अल नीनो के चलते मानसून को मार गया लकवा, करोड़ों लोगों पर संकट के बादल – el nino effect monsoon Weak start seen clouding Kharif season Outlook

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अल नीनो के चलते मानसून को मार गया लकवा, करोड़ों लोगों पर संकट के बादल
Last Updated:June 21, 2026, 11:58 IST
El Nino Effect: भारत में मौसम पर कई बाहरी एलिमेंट का असर पड़ता है. खासकर समुद्र में मौसमी हालात बदलने का असर सीधे तौर पर पड़ता है, जिससे आम जनजीवन भी प्रभावित होता है. बारिश का मौसम यानी मानसून भी अपवाद नहीं है. प्रशांत महासागर में सक्रिय हुए अल नीनो का असर अब दिखने लगा है.अल नीनो का असर अब दिखने लगा है. कमजोर मानसून का असर खरीफ की फसलों पर पड़ने की आशंका गहरा गई है. (फाइल फोटो/Reuters)
El Nino Effect: भारत पर अल नीनो का प्रभाव दिखने लगा है. देश के विभिन्न हिस्सों में मानसून से जुड़ी गतिविधियों में देरी हो रही है. इस बार केरल में भी मानसून ने पिछले साल के मुकाबले देरी से एंट्री की थी. उसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में इसके एक्टिव होने में भी देरी हो रही है. मानसून के आगमन में देरी से कृषि व्यवस्था का प्रभावित होना अब तय लग रहा है. इससे लाखों-करोड़ों लोगों के प्रभावित होने की आशंका भी बढ़ गई है. देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की सुस्त शुरुआत ने खरीफ सीजन की संभावनाओं को लेकर चिंता बढ़ा दी है. 360 ONE Capital Research की एक रिपोर्ट के अनुसार, मानसून की धीमी रफ्तार का असर कृषि गतिविधियों पर दिखने लगा है और खरीफ फसलों की बुआई में साल-दर-साल गिरावट दर्ज की गई है. हालांकि, जलाशयों में पर्याप्त पानी फिलहाल राहत देने वाली बात है, लेकिन रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यदि वर्षा की कमी लंबी खिंची तो खाने-पीने चीजों की महंगाई, ग्रामीण आय और कृषि उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 के मानसून सीजन की शुरुआत देश के बड़े हिस्सों में सामान्य से काफी कमजोर रही है. 17 जून तक देश में बारिश 46.2 mm दर्ज की गई, जबकि इस अवधि का सामान्य स्तर 74.3 mm है. इस तरह बारिश में 38 प्रतिशत की कमी रही. वहीं 17 जून को समाप्त सप्ताह में बारिश का लॉन्ग पीरियड एवरेज से 48 प्रतिशत कम रही. रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 36 वेदर सबडिवीजन में से 22 में अब तक सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है. जिला स्तर पर स्थिति और अधिक चिंताजनक है, जहां करीब 66 प्रतिशत हिस्सों में वर्षा ‘कम’ या ‘अत्यंत कम’ श्रेणी में रही है. मध्य भारत सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र के रूप में उभरा है, जहां बारिश में 62 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. पूर्वी भारत में भी स्थिति कमजोर रही और यहां वर्षा सामान्य से 44 प्रतिशत कम रही.
खरीफ बुआई पर असर
मानसून की धीमी प्रगति का असर खरीफ बुआई पर भी दिखने लगा है. 12 जून तक कुल खरीफ बुआई 84.6 लाख हेक्टेयर रही, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 3.9 प्रतिशत कम है. दलहन और कपास की बुआई में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई. दलहन का रकबा 43.2 प्रतिशत और कपास का 28 प्रतिशत घटा है. हालांकि, धान की बुआई में कुछ मजबूती देखने को मिली है और इसमें सालाना आधार पर 28.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन यह वृद्धि कम आधार वाले स्तर पर हुई है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कमजोर बारिश के बावजूद जलाशयों में पर्याप्त पानी एक सकारात्मक संकेत है. 11 जून तक देश के प्रमुख जलाशयों में पानी कुल क्षमता का 28.3 प्रतिशत था, जो 10 साल के औसत से लगभग 16 प्रतिशत अधिक है. यह स्थिति सिंचाई की जरूरतों के लिए एक अहम सुरक्षा कवच का काम कर सकती है, खासकर तब जब आने वाले दिनों में कम बारिश होने की आशंका बनी हुई है.
इस बात को लेकर किया आगाह
360 ONE Capital Research का मानना है कि मौजूदा मानसूनी रुझान पर करीबी नजर बनाए रखने की जरूरत है, क्योंकि इसका सीधा असर कृषि उत्पादन, ग्रामीण मांग, किसानों की आय और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, मानसून का अंतिम प्रभाव काफी हद तक जुलाई-अगस्त की बारिश पर निर्भर करेगा, क्योंकि यही दो महीने पूरे सीजन की अधिकांश वर्षा लेकर आते हैं. यदि इन महीनों में बारिश की रफ्तार सुधरती है तो फसल संभावनाएं संभल सकती हैं, लेकिन यदि कमी बनी रही तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य मुद्रास्फीति दोनों पर दबाव बढ़ने की आशंका है.
About the AuthorManish Kumar
बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें
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