हवा में तैरती दिखने वाली अधरशिला का रहस्य आज भी बरकरार, इंद्र का वज्र भी नहीं हिला पाया

Last Updated:June 27, 2026, 19:22 IST
Adhar Shila Rajasthan: पौराणिक और धार्मिक धरोहरों में अधरशिला का विशेष महत्व माना जाता है. मान्यता है कि यही वह पवित्र स्थान है, जहां तपस्वी राजा अम्बरीष ने कठोर तपस्या की थी. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह विशाल शिला ऐसी स्थिति में स्थित है कि दूर से देखने पर मानो हवा में तैरती हुई दिखाई देती है. इस अद्भुत दृश्य के कारण इसे ‘अधरशिला’ कहा जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, राजा अम्बरीष की तपस्या भंग करने के लिए देवराज इंद्र ने वज्र प्रहार भी किया, लेकिन तप की शक्ति के सामने वह प्रयास निष्फल रहा और शिला अपने स्थान पर अडिग रही. यही कारण है कि यह स्थल आस्था और रहस्य का अनूठा संगम माना जाता है. आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक इस स्थान पर पहुंचकर इसके प्राकृतिक चमत्कार, धार्मिक महत्व और ऐतिहासिक कथाओं को करीब से देखने आते हैं.
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सिरोही: जिले के अरावली की पहाड़ियों में बसे आबूराज और आसपास के इलाके में ऐसे कई स्थान है, जो यहां के संतों की तपस्या और धार्मिक मान्यताओं की वजह से पहचाने जाते हैं. ऐसा ही एक स्थान हैं उमरनी गांव के पास एक पहाड़ी पर बनी अधर शिला. इस विशाल चट्टान का ये नाम इसके मुख्य पहाड़ से कुछ ऊंचाई पर उठे हुए नजर आने की वजह से पड़ा. स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इसी स्थान पर राजा अम्बरीष ने वर्षों तक कड़ी तपस्या की थी.
पास ही बने भद्रकाली मंदिर के पुजारी राजू महाराज ने बताया कि सैकड़ों वर्ष पहले यहाँ इक्ष्वाकुवंशीय परमवीर राजा अम्बरीष की अमरावती नगरी हुआ करती थी. उन्होंने इसी स्थान पर भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए वर्षों तक कड़ी तपस्या की थी. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने जब उनसे वर मांगने के लिए कहा, तो उन्होंने अपनी प्रजा और सभी जीव जंतुओं को सशरीर स्वर्ग ले जाने का वर मांगा.
राजा के अंहकार की वजह से नहीं जा सके स्वर्गजब प्रजा स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर रही ठीक तभी राजा को अंहकार आ गया कि उनकी तपस्या में इतना बल हैं कि उनकी पूरी प्रजा सशरीर स्वर्ग जा रही है. इस अभिमान के आते ही स्वर्ग की ओर जा रहा विमान वहीं रुक गया. राजा अम्बरीष को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान से क्षमा मांगी. उन्होंने अपनी गलती के प्रायश्चित के लिए भगवान से उनकी प्रजा को स्वर्ग भेजने और उन्हें धरती पर ही रखने की प्रार्थना की. जिसके बाद राजा ने इस पहाड़ी पर पुनः तपस्या शुरू की.
तपोबल से हिला इंद्र का सिंहासन, किया वज्र से प्रहारराजा अम्बरीष की तपस्या के तपोबल से देवराज इंद्र का सिंहासन भी डोलने लगा और भयभीत होकर देवराज इंद्र ने राजा की तपस्या को भंग करने के लिए वज्र से प्रहार कर दिया, लेकिन राजा अम्बरीष के तपबल के सामने वज्र भी बेकार हो गया और जिस पहाड़ीपर राजा तपस्या कर रहे थे, उसकी चट्टान आधार होकर राजा की रक्षा करने लगी. इसी आधार शिला की वजह से इस स्थान का ये नाम पड़ा. बाद में राजा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने पुनः उन्हें दर्शन दिए. राजा ने भगवान से इस स्थान पर उनके ऋषिकेश स्वरूप में विराजमान होने की प्रार्थना की. जिसके बाद यहां भगवान का प्राचीन ऋषिकेश मंदिर बना. जो सैंकड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है. आज भी ऋषिकेश मंदिर आने वाले भक्त इस आधारशिला के दर्शन करते है और इसके इतिहास और धार्मिक मान्यता को जानते है. यहां पहुंचने के लिए आपको ऋषिकेश मंदिर के पास बनी पीली गुफा से कुछ मीटर पहाड़ी पर चढ़ाई करनी पड़ती है.
About the AuthorJagriti Dubey
Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें
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