ना फैक्ट्री, ना मशीन… फिर भी देशभर में डिमांड! 100 साल से चल रही इस खाट की परंपरा आज भी क्यों है सुपरहिट? जानें

Last Updated:April 30, 2026, 12:56 IST
Karauli Hindi News: करौली जिले के अटा गांव की बबूल की लकड़ी से बनी खाट ने राजस्थान में अपनी अलग पहचान बनाई है. यह परंपरा करीब 100 साल पुरानी है, जिसे आज भी स्थानीय कारीगर पूरी लगन और मेहनत से जीवित रखे हुए हैं. बिना किसी आधुनिक मशीन के हाथों से तैयार की जाने वाली ये खाटें मजबूती और टिकाऊपन के लिए जानी जाती हैं. ग्रामीण जीवन की झलक दिखाने वाली यह कला न केवल स्थानीय रोजगार का साधन है, बल्कि राजस्थान की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा को भी दर्शाती है. आज भी इसकी मांग दूर-दूर तक बनी हुई है.
खासतौर पर यहां बबूल की लकड़ी से हाथों से तैयार की जाने वाली खाट ने इस गांव को दूर-दूर तक पहचान दिलाई है. अटा गांव में लकड़ी का काम केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा एक पारंपरिक हुनर है.
राजस्थान के कई गांव अपनी खास पहचान के लिए जाने जाते हैं, लेकिन पूर्वी राजस्थान के करौली जिले का अटा गांव अपनी अनोखी कारीगरी और परंपरागत हुनर के कारण के लिए अपनी खास पहचान रखता है. शहर से करीब 11 किलोमीटर दूर स्थित यह छोटा सा गांव आज भी अपनी सदियों पुरानी लकड़ी की कला को जीवित रखे हुए है.
यहां के कारीगर बिना किसी आधुनिक मशीन के, अपने हाथों की कला से मजबूत और टिकाऊ फर्नीचर के आइटम तैयार करते हैं. गांव के कारीगर मुकेश माली बताते हैं हमारी बबूल की लकड़ी से बनी खाट की उम्र करीब 25 से 30 साल तक होती है. एक बार बुनी गई खाट वर्षों तक बिना किसी नुकसान के उपयोग में रहती है.
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अटा गांव आज भी यह साबित करता है कि सच्ची कारीगरी और गुणवत्ता समय के साथ कभी पुरानी नहीं होती. आधुनिकता के दौर में भी यह गांव अपनी पारंपरिक पहचान को संजोए हुए है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना हुआ है.
अटा गांव की लकड़ी से बने उत्पादों की मांग केवल करौली या आसपास के इलाकों तक सीमित नहीं है. अजमेर, जोधपुर, बाड़मेर और जैसलमेर जैसे शहरों तक यहां के उत्पाद सप्लाई किए जाते हैं. कारीगरों का दावा है कि यहां की क्वालिटी का मुकाबला पूरे राजस्थान में कहीं नहीं मिलता.
इस गांव की खाट की सबसे बड़ी खासियत मजबूती और टिकाऊपन है. जहां अन्य जगहों पर कच्ची या चिरौल लकड़ी का इस्तेमाल होता है, वहीं अटा गांव में केवल बबूल की मजबूत लकड़ी का उपयोग किया जाता है. यही कारण है कि यहां बने फर्नीचर में घुन या बीमारी नहीं लगती और यह लंबे समय तक सुरक्षित रहता है. इसके अलावा यहां तख्त और लकड़ी की दुकानों का निर्माण भी किया जाता है, जिनकी उम्र 40 से 50 साल तक बताई जाती है.
गांव के बुजुर्ग कारीगर हरि सिंह माली के अनुसार, अटा गांव में लकड़ी का यह काम करीब 100 वर्षों से लगातार जारी है. बदलते समय और आधुनिक फर्नीचर के बढ़ते चलन के बावजूद इस पारंपरिक काम की अहमियत आज भी कम नहीं हुई है. यहां बनने वाली चारपाई और तख्त आज भी बाजार में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं.
भले ही समय के साथ इस काम का दायरा थोड़ा कम हुआ हो, लेकिन आज भी करौली के अटा गांव के करीब 500 लोगों की रोजी-रोटी इसी कारीगरी पर निर्भर है. यह हुनर न सिर्फ परंपरा को जीवित रखे हुए है, बल्कि गांव की अर्थव्यवस्था का भी मजबूत आधार बना हुआ है.
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April 30, 2026, 12:56 IST



