थलापति विजय में दिख रहा इस शख्स का भूत, क्या है वो 50 साल पुरानी घटना जिसे आज तक नहीं भूले स्टालिन

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विजय में दिख रहा इस शख्स का भूत, क्या है वो 50 साल पुरानी घटना, नहीं भूली DMK
Last Updated:May 08, 2026, 13:19 IST
Thalapathy Vijay Latest News Update: तमिलनाडु में टीवीके की सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी थलापति विजय का सीएम बनने का सपना टूटता हुआ नजर आ रहा है. इस पूरे खेल में DMK और उसके नेता एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन की भूमिका एक खलनायक की बतायी जा रही है. सूत्र बताते हैं कि स्टालिन को 1970-80 के दशक का भूत खाये जा रहा है. उसे लगता है कि एक बार विजय को कुर्सी मिल गई तो उन्हें उतारना लगभग नामुमकिन हो जाएगा.
1977 में जीत हासिल करने के बाद लगातार तीन चुनावों में एमजीआर ने जीत हासिल की थी.
Thalapathy Vijay Latest News Update: तमिलनाडु में टीवीके के सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी थलापति विजय के सरकार नहीं बना पाने के पीछे की कहानी सपाट नहीं बल्कि जलेबी की तरह टेढ़ी है. 108 सीट जीतने के बावजूद विजय 10 और विधायकों का समर्थन नहीं जुटा पा रहे हैं. इसमें एक सबसे बड़ी वजह करीब 50 साल पुरानी एक घटना है. उस घटना की वजह से थलापति विजय में कई दलों को एक भूत दिख रहा है. वह उस भूत इतने डरे हैं कि वे अपने जानी दुश्मनों के साथ भी हाथ मिलने से परहेज नहीं कर सकते. यह भूत राज्य की सत्ता, द्रविड़ राजनीति और डीएमके की राजनीतिक मानसिकता से जुड़ाॉ है.
दरअसल, आज अभिनेता से नेता बने विजय की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता को देखकर एम के स्टालिन और डीएमके के भीतर बेचैनी बढ़ रही है. वजह सिर्फ यह नहीं कि विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) चुनाव में बड़ी ताकत बनकर उभरी है, बल्कि असली डर उस इतिहास का है जिसे डीएमके कभी भूल नहीं पाई. वो हैं एम जी रामचंद्रन यानी MGR का उदय.
जब डीएमके से निकाले गए MGR
बात 1972 की है. वह तमिल राजनीति का निर्णायक साल था. उस समय एमजीआर सिर्फ एक सुपरस्टार अभिनेता ही नहीं, बल्कि डीएमके के सबसे लोकप्रिय चेहरों में शामिल थे. एमजीआर ने पार्टी नेतृत्व पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और सार्वजनिक तौर पर हिसाब मांगना शुरू किया. यह बात तत्कालीन डीएमके नेतृत्व को नागवार गुजरी. 10 अक्टूबर 1972 को डीएमके कार्यकारिणी ने एमजीआर को निलंबित कर दिया और चार दिन बाद पार्टी से स्थायी रूप से बाहर कर दिया गया. लेकिन डीएमके शायद उस समय यह नहीं समझ पाई कि वह जिस नेता को बाहर निकाल रही है, वही आगे चलकर उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन जाएगा.
17 अक्टूबर 1972… और बदल गई तमिल राजनीति
पार्टी से निकाले जाने के सिर्फ तीन दिन बाद एमजीआर ने नई पार्टी- अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (ADMK) बनाई, जिसे बाद में AIADMK कहा गया. एमजीआर ने खुद को सीएन अन्नादुरै की असल विरासत का उत्तराधिकारी बताया. उनकी सबसे बड़ी ताकत थी उनकी जबरदस्त लोकप्रियता और राज्यभर में फैले फैन क्लब. उन्होंने इन फैन क्लबों को सीधे पार्टी संगठन में बदल दिया. यही वह मास्टरस्ट्रोक था जिसने AIADMK को कुछ ही वर्षों में जमीनी ताकत बना दिया. आज विजय भी लगभग उसी रास्ते पर चलते दिख रहे हैं. फिल्मों से निकली लोकप्रियता, युवा समर्थकों का नेटवर्क और सीधे जनता से संवाद- इन सबने डीएमको को एमजीआर के दौर की याद दिला दी है.
1977 में डीएमके की सत्ता छीन ली थी
1977 में हुए विधानसभा चुनाव तमिल राजनीति का टर्निंग पॉइंट साबित हुए. एमजीआर की AIADMK ने डीएमके को सत्ता से बाहर कर दिया और एमजीआर पहली बार मुख्यमंत्री बने. इसके बाद लगभग एक दशक तक उन्होंने तमिल राजनीति पर ऐसा दबदबा बनाया कि डीएमके लगातार संघर्ष करती रही. एमजीआर ने 1977, 1980 और 1984 लगातार तीन चुनाव जीते और हर चुनौती को पीछे छोड़ दिया. यही वह दौर था जिसने डीएमके नेतृत्व के भीतर एक स्थायी डर पैदा कर दिया. फिल्मी करिश्मा अगर राजनीति में बदल जाए, तो द्रविड़ राजनीति का पूरा समीकरण उलट सकता है.
एमके स्टालिन को थलापति विजय से डर क्यों?
आज डीएमके के भीतर जो बेचैनी दिखाई दे रही है, उसका सीधा संबंध इसी इतिहास से है. सूत्रों के मुताबिक एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन समेत डीएमके का एक बड़ा वर्ग मानता है कि विजय भविष्य में नए एमजीआर बन सकते हैं. टीवीके का तेजी से उभरना, युवाओं में विजय की लोकप्रियता और पहले ही चुनावी लड़ाई में बड़ी सफलता ने डीएमके को अलर्ट कर दिया है. पार्टी को डर है कि अगर विजय को सत्ता मिल गई, तो वह भी एमजीआर की तरह लंबे समय तक तमिल राजनीति के केंद्र में रह सकते हैं.
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा और सत्ता का रिश्ता हमेशा गहरा रहा है. अन्नादुरै, करुणानिधि, एमजीआर, जयललिता- सभी ने फिल्मों की लोकप्रियता को राजनीतिक ताकत में बदला. अब विजय उसी परंपरा की नई कड़ी बनते दिख रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार डीएमके पहले से ज्यादा सतर्क है. शायद यही वजह है कि आज तमिल राजनीति में ऐसे समीकरण बनते दिख रहे हैं, जिन्हें कभी असंभव माना जाता था. क्योंकि डीएमके अच्छी तरह जानती है कि अगर एक बार कोई नया एमजीआर जनता के दिल में बैठ गया, तो उसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है.
About the Authorसंतोष कुमार
न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स…और पढ़ें
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