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कभी था सागर, आज बना रेगिस्तान, सिर्फ 30 साल में ऐसा क्या हुआ की जहाज की जगह दौड़ने लगे ऊंठ?

Last Updated:June 15, 2026, 18:47 IST

अरल सागर को दुनिया की चौथा सबसे बड़ा सागर होने का गौरव हासिल था. दूर पहाड़ों से निकलने वाली दो ताकतवर नदियाँ सिर दरिया और आमू दरिया काइज़िलकुम रेगिस्तान को चीरती हुई आती थीं. इस विशाल बेसिन को पानी से लबालब भर देती थीं. यहाँ का मछली उद्योग बेहद समृद्ध था, और चारों तरफ खुशहाली थी.

इन तस्वीरों आपको जो ये रेगिस्तान दिख रहा है, कभी ये दुनिया का चौथा सबसे बड़ा इन-लैंड समुद्र हुआ करता था. ज्यादा समय नहीं बीता है ये करीब तीस साल पहले की ही बात है. इसमें जहाज उस जगह पर तैरते थे जो कभी दुनिया का चौथा सबसे बड़ा अंदरूनी समुद्र था. इसके पानी का इस्तेमाल खेती के लिए किया गया, आज देखिए एक समुद्र रेगिस्तान बन गया है.

एक समय अरल सागर दुनिया की चौथा सबसे बड़ा इन-लैंड हुआ करता था. इसे पानी दो बड़ी नदियों सिर दरिया और आमू दरिया से मिलता था. इन नदियों की वजह से झील हमेशा पानी से भरी रहती थी. यहां मछली पकड़ने का बड़ा उद्योग था और आसपास के लोग खुशहाल जीवन जीते थे.

1960 के दशक में सोवियत संघ ने रेगिस्तानी इलाकों में खेती बढ़ाने की योजना बनाई. इसके लिए उसने अरल सागर में पानी पहुंचाने वाली सिर दरिया और आमू दरिया नदियों का पानी मोड़ दिया. इस पानी से कपास और अन्य फसलों की खेती शुरू हुई. इस योजना से खेती तो बढ़ी, लेकिन अरल सागर को मिलने वाला पानी कम हो गया और झील धीरे-धीरे सूखने लगी.

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लगातार पानी कम होने से अरल सागर सिकुड़ता गया. साल 2000 तक यह अपने मूल आकार बहुत छोटा हिस्सा रह गया. बाद में यह दो भागों में बंट गया उत्तरी अरल सागर और दक्षिणी अरल सागर. साल 2001 में दक्षिणी हिस्सा भी दो भागों में टूट गया जिससे ये और भी छोटा हो गया.

2005 से 2009 के बीच इस क्षेत्र में भीषण सूखा पड़ा. इससे आमू दरिया का पानी भी झील तक नहीं पहुंच पाया. आखिरकार 2014 में दक्षिणी अरल सागर का पूर्वी हिस्सा पूरी तरह सूख गया. जहां कभी पानी और नावें थीं, वहां अब सिर्फ रेगिस्तान रह गया.

अरल सागर के सूखने से मछली उद्योग खत्म हो गया और हजारों लोगों की नौकरियां चली गईं. झील का सूखा तल रसायनों और कीटनाशकों से भरा था. वहां से उठने वाली जहरीली धूल हवा के जरिए दूर-दूर तक फैलने लगी. इससे खेत खराब होने लगे और लोगों में कई बीमारियां फैल गईं.इसके अलावा इलाके का मौसम भी बदल गया. सर्दियां ज्यादा ठंडी और गर्मियां ज्यादा गर्म होने लगीं.

स्थिति बिगड़ने के बाद कजाकिस्तान ने उत्तरी अरल सागर को बचाने का प्रयास किया. साल 2005 में उसने ‘कोक-अरल बांध’ बनाया, जिससे उत्तरी हिस्से का पानी बचाया जा सका. इसका असर यह हुआ कि उत्तरी अरल सागर में पानी का स्तर कुछ बढ़ा और वहां मछलियां व पक्षी फिर से लौटने लगे.अरल सागर की कहानी दुनिया के सामने यह बड़ा सबक रखती है कि प्राकृतिक संसाधनों का गलत इस्तेमाल कितना विनाशकारी साबित हो सकता है.

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