बहनों पर खौलता पानी फेंक दिया और उसकी सजा सिर्फ लाइनहाजिर… विशुद्ध क्राइम है ये

कल्पना कीजिए. इस गर्मी में टोटी से निकला पानी भी हाथ में लेने का मन नहीं होता, और कोई खौलता पानी आपके शरीर पर उड़ेल दे तो कैसा मंजर होगा… सोचकर ही रूह कांप उठती है. लेकिन राजस्थान में एक पुलिसवाले ने दो बहनों के साथ ऐसी बर्बरता की. वो भी सिर्फ इसलिए, क्योंकि ‘साहब’, यानी मुख्यमंत्री जी का काफिला गुजरने वाला था. पुलिस वाले आते हैं और ठेला हटाने के लिए चिल्लाने लगते हैं. लड़कियां हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाती हैं, साहब, बर्तन में पानी उबल रहा है, इसे उतारने का थोड़ा सा वक्त दे दो, नहीं तो कोई हादसा हो जाएगा.
लेकिन वीआईपी ड्यूटी के नशे में चूर खाकी को कहां कुछ सुनाई देता है! पुलिस वाले को अपने आकाओं के सामने नंबर जो बनाने थे. उसने बिना कोई चेतावनी दिए पूरी ताकत से ठेले को धक्का दे दिया. उबलता हुआ, खौलता हुआ पानी सीधे छोटी बहन रेशु के ऊपर जा गिरा. उसका हाथ, छाती, पेट और जांघ बुरी तरह झुलस गए. वो बच्ची बीच सड़क पर तड़पती रही, उसकी चीखें निकलती रहीं, लेकिन वीआईपी सुरक्षा में लगे उन पुलिस वालों के माथे पर कोई शिकन नहीं आई.
जब यह बर्बरता कैमरे में कैद हुई, बवाल कटा, तो प्रशासन तुरंत डैमेज कंट्रोल की मुद्रा में आ गया. कहा गया कि सरकार और पुलिस ने कड़ा एक्शन लिया है, आरोपी पुलिसकर्मी नरेंद्र को तुरंत APO कर दिया गया है! आप सोच रहे होंगे कि कोई बड़ा एक्शन हुआ है. लेकिन रुकिये… APO का मतलब राजस्थान में होता है लाइन हाजिर… जब किसी पुलिसकर्मी को लाइन हाजिर किया जाता है, तो उसे उसकी मौजूदा फील्ड ड्यूटी या थाने से हटाकर पुलिस लाइन में भेज दिया जाता है. बस! यह सजा नहीं है, यह एक तरह की पेड लीव है. वह पुलिस लाइन में बैठेगा, अपनी पूरी सैलरी उठाएगा, और जैसे ही यह मामला ठंडा पड़ेगा, चुपचाप किसी दूसरे थाने में मलाईदार पोस्टिंग दे दी जाएगी.
तो क्या उन बेटियों पर बर्बरता करने की सजा सिर्फ इतनी है? उसके खिलाफ क्रिमिनल केस क्यों नहीं दर्ज होना चाहिए ? चलिए एक मिनट के लिए मान लेते हैं कि धक्का मारने वाला कोई पुलिसवाला नहीं, बल्कि आप, हम या कोई आम आदमी होता. अगर कोई आम आदमी सड़क पर किसी मोमोज के ठेले को जानबूझकर ऐसे धक्का मारता और किसी लड़की पर खौलता पानी गिर जाता, तो क्या होता?
क्या पुलिस उस आम आदमी को ‘लाइन हाजिर’ करती? पुलिस उसे वहीं कॉलर से पकड़कर घसीटते हुए थाने ले जाती. उस पर सबसे कड़ी और गैर-जमानती धाराएं ठोकी जातीं. गंभीर चोट पहुंचाने, खतरनाक हथियारों या साधनों से जानबूझकर नुकसान पहुंचाने और गैर-इरादतन हत्या के प्रयास जैसी धाराओं में मुकदमा दर्ज होता. वह आदमी सीधे जेल की चक्की पीस रहा होता और महीनों तक उसे जमानत नहीं मिलती. उसकी पूरी जिंदगी कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते हुए तबाह हो जाती.
तो फिर इस पुलिसकर्मी पर इतनी मेहरबानी क्यों? क्या पुलिस की वर्दी पहन लेने का मतलब यह हो गया है कि आपको किसी को भी जिंदा जला देने का लाइसेंस मिल गया है? कानून की किताब में ऐसा कहां लिखा है कि वीआईपी मूवमेंट के दौरान अगर कोई गरीब रास्ते में आए तो उसे खौलते पानी से जला दो?



