बीकानेर में गंदे पानी से बन रही बिजली, BTU की इस तकनीक ने वैज्ञानिकों को भी चौंकाया

Last Updated:May 13, 2026, 18:33 IST
Bikaner News: बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने फूड इंडस्ट्री के वेस्ट वॉटर से सस्ती माइक्रोबियल फ्यूल सेल तकनीक विकसित की, जो बिजली बनाते हुए सीओडी 70 से 85 प्रतिशत घटाती है. इस तकनीक की सबसे खास बात इसकी कम लागत है. बाजार में उपलब्ध कमर्शियल माइक्रोबियल फ्यूल सेल की कीमत करीब एक लाख रुपये तक होती है, जबकि बीटीयू की टीम ने इसे रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली सामान्य वस्तुओं से तैयार कर इसकी लागत 10 हजार रुपये से भी कम रखी है.
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बीकानेर. आमतौर पर फूड इंडस्ट्री से निकलने वाला वेस्ट वॉटर नालियों में बहा दिया जाता है और इसे बेकार व प्रदूषण फैलाने वाला माना जाता है. लेकिन अब यही वेस्ट वॉटर बिजली पैदा करने में काम आएगा. बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसने पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में नई उम्मीद जगाई है.
विश्वविद्यालय के शोधार्थी लक्ष्मी नारायण सुथार ने अपने सुपरवाइजर डॉ. गायत्री शर्मा और को-सुपरवाइजर डॉ. महेंद्र भादू के मार्गदर्शन में फूड ग्रेड इंडस्ट्री के वेस्ट वॉटर से बिजली उत्पादन करने वाला माइक्रोबियल फ्यूल सेल तैयार किया है.
कम लागत में तैयार हुई तकनीकइस तकनीक की सबसे खास बात इसकी कम लागत है. बाजार में उपलब्ध कमर्शियल माइक्रोबियल फ्यूल सेल की कीमत करीब एक लाख रुपये तक होती है, जबकि बीटीयू की टीम ने इसे रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली सामान्य वस्तुओं से तैयार कर इसकी लागत 10 हजार रुपये से भी कम रखी है. यह इनोवेशन वेस्ट इज वेल्थ की सोच को मजबूत करता नजर आ रहा है.
शोध टीम के अनुसार फूड इंडस्ट्री के वेस्ट वॉटर में ऑर्गेनिक पदार्थों की मात्रा काफी ज्यादा होती है. इसी कारण उसमें सीओडी यानी केमिकल ऑक्सीजन डिमांड भी अधिक रहती है. वेस्ट वॉटर में मौजूद प्राकृतिक बैक्टीरिया इन ऑर्गेनिक पदार्थों को तोड़ते हैं. इस प्रक्रिया के दौरान इलेक्ट्रॉन्स रिलीज होते हैं, जिन्हें माइक्रोबियल फ्यूल सेल के जरिए कैप्चर कर बिजली में बदला जाता है.
कैसे काम करती है यह प्रक्रियाडॉ. गायत्री शर्मा ने बताया कि यह पूरी प्रक्रिया बायो-इलेक्ट्रोकेमिकल सिद्धांत पर आधारित है. इसमें एनोड पर ऑक्सीकरण होता है, जहां इलेक्ट्रॉन्स और प्रोटॉन्स अलग होते हैं. इलेक्ट्रॉन्स बाहरी सर्किट से गुजरते हुए बिजली पैदा करते हैं, जबकि प्रोटॉन्स कैथोड तक पहुंचते हैं और वहां ऑक्सीजन के साथ मिलकर पानी बना देते हैं.
उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया में किसी बाहरी केमिकल या हाई टेम्परेचर की जरूरत नहीं पड़ती. यही वजह है कि यह तकनीक पूरी तरह पर्यावरण हितैषी मानी जा रही है.
भविष्य में बड़े स्तर पर हो सकता है इस्तेमालडॉ. महेंद्र भादू ने बताया कि इस तकनीक का दोहरा फायदा देखने को मिलता है. एक तरफ वेस्ट वॉटर का ट्रीटमेंट होता है और उसकी सीओडी 70 से 85 प्रतिशत तक कम हो जाती है, वहीं दूसरी ओर उसी प्रक्रिया से बिजली भी उत्पन्न होती है. इससे ट्रीटेड पानी का दोबारा उपयोग किया जा सकता है और प्रदूषण भी कम होता है. शोधकर्ताओं का मानना है कि आने वाले समय में यह तकनीक जीरो लिक्विड डिस्चार्ज सिस्टम की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है.
इसे बड़े स्तर पर लागू कर इंडस्ट्री में पानी की खपत 40 से 50 प्रतिशत तक घटाई जा सकती है. साथ ही इसे सोलर और बायोगैस सिस्टम के साथ जोड़कर मल्टी-सोर्स एनर्जी सिस्टम में भी बदला जा सकता है. डॉ. परबंत सिंह संधू और प्रोफेसर अखिल रंजन गर्ग ने इस उपलब्धि को विश्वविद्यालय और प्रदेश के लिए गर्व का विषय बताया.
About the AuthorAnand Pandey
आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें
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