11 अगस्त 1947: जिन्ना के जाल में फंसा बीकानेर, माउंटबेटन ने भी चल दी अपनी चाल, आरोपों से घिर गए महात्मा गांधी

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जिन्ना के जाल में बीकानेर, माउंटबेटन ने भी चली चाल, आरोपों से घिर गए गांधी
Last Updated:August 11, 2026, 17:11 IST
11 August 1947: कोलकाता के आश्रम में प्रार्थना सभा के दौरान पहली पंक्ति में कुछ लोगों की मौजूदगी ने महात्मा गांधी को आरोपों के घेरे में ला दिया था. वहीं, बीकानेर रियासत के विलय को लेकर जिन्ना और माउंटबेटन अपनी अपनी चाल चल चुके थे. हालांकि शाम होते-होते बीकानेर भारत के पाले में आने का मन बना चुका था. आजादी से 4 दिन पहले क्या-क्या हुआ, पूरा घटनाक्रम जानने के लिए पढ़ें आगे…1947 में 11 अगस्त की तारीख पूरी तरह से भारत में रियासतों के विलय की राजनीति में उलझी हुई थी.
Azaadi Se Pehle Ke Woh Das Din: 11 अगस्त 1947 की तारीख कई मायनों में खास थी. आज का पूरा दिन लगभग भारत-पाकिस्तान के बंटवारे और कौन-कौन किसके पक्ष में जाएगा, इसी के इर्द गिर्द घूमता नजर आया. एक तरफ दंगो से जूझ रहे कोलकाता (तब कलकत्ता) में मौजूद महात्मा गांधी अपने ऊपर लगे आरोपों से बेहद दुखी थी. उन्होंने आज उन आरोपों पर खुलकर बात करने का फैसला किया था. वहीं दूसरी तरफ, बीकानेर की रियासत को लेकर नई-नई चाले चली जा रही थीं. बंटवारे में पासे पर जिन्ना की चाल और माउंटबेटन के पटलवार ने भारत की उम्मीदें बढ़ा दी थीं.
चलिए, कहानी की शुरूआत महात्मा गांधी पर लगे आरोप और उसके जवाब से करते हैं. 11 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी कोलकाता स्थिति अपने आश्रम में मौजूद थे. आश्रम में होने वाली प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए लोगों का बड़ा हुजूम आया था. लोगों के बीच इस बात को लेकर सुगबुगाहट भी थी कि महात्मा गांधी किसी खास मुद्दे पर बात करने वाले हैं. वहीं, प्रार्थना सभा के दौरान महात्मा गांधी के चेहरे पर बार-बार बदल रहे भावों ने लोगों के बीच बेचैनी बढ़ा दी थी. एक लंबी खामोशी के बाद बापू ने अपने संबोधन शुरू किया. उन्होंने कहा- आज मेरे सामने कुछ सवाल लाए गए हैं, आज मैं उन्हीं सवालों के जवाब देने वाला हूं.
महात्मा गांधी ने आगे कहा- मुझ पर आरोप है कि मेरी प्रार्थना सभाओं में अहम नेताओं और धनवान शख्सियतों को खास जगह मिलती है. सामान्य व्यक्ति को अगली कतार में कभी जगह नहीं दी जाती है. इस आरोप पर जवाब देते हुए महात्मा गांधी ने कहा- कल रविवार होने की वजह से लोगों की भीड़ कुछ ज्यादा ही हो गई थी. संभवत: इसी वजह से ऐसा हुआ हो. मैनें स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं से कह दिया है कि बिना व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं किया जाए.
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जिन्ना के हाथों में आई पाकिस्तान संविधान सभा की कमान
कराची में 11 अगस्त 1947 की सुबह करीब 9:55 बजे मोहम्मद अली जिन्ना अपनी शाही बग्घी से असेंबली भवन पहुंचे. यह दिन पाकिस्तान के इतिहास में बेहद अहम था. आज पाकिस्तान की संविधान सभा की पहली बैठक शुरू हो रही थी.
