश्तैनी संस्कृति को नई पीढ़ी की बेटियों तक भी पूरी शिद्दत से पहुंचा रही हैं.

इनके द्वारा तैयार किए जाने वाले बैग, वॉल हैंगिंग, कुशन कवर, पारंपरिक परिधान, बेडशीट और विभिन्न सजावटी वस्तुएं कला प्रेमियों को पहली ही नजर में अपना दीवाना बना लेती हैं. इन उत्पादों की सबसे बड़ी और खास यूएसपी (USP) यह है कि इनमें किसी भी आधुनिक मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि यह पूरी तरह से कारीगर महिलाओं के हाथों की शुद्ध मेहनत, धैर्य और उनके नायाब हुनर का जीवंत परिणाम है.

अमेरिका और यूरोप के बाजारों में धूम: श्योर संस्थान ने बदला भाग्यश्योर संस्थान से जुड़ी इन महिलाओं को आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप विशेष प्रशिक्षण दिया गया, जिसने इनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल कर रख दिया. श्योर संस्थान की अध्यक्ष लता कछवाहा के मुताबिक, इन नायाब हस्तशिल्प उत्पादों की मांग न केवल राजस्थान के स्थानीय मेलों में है, बल्कि दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, बेंगलुरु और देश के अन्य सभी महानगरों में भी सिर चढ़कर बोल रही है.

देशी बाजारों के साथ-साथ विदेशी पर्यटक और बड़े निर्यातक (एक्सपोर्टर्स) भी इस बारीक सूप-कढ़ाई की कला के कायल हो चुके हैं. वर्तमान में यहां से तैयार होकर कई प्रीमियम उत्पाद सीधे अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और यूरोप के अन्य विकसित देशों के शोरूम्स तक पहुंच रहे हैं, जिससे इन विस्थापित महिलाओं को अपनी कला के लिए एक बड़ा वैश्विक मंच और अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल हो रही है.

बाड़मेर के इन सरहदी गांवों में गूंज रही है स्वावलंबन की गूंजबाड़मेर जिले के सुदूर और भारत-पाक सीमा से सटे ग्रामीण इलाकों जैसे धनाऊ, चौहटन, रामसर, गडरारोड़, भोजारिया, बावड़ी, बाखासर, सेड़वा, और आलमसर सहित इसके आसपास के दर्जनों गांवों की ढाणियों में आज हर दूसरे घर में महिलाएं इस पारंपरिक सुई-कढ़ाई के काम में जुटी नजर आती हैं. पाकिस्तान से आए जिन परिवारों ने कभी अपना पूरा घर-बार, जमीन-जायदाद छोड़ने की भारी मानसिक और आर्थिक मजबूरी झेली थी, आज वही परिवार किसी के आगे हाथ फैलाने के बजाय अपने इसी अद्भुत हुनर के दम पर पूरे सम्मान के साथ समाज में अपनी एक नई और सशक्त पहचान स्थापित कर रहे हैं.

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj