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इंग्लैंड में बनी यह आयरन मशीन आज भी बाड़मेर में जिंदा, रेगिस्तान की प्यास बुझाने की सुनाती है कहानी

Last Updated:May 09, 2026, 11:23 IST

Barmer Local Story: बाड़मेर के गडरारोड में करीब सौ साल पुरानी इंग्लैंड निर्मित पानी खींचने वाली रेलवे मशीन आज भी सुरक्षित, रेगिस्तान का आयरन वंडर और ऐतिहासिक धरोहर मानी जाती है. ब्रिटिश काल में गडरारोड इलाके में पानी की भारी कमी रहती थी. ऐसे में रेलवे संचालन और कर्मचारियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस इंजन का उपयोग कुओं से पानी खींचने में किया जाता था.

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बाड़मेर. रेगिस्तान की तपती रेत में जहां पानी की एक-एक बूंद की कीमत सोने से कम नहीं मानी जाती, वहीं बाड़मेर के गडरारोड में खड़ी एक पुरानी मशीन आज भी बीते दौर की कहानी बयां करती नजर आती है. इंग्लैंड में बनी यह भारी-भरकम मशीन कभी कुओं से पानी निकालकर रेलवे और आसपास के इलाकों की प्यास बुझाने का काम करती थी. खास बात यह है कि यह मशीन आज भी रेलवे के अधीन सुरक्षित रखी गई है.

करीब एक सदी पुरानी यह मशीन आज भी उसी मजबूती के साथ खड़ी दिखाई देती है. लोहे से बनी इस विशाल संरचना को देखकर लोग हैरान रह जाते हैं कि बिना आधुनिक तकनीक के उस दौर में इतनी मजबूत और टिकाऊ मशीन आखिर कैसे तैयार की गई होगी. ब्रिटिश काल में गडरारोड इलाके में पानी की भारी कमी रहती थी. ऐसे में रेलवे संचालन और कर्मचारियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस इंजन का उपयोग कुओं से पानी खींचने में किया जाता था.

समय बदला, लेकिन मशीन की मजबूती नहींसमय के साथ तकनीक बदलती चली गई. भाप इंजन की जगह डीजल और इलेक्ट्रिक मोटरों ने ले ली, लेकिन गडरारोड में मौजूद यह मशीन आज भी इतिहास की खामोश निशानी बनकर खड़ी है. भारतीय रेलवे आज भी इसकी सुरक्षा और देखरेख कर रहा है. बताया जाता है कि यह मशीन भाप और मैकेनिकल सिस्टम के जरिए चलती थी. इसके माध्यम से बड़े स्तर पर पानी निकाला जाता था, जिससे रेलवे स्टेशन और आसपास के क्षेत्रों तक पानी पहुंचाया जाता था.

रेगिस्तान का आयरन वंडर कही जाती है यह मशीनस्थानीय लोग इस मशीन को रेगिस्तान का आयरन वंडर भी कहते हैं. वजह यह है कि इतने वर्षों बाद भी इसकी संरचना मजबूती के साथ मौजूद है. रेलवे अधिकारियों के मुताबिक इसी इंजन के जरिए कुओं से पानी निकालकर दूर-दूर तक सप्लाई किया जाता था. यहां से पानी पाकिस्तान के हैदराबाद तक भेजे जाने की भी बात कही जाती है. सबसे खास बात यह है कि आज भी इस मशीन को उसी सावधानी और संरक्षण के साथ रखा गया है, जैसा पहले किया जाता था.

हर मौसम की मार के बावजूद सुरक्षितगडरारोड का इलाका भारत-पाक सीमा के बेहद करीब होने के कारण ऐतिहासिक रूप से भी काफी अहम माना जाता है. विभाजन से पहले यहां रेल गतिविधियां काफी सक्रिय थीं और सिंध की ओर जाने वाली ट्रेनों का संचालन भी इसी क्षेत्र से जुड़ा हुआ था. रेगिस्तान की भीषण गर्मी, धूल भरी आंधियों और मौसम की मार झेलने के बावजूद यह मशीन आज भी सही सलामत खड़ी है. यही वजह है कि इसे देखने आने वाले लोग इसे सिर्फ एक पुरानी मशीन नहीं, बल्कि इतिहास की जीवित निशानी मानते हैं.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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