दुनिया में पहली बार अनोखा प्रयोग: महिला के पैर की सेल्स निकालकर आंखों में डाली गईं, जानिए आगे क्या हुआ?

नई दिल्ली: जब आपके टीवी रिमोट की बैटरी खत्म हो जाती है तो आप क्या करते हैं. आप शायद अपनी डेस्क घड़ी या किसी और खिलौने से बैटरी निकालकर रिमोट में लगा देते हैं. हम आमतौर पर इंसानी शरीर के बारे में इस तरह नहीं सोचते हैं. लेकिन वैज्ञानिक अब सेल्यूलर लेवल पर कुछ ऐसी ही रिसर्च कर रहे हैं. दुनिया में पहली बार ऐसा हुआ है जब एक महिला के पैर से माइटोकॉन्ड्रिया निकालकर उसकी आंखों में डाला गया है. माइटोकॉन्ड्रिया को हमारी सेल्स का पावरहाउस या बैटरी कहा जाता है.
इस महिला की आंखों की रोशनी पूरी तरह जा चुकी थी. डॉक्टरों ने एक नया प्रयोग करते हुए उसके पैर की मांसपेशियों से ये सेल्यूलर बैटरी निकाली. इसके बाद इसे आंखों के लिक्विड में इंजेक्ट कर दिया गया. यह प्रयोग मेडिकल साइंस की दुनिया में एक नई उम्मीद लेकर आया है. रिसर्च में कई हैरान करने वाले नतीजे सामने आए हैं.
क्या है यह पूरी मेडिकल रिसर्च और इसकी शुरुआत आखिर कैसे हुई?
जानवरों पर पहले भी ऐसे कई प्रयोग हो चुके हैं. वैज्ञानिकों ने जानवरों के डैमेज टिशू में माइटोकॉन्ड्रिया ट्रांसप्लांट किया था. इसका मकसद कमजोर हो रही सेल्स को नई एनर्जी देना था. अब पहली बार इसे इंसानी आंख पर आजमाया गया है.
यह रिसर्च इसलिए खास है क्योंकि पहली बार इंसानी आंख में माइटोकॉन्ड्रिया इंजेक्ट किया गया है. आंख बहुत ही नाजुक अंग होता है और इसमें कोई बाहरी सेल डालना बड़ा रिस्क हो सकता है. लेकिन वैज्ञानिकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और एक नया मेडिकल इतिहास रच दिया. इस प्रयोग से भविष्य में आंखों की कई लाइलाज बीमारियों का इलाज संभव हो सकता है.
महिला के साथ ऐसा क्या हुआ था कि उसकी आंखों की रोशनी चली गई?
इस रिसर्च में जिस महिला का इलाज किया गया उसकी उम्र 26 साल है. उसे अचानक ब्रेन ब्लीड हुआ था जिसके कारण उसकी हालत गंभीर हो गई. दुर्भाग्य से उसे करीब 18 घंटे तक किसी अस्पताल में नहीं ले जाया जा सका. अस्पताल पहुंचने पर उसकी इमरजेंसी सर्जरी की गई. उसकी जान तो बच गई लेकिन एक बड़ा नुकसान हो चुका था.
बहुत ज्यादा समय तक खून और ऑक्सीजन न मिलने के कारण उसके ऑप्टिक नर्व्स को भारी नुकसान पहुंचा. इस ऑक्सीजन की कमी ने उसकी दोनों आंखों की रोशनी को लगभग पूरी तरह से खत्म कर दिया. आठ हफ्ते बाद उसके ऑप्टिक नर्व्स सिकुड़ने लगे थे. लगभग तीन महीने बाद भी इलाज का कोई खास असर नहीं दिखा और उसकी स्थिति खराब ही रही. इसके बाद डॉक्टरों को किसी नए और अलग इलाज के बारे में सोचना पड़ा.
आखिर डॉक्टरों ने आंख के इलाज के लिए महिला के पैर को ही क्यों चुना?
डॉक्टरों ने जब महिला का टेस्ट किया तो पाया कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है. इमेजिंग से पता चला कि आंखों के कुछ नर्व फाइबर और लेयर पूरी तरह खत्म नहीं हुए थे. ब्रेन एक्टिविटी से यह भी पता चला कि कुछ विजुअल जानकारी अभी भी दिमाग तक पहुंच रही है. ऐसे में डॉक्टरों को लगा कि एक माइटोकॉन्ड्रिया ट्रांसप्लांट बची हुई सेल्स को दोबारा जिंदा कर सकता है. ट्रांसप्लांट सर्जरी में इम्यून रिएक्शन का बड़ा खतरा रहता है. इसलिए सबसे सुरक्षित तरीका मरीज का ही बायोलॉजिकल मटेरियल इस्तेमाल करना होता है.
