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योग से 8 हफ्ते में छूट सकती है बच्चों के बिस्तर गीला करने की आदत, स्टडी में खुलासा

छोटे बच्चों में आमतौर पर बिस्तर गीला करने या रात में बिस्तर पर पेशाब करने की आदत होती है. कुछ बच्चों में यह आदत उम्र बढ़ने के बाद छूट जाती है जबकि कई बच्चे लंबे समय तक इससे परेशान रहते हैं. देखा जाए तो इस बीमारी का कोई खास इलाज नहीं होता है क्योंकि डॉक्टरों का भी मानना है कि यह कोई बीमारी नहीं है लेकिन परेशानी जरूर है. हालांकि अब योग और आयुर्वेद में इससे छुटकारे का कारगर उपाय मिल गया है.

जामनगर स्थित भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अंतर्गत इंस्टीट्यूट ऑफ टीचिंग एंड रिसर्च इन आयुर्वेद (ITRA) में किए गए एक चिकित्सकीय अध्ययन ने बच्चों की इस समस्या का समाधान ढूंढ लिया है. आईटीआरए की स्टडी के मुताबिक बढ़ते बच्चों की कॉमन लेकिन संकोच पैदा करने वाली शय्यामूत्र (नींद में बिस्तर गीला करना) समस्या के इलाज में आयुर्वेद और योग काफी प्रभावी हैं.

इस स्टडी से पता चला है कि केवल आयुर्वेदिक औषधि लेने की तुलना में उसके साथ रोजाना कुछ सरल योगासन करवाने से बच्चों में अधिक तेजी से और लगातार सुधार देखा गया है. संस्थान में किए गए इस शोध में 6 से 14 वर्ष की आयु के लगभग 38 बच्चों पर दो महीने (8 सप्ताह) तक अध्ययन किया गया. जिसमें काफी अच्छे परिणाम मिले.

अध्ययन कैसे किया गया?

भुजंगासन बच्‍चों के लिए काफी फायदेमंद है.

इस बारे में आईटीआरए की निदेशक प्रोफेसर तनुजा नेसरी ने बताया कि ITRA के बाल रोग विभाग (कौमारभृत्य) में किए गए इस अध्ययन में बच्चों को दो समूहों में बांटा गया. पहले समूह में केवल आयुर्वेदिक औषधि (चूर्ण) दिया गया. इस समूह के बच्चों को ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मुलेठी और गिलोय के मिश्रण से तैयार ‘मेध्य रसायन चूर्ण’ दूध के साथ दिन में दो बार दिया गया.

जबकि दूसरे समूह को आयुर्वेदिक औषधि (चूर्ण) + योगासन करवाए गए. इस समूह के बच्चों को आयुर्वेदिक चूर्ण के साथ नियमित रूप से सुबह और शाम चार सरल योगासन करवाए गए. इनमें उत्कटासन, अर्ध-शलभासन, भुजंगासन और शवासन थे.

आए चौंकाने वाले आंकड़े

प्रो. तनुजा कहती हैं कि इस दौरान देखा गया कि दूसरे समूह में बिस्तर गीला करने की समस्या में उल्लेखनीय कमी देखी गई. जिन बच्चों ने केवल आयुर्वेदिक चूर्ण लिया, उनमें बिस्तर गीला करने की आदत में लगभग 38 फीसदी सुधार देखा गया. वहीं, चूर्ण के साथ नियमित योगासन करने वाले बच्चों में लगभग 70% तक उल्लेखनीय राहत दर्ज की गई.

 स्मरणशक्ति में वृद्धि: योगासन और औषधि लेने वाले बच्चों की स्मरणशक्ति में भी लगभग 61% सुधार हुआ, जबकि केवल औषधि लेने वाले बच्चों में 31% सुधार दर्ज किया गया.

व्यवहार और चिड़चिड़ेपन में राहत: बिस्तर गीला करने की समस्या के कारण बच्चे अक्सर हीनभावना का अनुभव करते हैं, जिससे उनमें चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ सकता है. संयुक्त उपचार प्राप्त करने वाले बच्चों में चिड़चिड़ेपन में 66% की कमी देखी गई.

एकाग्रता और मानसिक शांति में सुधार: नियमित योगाभ्यास से बच्चों में अत्यधिक सक्रियता (हाइपरएक्टिविटी) में लगभग 71% की कमी दर्ज की गई. साथ ही, उनकी एकाग्रता और मनोबल में भी उत्साहजनक सुधार देखा गया.

प्रो. नेसरी ने बताया कि यह स्टडी वैश्विक स्तर पर प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित आयु (AYU) जर्नल में छपी है. इस शोधपत्र को प्रो. वैद्य वीरेंद्र कोरी, वैद्य सागर भिंडे और वैद्य अमीषा बावर्वा ने प्रस्तुत किया. शोधकर्ताओं ने प्रायोगिक प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त आंकड़ों का सटीक और विस्तृत विश्लेषण किया, जिसके बाद शोधपत्र को प्रकाशन के लिए स्वीकृति मिली.

योग और आयुर्वेद क्यों प्रभावी साबित हुए?

ITRA की निदेशक प्रो. डॉ. तनुजा नेसरी के अनुसार, नींद के दौरान अनजाने में पेशाब हो जाना कई बार मूत्राशय की मांसपेशियों पर कमजोर नियंत्रण और मानसिक तनाव से संबंधित हो सकता है. ऐसे उत्कटासन और भुजंगासन जैसे आसनों से मूत्राशय तथा श्रोणि (पेल्विक) क्षेत्र की मांसपेशियों को मजबूती देने में मदद मिल सकती है, जिससे पेशाब को नियंत्रित करने की क्षमता में सुधार हो सकता है. वहीं, ब्राह्मी और शंखपुष्पी जैसे घटकों का उपयोग पारंपरिक रूप से मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को शांत करने के लिए किया जाता रहा है. इनके माध्यम से नींद और मूत्राशय के बीच समन्वय में सुधार की संभावना पर भी विचार किया गया है.

यह अध्ययन बच्चों में बिस्तर गीला करने की समस्या के प्रबंधन में आयुर्वेदिक औषधि और योगासन के संयुक्त उपयोग की संभावनाओं को उजागर करता है. इस प्रकार, आयुर्वेद को केवल एक चिकित्सा पद्धति के रूप में ही नहीं, बल्कि संतुलित जीवनशैली के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में अपनाने से समग्र स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में सहायता मिल सकती है.

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