अनोखे लोकदेवता इलोजी महाराज, दूल्हे के रूप में होती है पूजा, अधूरी प्रेम कहानी है वजह

पाली. पाली में एक ऐसे अनोखे लोकदेवता का मंदिर है, जिनकी कहानी प्रेम, विरह और त्याग से जुड़ी हुई है. हम बात कर रहे हैं इलोजी महाराज की. राजस्थान में इलोजी को एक मस्तमौला और अनोखे लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है. खास बात यह है कि उनकी प्रतिमा आज भी दूल्हे के रूप में सजी हुई नजर आती है. ऐसा माना जाता है कि पूजा न केवल मनचाही मुरादों के लिए की जाती है, बल्कि जिनकी प्रतिमा एक दूल्हे के रूप में आज भी हर श्रद्धालु का ध्यान अपनी ओर खींचती है.
इनकी कहानी हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद से जुड़ी मानी जाती है. इलोजी और हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के बीच अटूट प्रेम था. दोनों का विवाह तय हो चुका था. इलोजी बारात लेकर आ रहे थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.
अगर पाली शहर की बात करें, तो यहां धानमंडी और सर्राफा बाजार में इलोजी का करीब 150 साल पुराना ऐतिहासिक मंदिर है. पाली में अमली एकादशी के दिन तणी बांधने के बाद इलोजी की प्रतिमा को पाठा बिठाने की पवित्र रस्म निभाई जाती है.
हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के करते थे प्रेम
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इलोजी और दैत्यराज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका एक-दूसरे से अगाध प्रेम करते थे. दोनों का विवाह तय हो चुका था. लेकिन दूसरी ओर हिरण्यकश्यप अपने विष्णु-भक्त पुत्र प्रह्लाद का वध करने का षड्यंत्र रच रहे थे. षड्यंत्र के तहत होलिका अपने भतीजे प्रह्लाद को जलाने के लिए वरदान में मिली चादर ओढ़कर अग्नि में बैठ गई. लेकिन प्रभु कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका भस्म हो गई.
विरह में शरीर पर मली भस्म
जब इलोजी गाजे-बाजे के साथ बारात लेकर पहुंचे, तो विवाह की खुशियां मातम में बदल चुकी थीं. होलिका का जला हुआ शरीर देखकर इलोजी बदहवास होकर रोने लगे. उसकी चिता की राख को अपने पूरे शरीर पर मल लिया. अपने प्रेम की याद में उन्होंने ताउम्र ब्रह्मचर्य का पालन किया. माना जाता है कि इसी घटना के बाद से होलिका दहन के अगले दिन भस्म और रंगों से धुलंडी खेलने की परंपरा शुरू हुई.
संतान और व्यापार समृद्धि की मान्यता
राजस्थान के कई शहरों और गांवों में इलोजी के मंदिर हैं. मारवाड़ में इन्हें एक मजाकिया, मस्तमौला और अनोखे लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है. निसंतान महिलाएं संतान सुख की कामना के लिए इनकी विशेष पूजा-अर्चना करती हैं. वहीं बड़े-बड़े कारोबारी अपने व्यापार में बढ़ोतरी के लिए इलोजी के दर पर मन्नत मांगते हैं.
पाली में 150 साल पुरानी अनूठी परंपरा
पाली शहर के धानमंडी और सर्राफा बाजार में इलोजी का करीब 150 साल पुराना ऐतिहासिक मंदिर है. आमली एकादशी पर धानमंडी में तणी बांधने के बाद प्रतिमा को पाठा बिठाने की परंपरा निभाई जाती है. इलोजी को ठंडाई व पेठे का विशेष भोग लगता है. धुलंडी के दूसरे दिन पारंपरिक बादशाह का मेला लगता है. इसमें बीरबल का स्वांग रचाने वाला युवक लोकदेवता के दर्शन के बाद तणी खोलता है. इसके बाद ही शहर के बाजार औपचारिक रूप से खुलते हैं.
दूल्हे के रूप में सजी भव्य प्रतिमा
इलोजी की प्रतिमा देखने में अत्यंत भव्य और आकर्षक होती है. भारी-भरकम काया, बड़ी-चमकीली आँखें, सिर पर कलंगी लगा दूल्हे का साफा पहना होता है. उनके हाथों-पैरों में कंगन और गले में फूलों का हार इलोजी का यह दूल्हा स्वरूप उनके के उस अधूरे क्षण की याद दिलाता है.



