राजस्थान में चाकूबाजी का हॉटस्पॉट बना कोटा, ऑपरेशन हॉक भी नहीं रोक पाया, 1959 से ट्रेंड बरकरार

कोटा. राजस्थान की कोचिंगनगरी कोटा में चाकूबाजी और धारदार हथियारों से हमले की वारदातें एक बार फिर चिंता बढ़ा रही हैं. अपराधियों के खिलाफ पुलिस के विशेष अभियान और बड़ी संख्या में चाकू बरामद करने की कार्रवाई के बावजूद शहर में चाकूबाजी की घटनाओं पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा है. हालात यह हैं कि पिछले एक सप्ताह में चाकूबाजी की करीब आधा दर्जन वारदातें सामने आई हैं, जिनमें एक युवक की हत्या हो चुकी है, जबकि कई लोग घायल हुए हैं.
चाकूबाजी के आंकड़े भी शहर की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, कोटा में इस साल चाकूबाजी की करीब 100 वारदातों में 110 से अधिक लोग घायल हो चुके हैं. वहीं, चाकू और अन्य हथियारों से हमलों में आधा दर्जन से अधिक लोगों की मौत होने की बात सामने आई है. पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती युवाओं में धारदार हथियार रखने और उनका इस्तेमाल करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगाना है.
ऑपरेशन हॉक में 9 टीमें, दो दर्जन से ज्यादा बदमाश गिरफ्तार
चाकूबाजी और अवैध हथियारों के खिलाफ कोटा शहर पुलिस ने पिछले दिनों ऑपरेशन हॉक (H.A.W.K.) के तहत विशेष अभियान चलाया था. इसके लिए शहर के अलग-अलग थाना क्षेत्रों में नौ पुलिस टीमों का गठन किया गया. अभियान के दौरान पुलिस ने दो दर्जन से अधिक बदमाशों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से चाकू सहित बड़ी मात्रा में धारदार हथियार बरामद किए थे. सिटी एडिशनल एसपी सुभाष चंद्र मिश्रा के अनुसार, अभियान का उद्देश्य अवैध हथियार रखने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना और चाकू व अन्य धारदार हथियारों के निर्माण, बिक्री तथा इस्तेमाल पर रोक लगाना है. पुलिस का कहना है कि बदमाशों के खिलाफ यह अभियान आगे भी जारी रहेगा. हालांकि, लगातार सामने आ रही वारदातों ने कार्रवाई के असर पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
राजस्थान के 30 से 35 फीसदी वारदातें कोटा में होने का दावा
राजस्थान में होने वाली चाकूबाजी की 30 से 35 प्रतिशत वारदातें अकेले कोटा में हो रही है. शहर में प्रतिवर्ष औसतन 100 से अधिक चाकूबाजी की घटनाएं सामने आती है. इनमें 120 से 125 लोग घायल होते हैं, जबकि करीब 8 से 10 लोगों की मौत होने का दावा किया गया है. इस साल भी करीब 100 घटनाओं में 110 से अधिक लोगों के घायल होने और आधा दर्जन से अधिक मौतों की जानकारी सामने आई है. लगातार हो रही घटनाओं के कारण आमजन में भय का माहौल है. वहीं, पुलिस के अपराध नियंत्रण के दावों पर भी सवाल उठ रहे हैं.
1959 की पुलिस डायरी में भी दर्ज थी चाकूबाजी की समस्या
कोटा में चाकूबाजी का इतिहास भी पुराना बताया जाता है. पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 1959 की पुलिस डायरी में भी चाकूबाजी को बड़ी समस्या के रूप में दर्ज किया गया था. प्रचलित कहानी के मुताबिक, कोटा के स्टेट टाइम में उत्तर प्रदेश के रामपुर के नवाब अपने अंगरक्षकों के साथ यहां आए थे. उनके साथ आए चाकू बाद में रामपुरी चाकू के नाम से प्रसिद्ध हुए. बताया जाता है कि शुरुआत में कुछ युवाओं ने आत्मरक्षा के लिए चाकू चलाने की कला सीखी, लेकिन धीरे-धीरे इसका इस्तेमाल दूसरों को डराने, धमकाने और हमले करने के लिए होने लगा. समय के साथ चाकू कुछ असामाजिक तत्वों के लिए स्टेटस सिंबल बन गया.
फिर लौट रहा पुराना ट्रेंड, पुलिस के सामने बड़ी चुनौती
कुछ साल पहले भी कोटा में चाकूबाजी की घटनाएं देशभर में चर्चा का विषय बनी थीं. बीच में इन वारदातों में कमी आने के बाद अब एक बार फिर इनके बढ़ने की चिंता सामने आ रही है. लगातार हो रहे हमलों और हत्या की घटनाओं ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. अब देखना होगा कि पुलिस का ऑपरेशन हॉक और अवैध हथियारों के खिलाफ चलने वाली कार्रवाई चाकूबाजी पर कितना प्रभावी अंकुश लगा पाती है.



