Rajasthan

सिरोही की चोरवाव बावड़ी का इतिहास

Last Updated:April 20, 2026, 09:11 IST

History of Chorwav Stepwell Sirohi: सिरोही की आबूरोड तहसील में स्थित चोरवाव गांव का नाम यहाँ की एक प्राचीन बावड़ी के कारण पड़ा है. पुराने समय में पहाड़ी रास्तों से आने वाले चोर चोरी के बाद इसी बावड़ी में छुपते थे जिसके कारण इसका नाम चोरवाव पड़ गया. बिना सीमेंट के विशाल पत्थरों से बनी यह बावड़ी स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है. वर्तमान में जर्जर हो रही इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण की मांग स्थानीय ग्रामीणों द्वारा की जा रही है ताकि इस विरासत को बचाया जा सके.

ख़बरें फटाफट

History of Chorwav Stepwell Sirohi: राजस्थान का सिरोही जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ ऐतिहासिक जल संरचनाओं के लिए भी जाना जाता है. प्राचीन काल में राजाओं और शासकों द्वारा आम जनता की पेयजल व्यवस्था के लिए सुंदर और कलात्मक बावड़ियों का निर्माण करवाया जाता था. ये बावड़ियां मात्र पानी के स्रोत नहीं थे बल्कि तत्कालीन स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण भी थे. वर्तमान समय में भले ही आधुनिक संसाधनों के कारण कई बावड़ियों का उपयोग कम हो गया हो लेकिन इनसे जुड़ी दंतकथाएं और ऐतिहासिक महत्व आज भी इन्हें एक विशिष्ट पहचान दिलाते हैं. जिले की आबूरोड तहसील के अंतर्गत आने वाली चंडेला ग्राम पंचायत का ‘चोरवाव’ गांव एक ऐसी ही मिसाल है जिसका नामकरण यहाँ स्थित एक प्राचीन और रहस्यमयी बावड़ी के कारण हुआ है.

चोरवाव गांव के नाम के पीछे एक बड़ी ही रोचक और डरावनी कहानी प्रचलित है. स्थानीय बुजुर्गों और पूर्व सरपंच गणेशराम के अनुसार प्राचीन समय में यह क्षेत्र सघन पहाड़ियों और जंगलों से घिरा हुआ था. उन दिनों जब चोर और लुटेरे आसपास के इलाकों में चोरी की वारदातों को अंजाम देते थे, तो वे छुपने के लिए इसी बावड़ी का सहारा लेते थे. पानी का मुख्य स्रोत होने और पहाड़ियों के बीच सुरक्षित स्थान होने के कारण चोर यहाँ लंबे समय तक छिपे रहते थे. चोरों की लगातार मौजूदगी और उनके डर के कारण रात के समय आम ग्रामीण यहाँ आने से भी कतराते थे. धीरे-धीरे यह स्थान चोरों की बावड़ी यानी ‘चोरवाव’ के नाम से मशहूर हो गया और बाद में इसी नाम से पूरे गांव की पहचान स्थापित हो गई.

विशाल पत्थरों से निर्मित अनोखा स्थापत्यचोरवाव बावड़ी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निर्माण शैली है जो प्राचीन इंजीनियरिंग का एक अद्भुत नमूना पेश करती है. इस विशाल बावड़ी के निर्माण में कहीं भी सीमेंट या चूने का उपयोग नहीं किया गया है बल्कि बड़े-बड़े शिलाखंडों को एक के ऊपर एक बड़ी ही बारीकी और संतुलन के साथ रखकर इसे तैयार किया गया है. बावड़ी के भीतर उतरने के लिए सुंदर सीढ़ियां और मजबूती प्रदान करने के लिए नक्काशीदार पिलर भी बनाए गए हैं. आदिवासी बहुल इस इलाके में करीब 250 परिवार निवास करते हैं और आज भी कई ग्रामीण अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए इस बावड़ी के पानी का उपयोग करते हैं. यह संरचना आज भी प्राचीन निर्माण तकनीक की मजबूती की गवाही दे रही है.

संरक्षण के अभाव में जर्जर होती धरोहरविशाल और भव्य होने के बावजूद देखरेख की कमी के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर अब धीरे-धीरे जर्जर अवस्था में पहुँच रही है. वर्षों से उचित मरम्मत और सफाई नहीं होने से इसकी दीवारों और सीढ़ियों को नुकसान पहुँच रहा है. स्थानीय ग्रामीणों और ग्राम पंचायत स्तर पर इस प्राचीन बावड़ी के जीर्णोद्धार की मांग लंबे समय से उठाई जा रही है. ग्रामीणों का मानना है कि यदि सरकार और पुरातत्व विभाग इस ओर ध्यान दें तो यह स्थान पर्यटन के केंद्र के रूप में भी विकसित हो सकता है जिससे गांव को नई पहचान मिलेगी. वर्तमान में यह बावड़ी अपनी उपेक्षा पर आंसू बहा रही है और एक बार फिर अपने पुराने गौरव की बहाली का इंतजार कर रही है.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें

न्यूजलेटर

अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज

खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में

सबमिट करें

Location :

Sirohi,Sirohi,Rajasthan

First Published :

April 20, 2026, 09:11 IST

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj