चेहरे पर मुस्कान, मन में तनाव… आखिर क्यों अपनी परेशानी किसी को नहीं बताते युवा?

ग्रेटर नोएडा: आज के दौर में युवा सोशल मीडिया के जरिए पूरी दुनिया से जुड़े हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद वे अपने आसपास के लोगों से अपनी परेशानियां साझा नहीं कर पा रहे हैं. चेहरे पर मुस्कान और जिंदगी में सब कुछ अच्छा होने का दिखावा करने वाले कई युवा अंदर ही अंदर मानसिक तनाव, अकेलेपन और भविष्य की चिंता से जूझ रहे हैं. पढ़ाई का दबाव, परिवार की उम्मीदें, समाज में अपनी पहचान बनाने की चाह और दूसरों से आगे निकलने की होड़ उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वे कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिनमें कुछ युवा आत्महत्या जैसा कदम उठाने के बारे में सोचने लगते हैं? इस विषय पर शारदा यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंसेज की डीन एवं साइकोलॉजी की प्रोफेसर डॉ. अन्वीती गुप्ता ने इसके पीछे कई सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक कारण हो सकते हैं.
सोशल मीडिया के दौर में कमजोर पड़ रहा ह्यूमन टच
बताया कि आज लोगों का संवाद इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से अधिक होने लगा है. लोग अपनी हर बात और परेशानी सोशल मीडिया पर साझा कर लेते हैं, लेकिन आसपास मौजूद लोगों से खुलकर बातचीत नहीं कर पाते. इसका असर रिश्तों पर भी पड़ रहा है. पहले लोगों के बीच आपसी जुड़ाव और एक-दूसरे की परेशानियों को समझने की भावना अधिक दिखाई देती थी, लेकिन अब कई रिश्तों में वह अपनापन और भरोसा कमजोर पड़ता नजर आ रहा है.
उन्होंने बताया कि किसी व्यक्ति की परेशानी को समझना, मुश्किल समय में उसके साथ खड़े रहना और उसे भावनात्मक सहारा देना बेहद जरूरी है. केवल इंटरनेट पर बातचीत करना किसी व्यक्ति की भावनात्मक जरूरतों को पूरी तरह पूरा नहीं कर सकता. जब कोई युवा अपनी परेशानियां किसी से साझा नहीं कर पाता, तो उसके भीतर अकेलेपन की भावना बढ़ सकती है.
पढ़ाई से लेकर भविष्य तक का दबाव बन रहा परेशानी की वजह
कहा कि आज के युवाओं पर कई तरह के दबाव हैं. एक तरफ पढ़ाई और करियर में सफल होने की चिंता है, तो दूसरी तरफ परिवार और समाज की उम्मीदों पर खरा उतरने का दबाव है. हर व्यक्ति चाहता है कि वह जीवन में कुछ बड़ा करे और अपनी अलग पहचान बनाए. लेकिन जब उम्मीदों और उपलब्ध संसाधनों के बीच अंतर होता है, तो युवा खुद को असहाय महसूस करने लगते हैं.
उन्होंने बताया कि कई बार युवाओं के पास अपने लक्ष्य हासिल करने की इच्छा तो होती है, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आता कि उस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता क्या है. ऐसे में भविष्य की चिंता, असफलता का डर और दूसरों से तुलना उनके तनाव को बढ़ा सकती है. हर व्यक्ति की परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए सभी से एक जैसी सफलता की अपेक्षा करना भी उचित नहीं है.
परेशानी बताने से डरते हैं युवा, कहीं कमजोर न समझ लिया जाए
बताया कि कई युवा अपनी मानसिक परेशानी परिवार या दोस्तों को इसलिए नहीं बताते, क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं दूसरे लोग उन्हें कमजोर न समझ लें. बाहर से आत्मविश्वास दिखाने वाले युवा अंदर ही अंदर इस चिंता में रह सकते हैं कि वे अपनी जिम्मेदारियां कैसे पूरी करेंगे और भविष्य में क्या करेंगे.
जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी बात समझने वाला कोई नहीं है, तो वह अपनी परेशानी अपने तक सीमित रखने लगता है. इससे तनाव और अकेलेपन की भावना बढ़ सकती है. विशेषज्ञ के अनुसार, युवाओं के लिए ऐसा माहौल तैयार करना जरूरी है, जहां वे बिना किसी डर और झिझक के अपनी बात रख सकें.
बच्चों से माता-पिता करें खुलकर बातचीत
कहा कि आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए माता-पिता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. उन्हें बच्चों के साथ केवल माता-पिता की तरह नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर एक दोस्त की तरह भी बातचीत करनी चाहिए. बच्चों को समझना होगा कि आज का सामाजिक और शैक्षणिक माहौल पहले के समय से काफी अलग है.
माता-पिता को बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोपने के बजाय उनकी रुचियों, क्षमताओं और परेशानियों को समझने का प्रयास करना चाहिए. बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना, उनकी बात ध्यान से सुनना और सही-गलत के बीच अंतर समझाना जरूरी है. इससे बच्चे अपनी परेशानियां साझा करने में अधिक सहज महसूस कर सकते हैं.
स्कूलों में काउंसलिंग सेल और शिक्षकों की भूमिका जरूरी
विशेषज्ञ के अनुसार, स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलिंग सेल की सुविधा होनी चाहिए, ताकि मानसिक तनाव से गुजर रहे विद्यार्थियों को समय पर मदद मिल सके. शिक्षकों को भी विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक और भरोसेमंद सहयोगी की भूमिका निभानी चाहिए. बच्चों की भावनाओं को समझना और जरूरत पड़ने पर उन्हें विशेषज्ञ की मदद दिलाना महत्वपूर्ण है.
उन्होंने कहा कि युवाओं में क्षमताओं की कमी नहीं है, बल्कि कई बार उन्हें सही मार्गदर्शन और सहयोग की जरूरत होती है. सोशल मीडिया की चकाचौंध और दूसरों की अपेक्षाओं के बीच बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि जीवन में असफलता आना सामान्य है और किसी समस्या का समाधान आत्महत्या नहीं है.
जरूरी है समय पर परेशानी को समझना
बताया कि आत्महत्या की रोकथाम के लिए परिवार, शिक्षकों और समाज को मिलकर प्रयास करना होगा. युवाओं की बात सुनना, उनके व्यवहार में आए बदलावों को गंभीरता से लेना और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता लेना महत्वपूर्ण है. यदि कोई युवा खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करे, तो उसे अकेला न छोड़ें और तत्काल पेशेवर मदद लें.