इसी कारण डॉक्टरों ने महिला के पैर की जांघ की मांसपेशियों से बायोप्सी सैंपल लिया. इस सैंपल से करोड़ों की संख्या में माइटोकॉन्ड्रिया को निकालकर अलग किया गया. इसके बाद इन फ्रेश माइटोकॉन्ड्रिया को उसकी दोनों आंखों के लिक्विड में बहुत सावधानी से इंजेक्ट कर दिया गया.
माइटोकॉन्ड्रियल ट्रांसप्लांट से पहले मरीज की ऑप्टिक नर्व और रेटिनल गैन्ग्लियन सेल्स को हुए नुकसान को दिखाती ब्रेन और आंख की इमेजिंग. (Image Credit: Putrino et al., Research Square, 2026)
आंखों के अंदर माइटोकॉन्ड्रिया कैसे काम करता है और यह क्यों जरूरी है?
माइटोकॉन्ड्रिया हमारी सेल्स के अंदर छोटी बैटरी की तरह काम करते हैं. ये शरीर में मौजूद खाने और ऑक्सीजन को एनर्जी में बदलते हैं.
हमारी रेटिना की कुछ सेल्स पूरी तरह इसी एनर्जी पर ही निर्भर होती हैं. इनमें रेटिनल गैन्ग्लियन सेल्स भी शामिल हैं जो आंखों के लिए बहुत जरूरी होती हैं. ये सेल्स विजुअल जानकारी को रेटिना से ब्रेन तक पहुंचाती हैं.
डेविड पुट्रिनो के अनुसार इन सेल्स को सेंट्रल नर्वस सिस्टम में सबसे ज्यादा एनर्जी चाहिए होती है. जब ब्लड और ऑक्सीजन की सप्लाई रुक जाती है तो सबसे पहले माइटोकॉन्ड्रिया डैमेज होते हैं. इसके कारण एनर्जी बननी बंद हो जाती है और रेटिनल सेल्स मरने लगती हैं.
इस ट्रांसप्लांट का मकसद मरी हुई सेल्स को जिंदा करना नहीं था. इसका असली लक्ष्य बची हुई सेल्स को मरने से बचाना और उन्हें फिर से पावर देना था.
क्या इस नए मेडिकल एक्सपेरिमेंट से महिला की रोशनी सच में वापस आ पाई?
इस इलाज के नतीजे बहुत ही दिलचस्प और हैरान करने वाले रहे हैं. रिसर्च स्क्वायर में पब्लिश रिपोर्ट के मुताबिक इसका कोई भी साइड इफेक्ट नहीं हुआ. शरीर ने कोई खतरनाक इम्यून रिएक्शन भी नहीं दिखाया जो कि एक बड़ी कामयाबी है. इंजेक्शन के कुछ दिन बाद ही महिला की आंखों में कुछ पॉजिटिव बदलाव दिखने लगे.
इलाज से पहले 71 दिनों में महिला की आंखों का रिस्पॉन्स नॉर्मल नहीं था. पुतलियां लाइट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थीं. लेकिन इंजेक्शन के बाद पुतलियों ने लाइट के प्रति नॉर्मल रिस्पॉन्स देना शुरू कर दिया.
इलाज के बाद 3, 44 और 45 दिनों में ब्रेन रिकॉर्डिंग सेशन भी किए गए. इसमें दिमाग के विजुअल कॉर्टेक्स में एक अच्छी प्रतिक्रिया दिखी. हालांकि इससे महिला की पूरी रोशनी नहीं लौटी. वह सिर्फ लाइट महसूस कर सकती थी और कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ.
पुतलियों का यह बदलाव बहुत लंबे समय तक नहीं टिका. बाईं आंख ने 11वें दिन अपना आखिरी नॉर्मल रिस्पॉन्स दिया. वहीं दाईं आंख में 39वें दिन तक कुछ नॉर्मल रिस्पॉन्स देखे गए. इस रिसर्च में अभी कुछ कमियां भी बताई जा रही हैं.
यह सिर्फ एक ही मरीज पर किया गया प्रयोग था. ऐसा कोई सीधा सबूत नहीं है कि नया माइटोकॉन्ड्रिया रेटिनल सेल्स के अंदर पूरी तरह सेट हो गया. फिर भी यह प्रयोग भविष्य के लिए एक साफ रास्ता तैयार करता है. असर खत्म होने का मतलब है कि मरीज को बार-बार इंजेक्शन की जरूरत पड़ सकती है.
डेविड पुट्रिनो ने नेचर मैगजीन को बताया, ‘अब हमने दिखा दिया है कि यह बिल्कुल सुरक्षित है. हम एफडीए के साथ मिलकर लगातार इंजेक्शन देने का नया प्रोटोकॉल बना रहे हैं’. आने वाले समय में यह तकनीक बहुत से लोगों की दुनिया रोशन कर सकती है.



