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कहां गई वो भारत की वो ट्रेन: 97 साल पुरानी ‘फ्रंटियर मेल’ आज किस नाम और कौन से रूट पर चल रही?

Golden Temple Mail old name. आज सुविधाजनक और सेमी हाई स्‍पीड ट्रेन की बात की जाए तो सबसे पहला नाम वंदेभारत का आता है. हालांकि इसके साथ ही प्रीमियम ट्रेनों में राजधानी, शताब्‍दी, तेजस जैसी ट्रेनों का नाम भी ऊपर आता है. लेकिन आजादी से पहले जब ये ट्रेनें नहीं थी, तब सबसे पंसदीदा ट्रेनों में एक ‘फ्रंटियर मेल’ होती है. इस ट्रेन से अंग्रेज अफसरों के अलावा संपन्‍न भारतीय सफर करते थे. आज यह ट्रेन गोल्‍डेन टेंपल एक्‍सप्रेस के नाम से चल रही है.

अंग्रेजों के जमाने की सबसे प्रतिष्ठित, तेज और आरामदायक ट्रेनों में एक फ्रंटियर मेल होती थी, जो 1929 में शुरू हुई थी. उस समय यह ट्रेन मुंबई (तब बॉम्बे) से पेशावर के बीच चलती थी. यानी उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (अब पाकिस्तान) को भारत से कनेक्‍ट करने वाली मुख्‍य ट्रेन थी, इस वजह से इसका नाम फ्रंटियर मेल रखा गया था. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1930 में लंदन के ‘द टाइम्स’ ने इसे ब्रिटिश साम्राज्य में चलने वाली एक्सप्रेस ट्रेनों में से सबसे प्रसिद्ध बताया था.

आज गोल्‍डेन टेंपल मेल से से चलती है ट्रेन.

कितने दिन में सफर करती थी पूरा

मुंबई से पेशावर की दूरी करीब 2600 किलोमीटर थी. इस पूरी को पूरा करने में ट्रेन को करीब 60 घंटे लगते थे. शुरू में ट्रेन दिल्ली, लाहौर और रावलपिंडी जैसे बड़े शहरों में रुकती थी. इस तरह लंबी दूरी तय करने वाली ट्रेनों में यह प्रमुख होती थी.

कोचों को कैसे किया जाता था ठंडा

उस दौर में चूंकि यह ट्रेन ब्रिटिश शासनकाल में संपन्‍न लोगों, ब्‍यूरोक्रेट्स और पसंददीदा ट्रेन होती थी. गर्मी में इस ट्रेन में सफर करने में यात्रियों को परेशानी न हो. इस वजह से 1934 में इसमें एयर-कंडीशंड कोच जोड़े गए, जिससे यह भारत की पहली एसी ट्रेन बनी. इतना ही नहीं इससे पहले भी कोचों को ठंड करने के लिए खास जुगाड़ किया गया था. उस समय फर्श बर्फ भरी जाती थी, जिससे कोच ठंडे रहे और यात्रियों को गर्मी का अहसासन हो. यह सुविधा फर्स्ट क्लास और डाइनिंग कोच में होती थी. इस क्‍लास में संपन्‍न लोग सफर करते थे.

आज वंदे भारत एक्‍सप्रेस सबसे खास है, लेकिन आजादी से पहले फ्रंटियर मेल सबसे पसंदीदा थी.
यह ट्रेन 1928में शुरू हुई, जो मुंबई से पेशावर तक चलती थी.
1930 में लंदन के ‘द टाइम्स’ ने इसे ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे प्रसिद्ध एक्सप्रेस ट्रेन बताया.
ट्रेन पूरा सफर करीब 60 घंटे पूरी करती थी.
ट्रेन में 1934 में एसी कोच जोड़े गए, जिससे यह भारत की पहली एसी ट्रेन बनी.

आज कहां तक चलती है ट्रेन

साल 1947 के बंटवारे के बाद इस ट्रेन का रूट और नाम दोनों बदल गए. चूंकि पेशावर पाकिस्तान में चला गया, इसलिए वहां तक ट्रेन नहीं जा सकती थी. इस वजह से फैसला किया गया कि ट्रेन को अमृतसर तक सीमित कर दिया जाए. खास बात यह है कि इसका नाम बदला नहीं गया और फ्रंटियर मेल के नाम से मुंबई से अमृतसर के बीच दौड़ती रही.

कब बदला गया नाम

आजादी के बाद करीब 49 साल तक ट्रेन पुराने नाम से दौड़ती रही लेकिन 1996 में इस ट्रेन का नाम बदलने का फैसला लिया गया और भारतीय रेलवे ने इसका नाम ‘गोल्डन टेंपल मेल’ रख दिया, यह नाम अमृतसर के प्रसिद्ध धाार्मिक स्‍थल स्वर्ण मंदिर की वजह से रखा गया. आज मुंबई से अमृतसर जाने के लिए यह प्रमुख ट्रेन है.

कितने घंटे में पूरा करती है सफर

मुंबई सेंट्रल से अमृतसर जंक्शन के बीच चलने वाली यह ट्रेन कुल 1893 किमी का सफर करीब 31 घंटे में पूरा करती है. यात्रियों की सुवधिा को ध्‍यान में रखते हुए इसमें एलएचबी कोच लगे हैं जो सुरक्षा के हिसाब से भी बेहतर हैं. इसमें फर्स्ट, सेकेंड और थर्ड एसी सहित स्लीपर व जनरल क्लास कोच मिलाकर 22 से 24 कोच हैं. इस तरह करीब 97 साल से फर्स्‍ट एसी कोच इस ट्रेन में लग रहे हैं.

फ्रंटियर मेल कब शुरू हुई थी?ट्रेन 1928-1929 में शुरू हुई थी।

पहले फ्रंटियर मेल कहां से कहां तक चलती थी?मुंबई (तब बॉम्बे) से पेशावर (उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, अब पाकिस्तान) तक।

फ्रंटियर मेल का नाम क्यों रखा गया था?उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत को जोड़ने की वजह से, इसलिए फ्रंटियर मेल नाम पड़ा।

पहले सफर कितने समय में पूरा होता था?मुंबई से पेशावर की 2600 किमी दूरी करीब 60 घंटे में पूरी होती थी।

फ्रंटियर मेल भारत की पहली एसी ट्रेन क्यों मानी जाती है?1934 में इसमें एयर-कंडीशंड कोच जोड़े गए; इससे पहले फर्श पर बर्फ भरकर कोच ठंडे किए जाते थे।

स्‍टापेज कहां-कहां

पूरे सफर के दौरान यह ट्रेन सूरत, वडोदरा, रतलाम, कोटा, हजरत निजामुद्दीन, लुधियाना और जालंधर जैसे प्रमुख शहरों रुकती है. आज भी यह वीआईपी ट्रेनों में से एक है.

ट्रेन से लोग क्‍यों मिलाते थे घड़ी

ट्रेन के संबंध में बताया जाता है कि घड़ी लेट हो सकती है लेकिन ट्रेन नहीं. यही वजह है कि लोग ट्रेन को देखकर अपनी घड़ी मिलाते थे. इस ट्रेन की पंप्‍यूअलिटी को लेकर यहां तक कहां जाता है कि एक बार ट्रेन 15 मिनट लेट हो गयी तो इसके जांच के आदेश दिए गए थे. इतना ही नहीं रेलवे अभिलेखागार के मुताबिक जब फ्रंटियर मेल मुंबई पहुंचती थी तो इसके सुरक्षित आगमन की जानकारी देने के लिए ऊंची इमारतों से विशेष लाइटिंग की जाती थी.

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