ठुमरी की रानी, 5 साल की आयु से ली संगीत की तालीम, 90 रुपये के चेक ने बना दिया बड़ा स्टार

Last Updated:May 08, 2026, 04:01 IST
‘ठुमरी की रानी’ गिरिजा देवी का जन्म वाराणसी में हुआ था. गिरिजा देवी ने उस दौर में संगीत चुना जब महिलाओं के लिए यह आसान नहीं था. उनके पिता के साथ ने उन्हें शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखने में मदद की. उनके करियर का बड़ा मोड़ 1949 में इलाहाबाद रेडियो का ऑडिशन था, जहां उन्हें 90 रुपये का मेहनताना मिला, जो उस समय बड़े कलाकारों का मानक था. गिरिजा देवी ने ठुमरी, कजरी और चैती जैसी शैलियों को नई पहचान दिलाई. उन्हें पद्म विभूषण सहित कई बड़े सम्मानों से नवाजा गया.
नई दिल्ली:भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में गिरिजा देवी एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने ठुमरी को गली-मोहल्लों से निकालकर दुनिया के बड़े मंचों तक पहुँचाया. उनकी आवाज़ में जो बनारसी मिठास और ठहराव था, उसने उन्हें ‘ठुमरी की रानी’ बना दिया. लेकिन उनकी यह कामयाबी इतनी आसान नहीं थी; यह कहानी उस दौर की है जब समाज में महिलाओं का संगीत सीखना या मंच पर आना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी. (फोटो साभार: Instagran@indianhistorylive/AI)
गिरिजा देवी का जन्म 8 मई 1929 को वाराणसी के पास एक गाँव में हुआ था. उनके पिता रामदेव राय एक ज़मींदार थे और संगीत के दीवाने थे. वो अक्सर बड़ी-बड़ी संगीत सभाओं में जाया करते थे और छोटी गिरिजा को भी अपने साथ ले जाते थे. बस यहीं से नन्ही गिरिजा के मन में सुरों ने घर कर लिया. पिता ने अपनी बेटी की प्रतिभा को पहचाना और समाज की पुरानी सोच को दरकिनार करते हुए उन्हें संगीत सिखाने का फैसला किया.(फोटो साभार: IANS)
पांच साल की उम्र से ही गिरिजा की तालीम शुरू हो गई थी. पंडित सरजू प्रसाद मिश्रा उनके पहले गुरु बने, जिन्होंने उन्हें ‘ख्याल’ और ‘टप्पा’ जैसी मुश्किल शैलियों की बारीकियां सिखाईं. गिरिजा घंटों रियाज करती थीं, लेकिन घर के बाकी लोग उनके इस शौक के खिलाफ थे. उनकी मां और दादी को डर था कि संगीत की वजह से घर-गृहस्थी पर बुरा असर पड़ेगा, पर पिता चट्टान की तरह उनके साथ खड़े रहे. (फोटो साभार: Instagram)
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गिरिजा देवी के करियर का सबसे बड़ा मोड़ 1949 में आया, जब उन्हें इलाहाबाद रेडियो से ऑडिशन के लिए बुलावा मिला. यह ऑडिशन कोई मामूली परीक्षा नहीं थी; यह करीब डेढ़ घंटे तक चला. उन्होंने अपनी पूरी जान लगाकर राग देसी, ठुमरी और टप्पा सुनाया. जब रेडियो स्टेशन से उन्हें लेटर मिला, तो उसमें 90 रुपये का चेक था. उस जमाने में यह बहुत बड़ी रकम थी, जो सिर्फ दिग्गज कलाकारों को ही मिला करती थी.(फोटो साभार: Instagram)
इस 90 रुपये के चेक ने गिरिजा देवी को यह यकीन दिला दिया कि अब वो संगीत की दुनिया के बड़े सितारों की कतार में खड़ी हो चुकी हैं. इसके बाद 1951 में बिहार के आरा में उनका पहला मंचीय प्रोग्राम हुआ, जहाँ उनकी गायकी ने लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया. धीरे-धीरे उनकी ख्याति चारों तरफ फैल गई और ठुमरी के साथ-साथ कजरी, चैती और होरी जैसी विधाओं में उनका कोई सानी नहीं रहा. (फोटो साभार: Instagram)
गिरिजा देवी ने सिर्फ गाया ही नहीं, बल्कि भारतीय संगीत को सहेजने का काम भी किया. उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और यहाँ तक कि पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा. उन्होंने आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी में बरसों तक नई पीढ़ी को संगीत सिखाया, ताकि बनारस घराने की यह विरासत कभी खत्म न हो. (फोटो साभार: Instagram)
24 अक्टूबर 2017 को गिरिजा देवी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके गाए हुए सुर आज भी फिजाओं में गूंजते हैं. उनकी कहानी हमें सिखाती है कि अगर आपके पास हुनर है और अपनों का साथ, तो 90 रुपये की शुरुआत भी आपको ‘रानी’ के सिंहासन तक पहुँचा सकती है. ‘ठुमरी की रानी’ के बिना भारतीय शास्त्रीय संगीत का इतिहास हमेशा अधूरा रहेगा. (फोटो साभार: Instagram)
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