Rajasthan

यहां कभी शाही महफिलें सजती थीं, अब पसरा है सन्नाटा… धौलपुर की 180 साल पुरानी बारहदरी अब खतरे में!

Last Updated:May 05, 2026, 17:03 IST

Dhaulpur Barahdari: यदि हम ढूंढने लगें तो इस देश के कोने-कोने में हमें धरोहर मिल जाएंगी. भारत देश शुरू से ही समृद्ध रहा है. लेकिन समय के साथ लोग अपनी जिम्मेदारी और मूल भूल गए. धौलपुर के बाड़ी में 1840-41 में बनी महाराज राणा भगवंत सिंह की ऐतिहासिक बारहदरी कभी शान हुआ करती थी. आज यह उपेक्षा से जर्जर है. इतिहासकार अरविंद शर्मा ने संरक्षण और पर्यटन विकास की मांग की है.

धौलपुर. राजस्थान अपनी ऐतिहासिक इमारतों और शानदार स्थापत्य कला के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है. यहां आज भी कई ऐसी विरासतें मौजूद हैं, जो सैकड़ों साल बाद भी अपनी मजबूती और खूबसूरती से लोगों को हैरान कर देती हैं. इन्हीं धरोहरों में से एक है धौलपुर जिले के बाड़ी उपखंड में स्थित महाराज बाग की ऐतिहासिक बारहदरी. यह बारहदरी आज भी धौलपुर रियासत की समृद्ध कला, संस्कृति और इतिहास की गवाही देती नजर आती है.

महाराज बाग में स्थित इस बारहदरी का निर्माण वर्ष 1840-41 में धौलपुर रियासत के महाराज राणा भगवंत सिंह ने करवाया था. इतिहासकार अरविंद शर्मा के अनुसार महाराज राणा भगवंत सिंह को धौलपुर रियासत की स्थापत्य कला का जनक माना जाता है. उनके शासनकाल में धौलपुर में कई भव्य और ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण हुआ, जिनमें यह बारहदरी भी शामिल है. यह इमारत धौलपुर के प्रसिद्ध लाल और सफेद बलुआ पत्थर से बनाई गई है, जो इसकी पहचान को और खास बनाती है.

बारीक नक्काशी और अनोखी बनावट इसकी पहचानबारहदरी की सबसे बड़ी खासियत इसकी बारीक नक्काशी और अनोखी कलाकारी है. पत्थरों पर बेहद खूबसूरती से उकेरी गई डिजाइन आज भी लोगों को आकर्षित करती है. करीब 180 साल बाद भी इसकी कला पत्थरों में जिंदा नजर आती है. इतिहासकार अरविंद शर्मा बताते हैं कि इस बारहदरी का निर्माण मदारीराम नाम के शिल्पी ने किया था. उनकी कारीगरी इतनी शानदार थी कि यह इमारत आज भी पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को अपनी ओर खींचती है. बारहदरी नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इस इमारत में कुल 12 दरवाजे बनाए गए हैं और सभी दरवाजों पर एक जैसी नक्काशी की गई है.

शाही दौर में रहा कला और संगीत का केंद्रमहाराज बाग के घने पेड़ों के बीच बनी यह बारहदरी कभी अपने वैभव के लिए जानी जाती थी. बताया जाता है कि उस समय यहां एक लाख से अधिक पेड़-पौधे मौजूद थे, जिससे पूरा परिसर हरियाली से भरा रहता था. इतिहासकारों के अनुसार यह बारहदरी धौलपुर रियासत का शाही विश्राम गृह हुआ करती थी. महाराज राणा भगवंत सिंह अपने परिवार के साथ यहां समय बिताते थे और संगीत का आनंद लेते थे. इटावा, जोरा और आसपास की रियासतों से कलाकार यहां आकर प्रस्तुतियां देते थे. उस दौर में यह स्थान कला, संगीत और शाही संस्कृति का प्रमुख केंद्र माना जाता था.

करीब 35 साल पहले प्रसिद्ध टीवी सीरियल सुरभि की शूटिंग भी इसी ऐतिहासिक बारहदरी में हुई थी. उस समय यह इमारत पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रही थी. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह धरोहर कभी कितनी प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण रही होगी.

उपेक्षा के कारण खतरे में विरासतआज यह ऐतिहासिक इमारत उपेक्षा का शिकार होती नजर आ रही है. जहां कभी शाही महफिलें सजती थीं, वहां अब आवारा पशुओं का जमावड़ा दिखाई देता है. इमारत के आसपास गंदगी और गोबर जमा हो गया है, जिससे इसकी स्थिति लगातार खराब हो रही है. धीरे-धीरे यह धरोहर अपनी पहचान खोती जा रही है.

इतिहासकार अरविंद शर्मा का कहना है कि यदि समय रहते इसके संरक्षण के लिए कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में इसका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है. उनका मानना है कि प्रशासन को इस दिशा में ठोस प्रयास करने चाहिए. यदि इस बारहदरी को सुरक्षित और विकसित किया जाए, तो यह पर्यटन के क्षेत्र में भी एक बड़ी पहचान बन सकती है. आने वाली पीढ़ियों के लिए इस ऐतिहासिक विरासत को बचाना बेहद जरूरी है, ताकि धौलपुर का गौरवशाली इतिहास हमेशा जीवित रह सके.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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