सात समंदर पार जब बजा ‘ध्रुपद’ का डंका, उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर के पीछे भारत खिंचे चले आए विदेशी!

Last Updated:May 08, 2026, 05:16 IST
उदयपुर के संगीत घराने में जन्मे उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर ने लुप्त होती ‘ध्रुपद’ शैली को न केवल दोबारा जीवित किया, बल्कि इसे ऑस्ट्रिया और फ्रांस जैसे देशों तक पहुंचाया. उन्होंने भोपाल के ध्रुपद केंद्र में 25 सालों तक गुरु के रूप में नई पीढ़ी को तैयार किया, जिनमें गुंडेचा बंधु जैसे नाम शामिल हैं. तानसेन सम्मान और टैगोर रत्न से सम्मानित डागर साहब ने संगीत को साधना माना. वे अपनी आवाज की गहराई से ग्लोबल स्तर पर भारतीय शास्त्रीय संगीत का मान बढ़ाया.
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संगीतकार ने ‘ध्रुपद’ गायन शैली को दुनियाभर में पॉपुलर बनवाया.
नई दिल्ली: उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी संगीत की सबसे पुरानी और शुद्ध शैली ‘ध्रुपद’ को जिंदा रखने में लगा दी. 15 जून 1932 को उदयपुर के एक संगीत प्रेमी परिवार में जन्मे डागर साहब के रग-रग में सुर बसे थे. उनके पिता खुद महाराणा के दरबारी संगीतकार थे. उन्होंने बचपन से ही सुरों के साथ खेलना शुरू कर दिया था और बाद में अपने बड़े भाई उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर की देखरेख में अपनी गायकी को उस मुकाम पर पहुंचाया जहां ध्रुपद की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई देने लगी. एक वक्त ऐसा था जब ध्रुपद शैली लुप्त होने की कगार पर थी, लेकिन डागर भाइयों की जोड़ी ने इसे न सिर्फ सहेजा, बल्कि सात समंदर पार ऑस्ट्रिया और फ्रांस जैसे देशों तक पहुंचा दिया. उन्होंने विदेशों में रहकर वहां के लोगों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सिखाईं, जो उस दौर में एक बहुत बड़ी और दुर्लभ बात मानी जाती थी.
डागर साहब की गायकी की सबसे बड़ी खासियत उनकी आवाज की गहराई और गंभीरता थी, जो सुनने वालों को एक अलग ही रूहानी सुकून देती थी. साल 1980 के दशक में जब वो यूरोप में संगीत सिखा रहे थे, तब कई विदेशी छात्र सिर्फ उनकी गायकी की कशिश की वजह से भारत खिंचे चले आते थे. उनके शिष्य उन्हें केवल एक उस्ताद नहीं, बल्कि अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानते थे. आगे चलकर जब मशहूर फिल्म निर्देशक मणि कौल ने उनसे संपर्क किया, तो उनका जुड़ाव मध्य प्रदेश के भोपाल से हुआ. वहां सरकार ने ध्रुपद केंद्र की जिम्मेदारी डागर साहब को सौंपी, जहां उन्होंने करीब 25 सालों तक नई पीढ़ी को तैयार किया. आज के दौर के दिग्गज कलाकार जैसे गुंडेचा बंधु और उदय भावलकर उन्हीं की कड़ी मेहनत और तालीम का नतीजा हैं. उन्होंने संगीत को सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि एक साधना की तरह जिया और सिखाया.
ध्रुपद गायन को दी नई पहचान संगीत जगत में उनके इसी बेमिसाल योगदान के लिए उन्हें तानसेन सम्मान, संगीत नाटक अकादमी और टैगोर रत्न जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया. डागर साहब ने ध्रुपद को केवल राजा-महाराजाओं के दरबारों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे आम जनता और वैश्विक मंचों तक पहुंचाकर एक नई पहचान दी. 8 मई 2013 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन पनवेल के पास अपने गुरुकुल में उन्होंने जो सुर बोए थे, वो आज भी उनके शिष्यों की आवाज में जिंदा हैं. उनकी कहानी हमें बताती है कि अगर इरादे मजबूत हों और अपनी जड़ों से जुड़ाव गहरा हो, तो आप अपनी संस्कृति का परचम दुनिया के किसी भी कोने में लहरा सकते हैं. उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर का नाम हमेशा ध्रुपद के उस सूरज की तरह याद रखा जाएगा, जिसने इस प्राचीन शैली को फिर से रोशन किया.
About the AuthorAbhishek NagarSenior Sub Editor
अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ में सीनियर सब एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. दिल्ली के रहने वाले अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. उन्होंने एंटरटेनमेंट बीट के अलावा करियर, हेल्थ और पॉल…और पढ़ें
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