राजस्थान में OBC की 92 जातियों में किसका कितना दबदबा? सर्वे ने खोली पूरी तस्वीर

जयपुर. राजस्थान में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की जातियों की राजनीतिक स्थिति को लेकर सामने आई आयोग की रिपोर्ट ने प्रदेश के जातीय और राजनीतिक समीकरणों की एक अलग तस्वीर पेश की है. रिपोर्ट के मुताबिक ओबीसी में शामिल 92 जातियों में से महज 11 जातियां ऐसी हैं, जिनकी राजनीति में मजबूत मौजूदगी दिखाई देती है. इन 11 जातियों के 1,000 से ज्यादा परिवारों को राजनीतिक भागीदारी मिली है या इन समुदायों से जुड़े जनप्रतिनिधि चुनाव जीतकर सामने आए हैं. इसके उलट बड़ी संख्या में ऐसी जातियां भी हैं, जिनकी राजनीतिक हिस्सेदारी बेहद सीमित है.
कुछ जातियों के तो 100 से भी कम परिवार राजनीति में भागीदार बताए गए हैं. यह रिपोर्ट पंचायतीराज और शहरी निकायों में आबीसी आरक्षण की तस्वीर तय करने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है. आयोग ने जातियों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए प्रदेशभर में सर्वे और फील्ड विजिट किए. रिपोर्ट में राजनीतिक भागीदारी के साथ सरकारी नौकरियों, BPL परिवारों और साक्षरता जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया है.
जाट सबसे आगे, गुर्जर दूसरे नंबर पर
राजस्थान ओबीसी आयोग के रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक भागीदारी वाले परिवारों की संख्या देखें तो जाट और जाट सिख सबसे ऊपर हैं. इनके 22,666 परिवारों को राजनीतिक भागीदारी मिली है. इसके बाद गुर्जर समाज के 9,628 परिवार और माली-सैनी-बागवान समाज के 5,994 परिवार बताए गए हैं. कुम्हार-प्रजापति और कुमावत समाज के 5,823, अहीर-यादव के 3,826 तथा बढ़ई-जांगीड़-सुथार समाज के 2,725 परिवार राजनीतिक भागीदारी वाली प्रमुख जातियों में शामिल हैं. विश्नोई, कलबी-पटेल-आंजणा और अन्य समुदायों की भी रिपोर्ट में स्थिति दर्ज की गई है.
कई जातियों की राजनीति में हिस्सेदारी 100 परिवार से भी कम
रिपोर्ट का दूसरा पहलू यह है कि ओबीसी की कई जातियां राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में काफी पीछे हैं. 100 से 999 परिवारों वाली श्रेणी में तेली-हम्माल के 932, गडरिया-गाड़री-घोसी के 845 और स्वर्णकार-सुनार-सोनी के 821 परिवार राजनीतिक भागीदारी वाले बताए गए हैं. वहीं 100 से कम परिवारों वाली श्रेणी में राठ समाज के 94, गाड़ीत-नागौरी के 86 और खेलदार के 73 परिवार शामिल हैं. कुछ जातियों की राजनीतिक भागीदारी इससे भी कम है. मदारी-बाजीगर के 8, चूनगर और मोची के 7-7 तथा नट और भोपा के 5-5 परिवार राजनीतिक भागीदारी वाले बताए गए हैं.
सरकारी नौकरी में भी बड़ा अंतर
आयोग के आंकड़ों में सरकारी नौकरियों में जातियों की हिस्सेदारी का भी अंतर सामने आया है. जाट-जाट सिख समाज के 1,81,792 लोग सरकारी सेवा में बताए गए हैं. गुर्जर के 44,475, माली-सैनी-बागवान के 42,912 और कुम्हार-कुमावत के 40,782 लोग सरकारी नौकरी में हैं. दूसरी ओर कुछ समुदायों में सरकारी नौकरी की संख्या बेहद कम है. सूची के मुताबिक तेली-सपेरा गैर हिंदू जाति में सरकारी नौकरी वाले लोगों की संख्या शून्य बताई गई है. सिरकीवाल के 2, हेला के 5 और गाडरिया-न्यागर के 6 लोग सरकारी सेवा में बताए गए हैं.
आरक्षण तय करने में रिपोर्ट की अहम भूमिका
आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पंचायतीराज संस्थाओं और शहरी निकायों में ओबीसी आरक्षण की तस्वीर तय की जानी है. किस निकाय में कौन-सा पद या वार्ड ओवीसी के लिए आरक्षित होगा, इसका फैसला सरकार और प्रशासन करेंगे. आयोग के अध्यक्ष रिटायर्ड जज एमएल भाटी का कहना है कि रिपोर्ट बंद कमरे में बैठकर तैयार नहीं की गई. प्रदेशभर में फील्ड विजिट कर लोगों से संवाद किया गया और 19 बिंदुओं पर सर्वे के आधार पर आंकड़े जुटाए गए. रिपोर्ट में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन को भी देखा गया है. वहीं नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने सरकार से रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की है. उनका कहना है कि जनता को रिपोर्ट में सामने आए आंकड़ों की जानकारी मिलनी चाहिए. रिपोर्ट सामने आने के बाद ओबीसी की कम प्रतिनिधित्व वाली जातियों को राजनीतिक हिस्सेदारी देने और उन्हें चुनावी टिकट में अधिक अवसर देने को लेकर भी नई सियासी बहस शुरू होने की संभावना है.



