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कॉमेडी का जादूगर, गरीबी मिटाने के लिए 3 रुपये में किया था काम, दिलीप कुमार भी हो गए थे मुरीद, 1 रोल बना गया अमर

Last Updated:July 08, 2026, 04:02 IST

हिंदी सिनेमा के सबसे चहेते और यादगार कॉमेडियंस में शुमार वो कलाकार जो आज भले ही हमारे बीच मौजूद नहीं है, लेकिन उनके किरदार आज भी लोगों की जुबां पर चढ़े हुए हैं. दिवंगत एक्टर जगदीप की आज पुण्यतिथि है. उनका नाम लेते ही सबसे पहले जहन में ‘सूरमा भोपाली’ का किरदार आता है. ‘सूरमा भोपाली’ अपने छोटे से रोल से हिंदी सिनेमा के इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गए. कॉमेडी का जादूगर, गरीबी मिटाने के लिए 3 रुपये में किया था कामZoomजगदीप की आज पुण्यतिथि है.

नई दिल्ली.  बॉलीवुड का वो कलाकार जिसने चंद मिनटों के किरदार से दर्शकों के दिलों में अपनी अलग पहचान बनाई. उनका हर रोल सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास के पन्नों में दर्ज है. ये एक्टर जगदीप हैं जिन्हें ज्यादातर लोग ‘सूरमा भोपाली’ के नाम से जानते हैं. अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, जया बच्चन स्टारर ‘शोले’ में ‘सूरमा भोपाली’ एक आइकॉनिक रोल है जिसने कुछ ही मिनट में एक्टर जगदीप को अमर बना दिया. फिल्मी दुनिया का रुख करने से पहले एक्टर ने अपना नाम बदल लिया था. वो इश्तियाक अहमद जाफरी से जगदीप बन गए थे.आज 8 जुलाई को ‘सूरमा भोपाली’ के नाम से मशहूर एक्टर जगदीप की पुण्यतिथि है.

‘हमारा नाम सूरमा भोपाली ऐसे ही नहीं है!’… साल 1975 की ऐतिहासिक फिल्म ‘शोले’ का यह डायलॉग सुनते ही आंखों के सामने बड़ी-बड़ी मूंछों, सिर पर टोपी और पान चबाते हुए अनोखे लहजे में बात करने वाले एक ऐसे शख्स की तस्वीर उभर आती है, जिसने अपनी जादुई कॉमिक टाइमिंग से पूरी दुनिया को हंसाया. पर्दे पर लोगों को हंसा-हंसाकर बेहाल करने वाले जगदीप की जिंदगी काफी दुख और दर्द से भरी थी.

बचपन में सिर से उठा पिता का साया

29 मार्च 1939 को जन्मे जगदीप का असली नाम इश्तियाक अहमद जाफरी था. बचपन में ही पिता का असमय साया सिर से उठ गया और कसर 1947 के भारत-विभाजन की उथल-पुथल ने पूरी कर दी. इस ऐतिहासिक ट्रेजेडी ने उनके हंसते-खेलते परिवार की आर्थिक हालत पूरी तरह खराब हो गई थी. हालात इतने बदतर थे कि पेट पालने के लिए उन्हें सड़कों पर काम ढूंढना पड़ता था.

बीआर चोपड़ा ने चमकाई किस्मत

किस्मत का पहिया साल 1951 में घूमा, जब महान निर्देशक बी.आर. चोपड़ा अपनी पहली फिल्म ‘अफसाना’ के लिए कुछ बाल कलाकारों की तलाश कर रहे थे. सड़कों पर काम तलाशते हुए इश्तियाक को एक एजेंट मिला. उसने फिल्म के एक नाटक वाले सीन में सिर्फ ताली बजाने के बदले जगदीप को 3 रुपये की दिहाड़ी की पेशकश की. एक्टर मान गए, लेकिन सेट पर कुछ ऐसा हुआ जिसने इतिहास बदल दिया.

एक्टिंग देख मेकर्स ने दोगुनी की फीस

मुख्य बाल कलाकार कठिन उर्दू डायलॉग्स बोलने में नाकाम हो रहा था. उर्दू जुबान पर अच्छी पकड़ रखने वाले जगदीप ने तुरंत अपनी नकली मूंछ-दाढ़ी लगाई और पूरे आत्मविश्वास के साथ वो डायलॉग्स बोल दिए. बी.आर. चोपड़ा इस बच्चे के हौसले से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनकी फीस दोगुनी यानी 6 रुपये कर दी. यहीं से सिनेमा के एक नायाब हीरे का उदय हुआ.

जब दिलीप कुमार ने दिया पुरस्कार और नेहरू हुए दीवाने

शुरुआती दिनों में जगदीप ने खुद को एक बेहद गंभीर और भावुक बाल कलाकार के रूप में स्थापित किया. साल 1953 में आई फिल्म ‘फुटपाथ’ में उन्होंने ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार के बचपन का किरदार निभाया. फिल्म के एक दृश्य में उन्होंने बिना ग्लिसरीन के इस कदर सजीव अभिनय किया कि दिलीप कुमार भावुक हो उठे और उन्होंने सेट पर ही जगदीप को 100 रुपये का नकद पुरस्कार दिया. उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि 1957 में आई फिल्म ‘हम पंछी एक डाल के’ (जिसमें उन्होंने ‘महमूद’ नाम के छात्र का रोल किया था) की सफलता के बाद देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उनके मुरीद हो गए थे.

बिमल रॉय ने बदली राह

जगदीप के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया जब दिग्गज निर्देशक बिमल रॉय ने उनकी प्रतिभा को एक अलग नजरिए से देखा. उन्होंने अपनी कल्ट क्लासिक फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ (1953) में जगदीप को जूता पॉलिश करने वाले ‘लालू उस्ताद’ का कॉमिक रोल दिया. इस किरदार ने जगदीप को समझा दिया कि उनकी असली ताकत रोने में नहीं, बल्कि दुनिया को हंसाने में है.

इसके बाद उन्होंने हमेशा के लिए कॉमेडी की राह चुन ली. साल 1968 की फिल्म ‘ब्रह्मचारी’ ने उन्हें एक मुकम्मल कॉमेडियन बनाया. फिर ‘शोले’ के ‘सूरमा भोपाली’ (1975) और ‘अंदाज अपना अपना’ (1994) के ‘बांकेलाल भोपाली’ जैसे किरदारों ने उन्हें अमर कर दिया. उन्होंने ‘पुराना मंदिर’ के ‘मच्छर सिंह’ से लेकर प्रियदर्शन की ‘मुस्कुराहट’ के ‘बद्रीप्रसाद चौरसिया’ जैसे जटिल और अनूठे किरदारों को जीवंत किया.

About the AuthorPranjul SinghSub-Editor

From the precision of chemistry labs to the vibrant chaos of a newsroom, my journey has been about finding the perfect formula for a great story. A graduate in Chemistry Honours from the historic Scottish Churc…और पढ़ें

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