Rajasthan

रेगिस्तान का अनोखा खजाना! बीकानेर बना रेप्टाइल्स का गढ़, मिली छिपकलियों की 12 और सांपों की 15 प्रजातियां

Last Updated:July 01, 2026, 08:18 IST

Bikaner New Lizard Species: बीकानेर का रेगिस्तान अपनी जैव विविधता को लेकर एक बार फिर सूर्खियों में है. हाल ही में हुई नई खोज के बाद जिले में छिपकलियों की प्रजातियों की संख्या बढ़कर 12 और सांपों की प्रजातियां 15 हो गई हैं. राजकीय डूंगर महाविद्यालय के जूलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रताप सिंह के अनुसार, बीकानेर, जोधपुर और जैसलमेर मिलकर राजस्थान का “डेजर्ट ट्राइंगल” बनाते हैं, जो सरीसृप जीवों के लिए बेहद अनुकूल क्षेत्र माना जाता है. यह शोध करीब 10 वर्षों तक किए गए सर्वे और फील्ड ऑब्जर्वेशन पर आधारित है, जिसे वर्ष 2024 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फौना एंड बायोलॉजिकल स्टडीज में प्रकाशित किया गया. विशेषज्ञों का कहना है कि छिपकलियां कीट-पतंगों को नियंत्रित कर खेती की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाती हैं और पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं.

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बीकानेर. राजस्थान का बीकानेर सिर्फ ऊंट, रेत के धोरों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी जैव विविधता के लिए भी पहचान बना रहा है. रेगिस्तान में रहने वाले सांप और छिपकलियों की कई दुर्लभ प्रजातियां यहां पाई जाती हैं. हाल ही में हुई एक नई खोज के बाद बीकानेर जिले में छिपकलियों की संख्या बढ़कर 12 और सांपों की प्रजातियां 15 हो गई हैं. राजकीय डूंगर महाविद्यालय के जूलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रताप सिंह ने बताया कि बीकानेर, जोधपुर और जैसलमेर मिलकर राजस्थान का “डेजर्ट ट्राइंगल” बनाते हैं.

यह पूरा क्षेत्र रेगिस्तानी होने के कारण सरीसृप जीवों के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है. यहां फैले ग्रासलैंड्स में इन जीवों को पर्याप्त भोजन और सुरक्षित आवास मिल जाता है. इसी वजह से इस क्षेत्र में सांपों और छिपकलियों की प्रजातीय विविधता काफी समृद्ध है. बीकानेर के रेप्टाइल्स पर यह अध्ययन एक-दो साल का नहीं, बल्कि करीब एक दशक तक किए गए सर्वे और फील्ड ऑब्जर्वेशन पर आधारित है. इस शोधपत्र को महेंद्र सिंह सोलंकी, अरिंदम बसु, शांतनु डाबी, हरिलाल जांगिड़ और डॉ. प्रताप सिंह ने तैयार किया है.  यह शोध वर्ष 2024 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फौना एंड बायोलॉजिकल स्टडीज में प्रकाशित हुआ.

किसानों की दोस्त हैं छिपकलियां

डॉ. प्रताप सिंह बताते हैं कि उस समय जिले में 11 प्रजातियों की छिपकलियां, 14 प्रजातियों के सांप और दो प्रजातियों के कछुओं का रिकॉर्ड दर्ज किया गया था. अब हाल ही में एक नई छिपकली और एक नए सांप की प्रजाति मिलने के बाद यह संख्या बढ़कर क्रमशः 12 और 15 हो गई है. छिपकलियां केवल रेगिस्तान की जैव विविधता का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि खेती और पर्यावरण के लिए भी बेहद उपयोगी हैं. ये बड़ी संख्या में कीट-पतंगों को खाकर उनकी आबादी नियंत्रित करती हैं. फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कई हानिकारक कीटों को खत्म करने में इनकी अहम भूमिका होती है. इसी कारण इन्हें किसानों का मित्र भी माना जाता है.

पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूत कड़ी है छिपकलियां

पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूत कड़ी छिपकलियां खाद्य श्रृंखला का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. रेगिस्तानी इलाकों में पाए जाने वाले कई शिकारी पक्षी और अन्य वन्यजीव इन्हीं पर निर्भर रहते हैं. बीकानेर क्षेत्र में शिकारी पक्षियों की अच्छी संख्या का एक बड़ा कारण यहां छिपकलियों की उपलब्धता भी है. यदि इनकी संख्या कम होती है तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है. डॉ. प्रताप सिंह का कहना है कि बीकानेर का रेगिस्तान अभी भी वैज्ञानिकों के लिए संभावनाओं से भरा हुआ है. लगातार किए जा रहे शोधों से नई-नई प्रजातियां सामने आ रही हैं. इससे यह स्पष्ट होता है कि रेगिस्तानी जैव विविधता के संरक्षण और अध्ययन पर और अधिक काम किए जाने की आवश्यकता है.

About the Authordeep ranjan

दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें

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