‘चुप रहने का मतलब सरेंडर करना होता’, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा, दिल्ली HC के फैसले की 10 बड़ी बातें

नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी (AAP) के चार अन्य वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू कर दी है. जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज और दुर्गेश पाठक के खिलाफ यह आदेश जारी किया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन नेताओं ने कथित तौर पर एक सुनियोजित कैंपेन चलाकर न केवल एक जज की छवि खराब करने की कोशिश की, बल्कि पूरी न्यायिक संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाई है. जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि कोर्ट को डराने और दबाव में लाने की कोशिशों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. यह मामला एक्साइज पॉलिसी केस से जुड़ी सुनवाइयों के दौरान सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस में की गई टिप्पणियों से जुड़ा है.
अपने आदेश में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने क्या कहा?
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने आदेश में बेहद गंभीर टिप्पणियां की हैं. उन्होंने कहा कि यह महज किसी अदालती आदेश से असहमति का मामला नहीं था, बल्कि कोर्ट के खिलाफ एक समानांतर नैरेटिव तैयार किया गया था.
कोर्ट ने पाया कि डिजिटल कैंपेन के जरिए जज और उनके परिवार के सदस्यों तक को घसीटा गया. जस्टिस शर्मा के मुताबिक, ‘जब संस्था को कठघरे में खड़ा किया जाता है, तो यह जज की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह यह सुनिश्चित करे कि अदालत ऐसे आरोपों से प्रभावित न हो.’
कोर्ट ने साफ किया कि उसे इस बात की जानकारी मिली कि पत्रों, वीडियो और सोशल मीडिया अभियानों को व्यापक रूप से प्रसारित किया गया था ताकि जज को अपमानित किया जा सके.
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि कुछ अवमाननाकर्ता राजनीतिक शक्ति से लैस थे और उन्होंने इसका इस्तेमाल कोर्ट को डराने के लिए किया. जस्टिस शर्मा ने कहा कि उन्हें निष्पक्ष आलोचना और असहमति स्वीकार करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है, लेकिन जब चुप्पी को कमजोरी समझा जाने लगे, तो बोलना जरूरी हो जाता है.
उन्होंने कहा, ‘मेरे चुप रहने को मेरी कमजोरी समझा जा रहा था, लेकिन वह मेरी कमजोरी नहीं थी.’ कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अरविंद केजरीवाल ने कोर्ट के अंदर तो सम्मान की बात कही, लेकिन बाहर उनके इशारे पर एक समन्वित अभियान चलाया गया. यह किसी व्यक्तिगत जज पर हमला नहीं, बल्कि न्यायपालिका को अस्थिर करने की संवैधानिक चोट है.
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के 10 टॉप कोट्स
‘जब संस्था को कठघरे में खड़ा किया जाता है, तो जज का कर्तव्य है कि वह कोर्ट को आरोपों से प्रभावित न होने दे.’
‘हजार बार बोला गया झूठ कभी सच नहीं बन जाता.’
‘मेरे चुप रहने को मेरी कमजोरी समझा जा रहा था, लेकिन वह मेरी कमजोरी नहीं थी.’
‘अवमानना का कानून किसी जज की नहीं, बल्कि न्यायिक संस्था की रक्षा के लिए बना है.’
‘अदालत के भीतर केजरीवाल सम्मान की बात करते हैं, लेकिन बाहर मेरे खिलाफ अभियान चलाते हैं.’
‘मेरे बच्चों का इस केस से कोई लेना-देना नहीं था, फिर भी उन्हें अपमानित करने के लिए निशाना बनाया गया.’
‘न्यायपालिका बेबस नहीं है, सिर्फ इसलिए कि जज चुप रहना पसंद करते हैं.’
‘संविधान के प्रति मेरा कर्तव्य है कि मैं यह सुनिश्चित करूं कि कानून का शासन सुविधा के अनुसार न टूटे.’
‘यह आदेश कानून की अदालत से पारित हो रहा है, किसी राजनीतिक दल के मुख्यालय से नहीं.’
‘मेरे चुप रहने का मतलब उनके सामने सरेंडर करना होता, जो मैं कभी नहीं करूंगी.’