बैठक में गयासुद्दीन पठान, हमीदुल हक चौधरी, अब्दुल कासिम खान, लियाकत अली खान, ख्वाजा नजीमुद्दीन, एमके खुहरो और मौलाना शब्बीर अहमद उस्मानी के प्रस्ताव पर जिन्ना को संविधान सभा का अध्यक्ष घोषित कर दिया गया.
अध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद जिन्ना ने सभा को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि संविधान सभा के सामने दो बड़े मकसद हैं. पहला, पाकिस्तान का संविधान तैयार करना और दूसरा, देश को एक संपूर्ण राष्ट्र के रूप में अपने पैरों पर खड़ा करना.
जिन्ना ने कानून-व्यवस्था मजबूत करने के साथ रिश्वतखोरी और कालाबाजारी खत्म करने पर भी बात की. अपने भाषण में मोहम्मद अली जिन्ना ने धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अपना नजरिया रखा.
उन्होंने माना कि पंजाब और बंगाल में बहुत से लोग ऐसे हैं, जिन्होंने विभाजन को स्वीकार नहीं किया है. लेकिन उनका कहना था कि अब फैसला हो चुका है और पाकिस्तान के नागरिकों को अपने धर्म के अनुसार पूजा और इबादत करने की पूरी आजादी होगी.ना
कोई मंदिर जाए या मस्जिद, उसे किसी तरह की पाबंदी का सामना नहीं करना पड़ेगा. जिन्ना ने कहा कि पाकिस्तान में सभी धर्मों के लोग सद्भाव के साथ रहेंगे और धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा.
जिन्ना के जाल में फंसी बीकानेर रियासत
लॉर्ड माउंटबेटन के सामने एक दूसरी बड़ी चुनौती थी. कई रियासतें पाकिस्तान या भारत में विलय को लेकर असमंजस में थीं. माउंटबेटन नहीं चाहते थे कि छोटी-छोटी रियासतें स्वतंत्र रहने या पाकिस्तान के साथ जाने का फैसला करके भविष्य में नई मुश्किलें खड़ी करें. बीकानेर रियासत भी इसी उलझन में थी. बताया जाता है कि भोपाल के नवाब के प्रभाव में आकर बीकानेर ने भारत में विलय को लेकर अपना रुख बदल लिया था. इसी सिलसिले में माउंटबेटन ने बीकानेर के डॉ. कुंवर सिंह और सरदार पणिक्कर को बातचीत के लिए बुलाया. लंबी बैठक में उन्होंने उन्हें पाकिस्तान के साथ जाने के संभावित परिणाम समझाए. माउंटबेटन ने बताया कि पाकिस्तान के साथ करीबी भविष्य में उनके लिए राजनीतिक अस्थिरता और अनिश्चितता पैदा कर सकती है. बातचीत के बाद उन्हें भरोसा हो गया कि बीकानेर के पाकिस्तान में जाने की संभावना लगभग खत्म हो गई है.
हैदराबाद को माउंटबेटन ने दी दो महीने की मोहलत
बीकानेर की तरह हैदराबाद रियासत का रुख भी माउंटबेटन के लिए चिंता का विषय था. हैदराबाद के निजाम की पाकिस्तान की ओर झुकाव वाली मंशा अब माउंटबेटन समझ चुके थे. 11 अगस्त 1947 की दोपहर उन्होंने हैदराबाद के निजाम के नाम पत्र लिखवाया. इसमें भारत में शामिल होने के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए उन्हें दो महीने का अतिरिक्त समय दिया गया. इस तरह आजादी से ठीक पहले रियासतों को लेकर माउंटबेटन की कूटनीति भी तेज हो चुकी थी.
(इस खबर के कुछ अंध प्रशांत पोल की पुस्तक ‘वे पंद्रह दिन’ से लिए गए हैं.)
About the AuthorAnoop Kumar MishraAssistant Editor
Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international…
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August 11, 2026, 17:11 IST



