समाज के लिए मिसाल बनीं तीन बेटियां, मां की मौत के बाद खुद किया अंतिम संस्कार, निभाए रीति-रिवाज

Last Updated:August 22, 2026, 18:35 IST
Pushkar Hindi News: पुष्कर में बेटियों ने सामाजिक परंपराओं को नई मिसाल दी. बड़ी बस्ती स्थित मोक्ष धाम में उषाकंवर राणावत के निधन के बाद उनकी तीन बेटियों कादम्बरी बाईसा, कृष्णा बाईसा और जयन्तिका बाईसा ने मां को मुखाग्नि दी. पुत्र नहीं होने के कारण बेटियों ने अंतिम संस्कार से जुड़े सभी धार्मिक दायित्व निभाए. 55 वर्षीय उषाकंवर का इलाज के दौरान निधन हुआ था. तीर्थनगरी पुष्कर में उनका अंतिम संस्कार किया गया.
ख़बरें फटाफट
बेटा नहीं था तो तीन बेटियों ने संभाली जिम्मेदारी, मां को दी मुखाग्नि
पुष्कर: तीर्थनगरी पुष्कर में समाज के लिए एक भावुक कर देने वाली तस्वीर सामने आई है. आज के इस आधुनिक दौर में भी जहां बेटा-बेटी में फर्क करने वाली मानसिकता पूरी तरह मिटी नहीं है, वहीं पुष्कर की बेटियों ने रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़कर एक ऐसा अनूठा उदाहरण पेश किया है जो समाज की सोच को झकझोर कर रख देता है. पुष्कर की बड़ी बस्ती स्थित मोक्ष धाम में उस समय हर आंख नम हो गई और लोग हैरान रह गए जब कादम्बरी बाईसा, कृष्णा बाईसा और जयन्तिका बाईसा नामक तीन सगी बेटियों ने अपनी दिवंगत माँ उषाकवर राणावत को नम आंखों से मुखाग्नि दी और तमाम अंतिम संस्कार के धार्मिक दायित्वों को निभाया.
मिली जानकारी के अनुसार, उषा कवर राणावत (उम्र 55 वर्ष) का जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि कई स्थानों से जुड़ी हुई थी. उनके भतीजे दक्ष्यराजसिंह ने जानकारी साझा करते हुए बताया कि उषा कवर के कोई पुत्र नहीं था. हमारे समाज में ऐसी स्थिति आने पर किसी अन्य पुरुष रिश्तेदार या भतीजे से अंतिम संस्कार की रस्में पूरी करवाई जाती हैं, लेकिन इस परिवार ने समाज की पुरानी रूढ़ियों को पीछे छोड़ते हुए अपनी तीनों बेटियों को ही यह अधिकार और कर्तव्य सौंपा. तीनों बेटियों ने बिना किसी झिझक के अपनी माँ को मुखाग्नि देने की परंपरा को निभाया और यह साबित कर दिया कि माता-पिता के प्रति कर्तव्य में बेटियां किसी भी बेटे से पीछे नहीं हैं.
इलाज के दौरान हुआ निधन, तीर्थनगरी पुष्कर में हुआ अंतिम संस्कारसामाजिक कार्यकर्ता शंकरसिंह भवाल ने इस दुखद प्रसंग पर जोर डालते हुए बताया कि उषा कवर राणावत का ससुराल जयपुर के समीप मानपुरा माचेड़ी क्षेत्र में था, जबकि उनका पीहर भीलवाड़ा के पास कारोही गांव में स्थित था. हाल ही में स्वास्थ्य खराब होने के कारण वे कुछ समय से बीमार चल रही थीं. उनका इलाज क्षेत्रपाल अस्पताल में चल रहा था, जहां उपचार के दौरान 55 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. उनके निधन से पूरे परिवार और रिश्तेदारों में शोक है. पुष्कर तीर्थनगरी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत उच्च है, इसलिए परिजनों ने आपसी सहमति से उनका अंतिम संस्कार पवित्र नगरी पुष्कर के मुक्तिधाम में ही संपन्न कराने का निर्णय लिया.
देश और समाज के लिए संदेशआज के समय में जब देश की बेटियां रक्षा, विज्ञान, खेलकूद और प्रशासन जैसे हर बड़े क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रही हैं, वहीं सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों को निभाने के मामले में भी वे पुरुषों के बराबर खड़ी नजर आ रही हैं. पुष्कर में हुआ यह वाकया सिर्फ एक परिवार का अंतिम संस्कार नहीं है, बल्कि यह उन सभी रूढ़िवादी लोगों के मुंह पर करारा तमाचा है जो आज भी बेटियों को बेटों से कम आंकते हैं. इन तीनों बहनों ने अपनी मां को अंतिम विदाई देकर यह संदेश दिया है कि संस्कार और कर्तव्य लिंग पर आधारित नहीं होते, बल्कि भावना और समर्पण से तय होते हैं.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
और पढ़ेंLocation :
Ajmer,Rajasthan
First Published :
August 22, 2026, 18:35 IST