एडिटेड वीडियो और सोशल मीडिया के जरिए कैसे फैलाया गया भ्रम
मामले में सबसे चौंकाने वाला खुलासा वाराणसी के एक कॉलेज में जस्टिस शर्मा के भाषण के वीडियो को लेकर हुआ. कोर्ट ने बताया कि वाराणसी यूनिवर्सिटी के एक वर्कशॉप के वीडियो को जानबूझकर एडिट और क्रॉप किया गया. उस 59 सेकंड की क्लिप में जस्टिस शर्मा भगवान शिव और वाराणसी की महिमा का जिक्र कर रही थीं, जिसे बदलकर ऐसा दिखाया गया जैसे वह किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम में हिस्सा ले रही हों. संजय सिंह और अन्य नेताओं ने इस वीडियो को शेयर कर यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश की कि जज का प्रमोशन किसी राजनीतिक प्रभाव में हुआ है. जबकि ‘ऑल्ट न्यूज़’, ‘पीटीआई’ और ‘बार एंड बेंच’ जैसी संस्थाओं की फैक्ट-चेक रिपोर्ट्स ने इसे फर्जी बताया था, जिसे इन नेताओं ने नजरअंदाज कर दिया.
क्या केजरीवाल ने जज की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे?
जस्टिस शर्मा ने अरविंद केजरीवाल द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट किए गए एक पत्र का भी जिक्र किया. इस पत्र में केजरीवाल ने कथित तौर पर कहा था कि एक आम आदमी कैसे विश्वास कर सकता है कि यह कोर्ट केंद्र सरकार या बीजेपी के खिलाफ फैसला सुनाएगी.
कोर्ट ने इसे बेहद आपत्तिजनक मानते हुए कहा कि केजरीवाल ने खुद को नागरिकों का प्रतिनिधि मानकर न्यायपालिका पर राजनीतिक मंशा के आरोप मढ़े. अदालत ने कहा कि अगर कोई वादी किसी जज को पसंद नहीं करता, तो उसे कार्यवाही का बहिष्कार करने या अपमानजनक पत्र लिखने का अधिकार नहीं मिल जाता. यह सीधे तौर पर जनता की नजरों में कोर्ट की गरिमा को कम करने की कोशिश है.
‘जज को डराकर केस ट्रांसफर कराने की थी साजिश’
कोर्ट ने एक बहुत ही अहम पहलू पर ध्यान दिलाया कि शायद अवमाननाकर्ता यह चाहते थे कि जस्टिस शर्मा डर जाएं या इस केस से हट जाएं. जस्टिस शर्मा ने कहा, ‘उन्हें लगता था कि वे मेरे बारे में गलत बातें फैलाकर मुझे रोक सकते हैं, वे गलत थे. यह मनोवैज्ञानिक दबाव (Psychological Coercion) था.’ उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके पास दो रास्ते थे- या तो चुप रहें या अवमानना का नोटिस लें. उन्होंने दूसरा रास्ता चुना ताकि भविष्य में कोई भी न्यायपालिका के खिलाफ ऐसा अभियान न चला सके. सौरभ भारद्वाज की प्रेस कॉन्फ्रेंस का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि उन्होंने खुलेआम पूछा था कि बीजेपी का हाई कोर्ट जज से क्या रिश्ता है, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार था.
‘शूट एंड स्कूट’ की राजनीति नहीं चलेगी, जज के केस से हटने पर क्या बोले SG तुषार मेहता?
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने खुद को शराब नीति मामले की सुनवाई से अलग (Recusal) कर लिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि उन्होंने अवमानना की कार्यवाही शुरू कर दी है, इसलिए नैतिकता के नाते उचित होगा कि मुख्य मामले की सुनवाई कोई अन्य बेंच करे. हालांकि, सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे ‘शूट एंड स्कूट’ (आरोप लगाकर भाग जाना) की राजनीति करार दिया.
SG ने कोर्ट से अनुरोध किया कि वह इस मामले की सुनवाई जारी रखें. उन्होंने कहा, ‘ये अनैतिक वादी सुप्रीम कोर्ट इसलिए नहीं गए क्योंकि वे जानते थे कि इस आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती. उन्होंने जानबूझकर कोर्ट पर दबाव बनाने के लिए यह तमाशा रचा है.’
तुषार मेहता ने राजघाट पर आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन पर तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि महात्मा गांधी को कभी शराब बांटने या भ्रष्टाचार के मामले में चार्जशीट नहीं किया गया था. उन्होंने कहा कि गांधी जी ने कभी किसी जज को हटाने के लिए आवेदन नहीं दिया था. SG के मुताबिक, अगर आज दबाव में आकर बेंच बदलती है, तो भविष्य में लोग संवैधानिक अदालतों के खिलाफ इसी तरह के झूठे आरोप लगाएंगे. उन्होंने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि उन्हें इस संस्था पर पूरा विश्वास है और यह स्पष्ट है कि इन नेताओं के खिलाफ सबूत इतने पुख्ता हैं कि कोई भी बेंच इन्हें राहत नहीं देगी.



