घर में लगा यह पौधा है औषधीय गुणों का खजाना! पथरी से लेकर बवासीर तक में माना जाता है फायदेमंद

Last Updated:July 02, 2026, 15:43 IST
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी समेत देश के कई हिस्सों में घरों में आसानी से मिलने वाला पत्थरचट्टा का पौधा आयुर्वेद में महत्वपूर्ण औषधीय पौधा माना जाता है. पाषाणभेद या पर्णबीज (Bryophyllum pinnatum) के नाम से प्रसिद्ध इस पौधे का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में वर्षों से किया जाता रहा है. माना जाता है कि यह गुर्दे की पथरी, मूत्र संबंधी समस्याओं, जोड़ों के दर्द, त्वचा संबंधी परेशानियों और बवासीर के लक्षणों में लाभकारी हो सकता है. हालांकि, इसका सेवन या उपयोग हमेशा आयुर्वेदिक विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए.
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में पत्थरचट्टा का पौधा कई घरों में आसानी से देखने को मिल जाता है. हालांकि, यह सिर्फ एक सामान्य पौधा नहीं, बल्कि कई बीमारियों में उपयोगी औषधीय पौधा माना जाता है. आयुर्वेद में इसे पाषाणभेद और पर्णबीज (Bryophyllum pinnatum) के नाम से जाना जाता है. पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में वर्षों से इसका उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार के लिए किया जाता रहा है.
प्रकृति ने हमें अनेक ऐसे औषधीय पौधे दिए हैं, जिनका उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के लिए किया जाता रहा है. इन्हीं में से एक है पत्थरचट्टा, जिसे आयुर्वेद में महत्वपूर्ण औषधीय पौधा माना जाता है. यह पौधा गुर्दे की पथरी, हृदय, त्वचा, मूत्र संबंधी और पाचन से जुड़ी समस्याओं में लाभकारी माना जाता है. इसकी खास बात यह है कि इसे घर के छोटे से गमले में भी आसानी से उगाया जा सकता है.
आयुर्वेद में पत्थरचट्टा (पाषाणभेद) को गुर्दे की पथरी और मूत्र संबंधी समस्याओं के लिए उपयोगी औषधीय पौधा माना गया है. पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इसमें मौजूद मूत्रवर्धक गुण पेशाब के प्रवाह को बढ़ाने में सहायक माने जाते हैं, जिससे छोटी पथरी के बाहर निकलने में मदद मिल सकती है. इसके अलावा, इसे मूत्र मार्ग को साफ रखने और पथरी बनने के जोखिम को कम करने में भी लाभकारी माना जाता है.
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आयुर्वेद में पत्थरचट्टा को जोड़ों के दर्द और सूजन में उपयोगी औषधीय पौधा माना जाता है. इसकी पत्तियों में ऐसे प्राकृतिक यौगिक पाए जाने की बात कही जाती है, जिनमें सूजन कम करने वाले गुण हो सकते हैं. पारंपरिक रूप से इसकी ताजी पत्तियों को हल्का गर्म करके या पीसकर दर्द और सूजन वाले स्थान पर लेप के रूप में लगाया जाता है. बरसात और सर्दियों के मौसम में ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई लोग दर्द या सूजन होने पर पत्थरचट्टा की पत्तियों को हल्का गर्म करके प्रभावित स्थान पर बांधते हैं.
पत्थरचट्टा का उपयोग आयुर्वेद में त्वचा संबंधी कई समस्याओं के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है. पारंपरिक रूप से इसकी ताजी पत्तियों को पीसकर तैयार किया गया लेप फोड़े-फुंसियों, मुंहासों, छोटे घावों, कीड़े के काटने से होने वाली सूजन और त्वचा की हल्की जलन पर लगाया जाता है. माना जाता है कि इसमें मौजूद कुछ प्राकृतिक यौगिक जीवाणुरोधी (एंटीबैक्टीरियल) और सूजन कम करने वाले गुण रखते हैं, जो प्रभावित त्वचा को आराम पहुंचाने में सहायक हो सकते हैं.
पत्थरचट्टा का सेवन आयुर्वेदिक विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार किया जाना चाहिए. पारंपरिक रूप से इसके पत्तों का रस 10 से 15 मिलीलीटर सुबह-शाम, खाली पेट या हल्के भोजन के बाद लिया जाता है. वहीं, इसका चूर्ण 1 से 3 ग्राम पानी के साथ दिन में दो बार और काढ़ा 20 से 30 मिलीलीटर सुबह और शाम सेवन करने की बात कही जाती है. पत्थरचट्टा को केवल एक औषधीय पौधा ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी पौधा भी माना जाता है, इसलिए कई लोग इसे अपने घरों में भी लगाते हैं.
अगर आप बवासीर की समस्या से परेशान रहते हैं, तो आपके घर या गार्डन में लगा पत्थरचट्टा का पौधा आयुर्वेद में उपयोगी औषधीय पौधा माना जाता है. पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इसका उपयोग बवासीर के लक्षणों को कम करने और रक्तस्राव में राहत के लिए किया जाता रहा है. माना जाता है कि इसमें मौजूद सूजन कम करने वाले (एंटी-इंफ्लेमेटरी) और रक्तस्राव नियंत्रित करने में सहायक गुण बवासीर से जुड़ी दर्द और सूजन की समस्या में राहत पहुंचाने में मदद कर सकते हैं.
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