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अंडा वेज या नॉन-वेज? हर अंडे से चूजा नहीं निकलता, फिर मांसाहारी कैसे? मिड डे मील विवाद से समझिए एग साइंस

उधर पश्चिम बंगाल की नई सरकार की नई मिड-डे मील व्यवस्था में अंडे नहीं होने पर विवाद नहीं थमा तो ख़बरें हैं कि ओडिशा की तरह बीच का रास्ता निकालने की कोशिश हो रही है. लेकिन इन सब में जो मूल सवाल है उसको भी समझने की ज़रूरत है. सौ बात की एक बात ये कि क्या अंडे वाकई नॉन-वेज होते हैं? मतलब माने तो नॉन-वेज ही जाते हैं, लेकिन क्या वो सिर्फ़ परंपरा और संस्कृति का सवाल है या वाकई अंडे मांसाहार होते हैं, नॉन वेज होते हैं? ये समझने से पहले ख़बर तो समझ लेते हैं. बंगाल सरकार ने एक पायलट प्रॉजेक्ट शुरू किया जिसमें कोलकाता के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील देने का काम ISKCON को दिया गया. ISKCON वैसे तो आप जानते ही हैं एक आध्यात्मिक संगठन है, लेकिन वो कई राज्यों में मिड-डे मील में पौष्टिक और साफ़-सुथरा खाना देने का काम भी करता है.

तो बंगाल सरकार ने भी कोलकाता के सरकारी स्कूलों में ISKCON का खाना देने का पायलट प्रॉजेक्ट शुरू किया, कि अगर सफल रहा तो पूरे राज्य में ये लागू कर देंगे. लेकिन मसला ये हो गया कि ISKCON का खाना तो शाकाहारी होता है. वो कहते ही यही हैं कि सात्विक भोजन देते हैं. उससे तो किसी को दिक़्क़त नहीं थी. लेकिन पहले मिड-डे मील में बच्चों को अंडा भी दिया जाता था. इसपर विवाद खड़ा हो गया कि जिन बच्चों के परिवारों में उनके अंडा खाने पर कोई रोक नहीं उनसे अंडा क्यों छीना जा रहा है ISKCON के भोजन के नाम पर. कि प्रोटीन कैसे मिलेगा बच्चों? तो जवाब में लोग कहने लगे कि पहले भी अंडा रोज़ तो दिया नहीं जा रहा था, और प्रोटीन कई तरह के शाकाहारी भोजन से भी मिल सकता है, उसके लिए नॉन-वेज देना क्यों ज़रूरी है.

अंडे को क्यों नॉन-वेज माना जाता है?

तो उस बहस में ना पड़ते हुए ये समझने की ज़रूरत है कि अंडे को क्यों नॉन-वेज माना जाता है? नॉन-वेज क्या होता है? तो मोटे तौर पर नॉन-वेज या मांसाहार उसको माना जाता है जिसमें कोई जीव हत्या हो. यानी किसी जानवर की जान ली जाए खाने के लिए. और क्योंकि मुर्ग़ी के अंडे से ही चूज़े निकलते हैं तो अंडों को नॉन-वेज माना जाता है क्योंकि ये माना जाता है कि अगर अंडे को कोई ना खाता तो उस से चूज़ा निकलता. यानी उसके पैदा होने से पहले ही अंडा खाकर उसको मार दिया गया, यानी जीव हत्या कर दी गई, तो वो नॉन-वेज आइटम है. और ऐसा इसलिए माना जाता रहा है क्योंकि अंडों से चूज़े निकलते हुए देखता रहा है इंसान. लेकिन मुर्ग़ी के हर अंडे से चूज़ा नहीं निकलता. क्योंकि हर अंडे में चूज़ा होता ही नहीं.

अंडे का पूरा फंडा समझिए

अंडे तो एक तरह से समझ लीजिये कि पैकेट हैं जिनमें चूज़े पैक हो कर आते हैं. लेकिन मुर्ग़ियां अंडे ऐसे भी देती रहती हैं. ख़ाली पैकेट भी देती रहती हैं. वो तो जब किसी मुर्ग़े के साथ प्रजनन होता है तब उस पैकेट में चूज़ा होने का चांस होता है. लेकिन मुर्ग़ियां तो मुर्ग़े के संपर्क में आए बिना भी अंडे देती रहती हैं. उनमें कोई चूज़ा नहीं होता. जब मुर्ग़े के संपर्क में ही नहीं आई मुर्ग़ी तो बच्चा कहां से हो जाएगा? वो तो सिर्फ़ ख़ाली पैकेट है. लेकिन अगर मुर्ग़ा और मुर्ग़ी एक ही बाड़े में रहते हैं तो ये पता नहीं चल सकता कि कौन से अंडे में चूज़ा हो सकता है और कौनसे अंडे में नहीं. इसलिए शायद पहले के ज़माने में हर अंडे को नॉन-वेज ही मान लिया गया. क्योंकि जीव-हत्या का चांस तो था ही.

मिड-डे मील विवाद के बीच बड़ा सवाल: अंडा शाकाहारी है या मांसाहारी?

किसमें चूजा होने का चांस होता है?

आज भी जिन अंडों को देसी अंडे कहा जाता है, या फ़्री रेंज अंडे कहा जाता है उनमें चूज़ा होने का चांस होता है. क्योंकि फ़्री रेंज का मतलब ये कि मुर्ग़ों और मुर्ग़ियों को खुला छोड़ दिया गया था और ये अंडे दिए हैं उस टाइम मुर्ग़ियों ने. तो इनमें कई अंडे ऐसे भी हो सकते हैं जिनसे चूज़े निल सकते हों. तो ऐसे अंडे खा लेने में तो जीव हत्या का चांस है. इसलिए ऐसे अंडे नॉन-वेज ही माने जाते हैं. लेकिन आजकल के जो अंडों के कमर्शियल पोल्ट्री फ़ार्म होते हैं उनमें मुर्ग़े रखे ही नहीं जाते. सिर्फ़ मुर्ग़ियां ही होती हैं. वो बिना मुर्ग़ों के ही अंडे देती हैं. और क्योंकि वो मुर्ग़ों के संपर्क में ही नहीं आतीं, तो अंडों में चूज़े तो हो ही नहीं सकते. और चूज़े नहीं हो सकते तो अंडे तोड़ने से कोई जीव हत्या नहीं होती. फिर भी क्योंकि पारंपरिक रूप से लोग अंडों को नॉन-वेज मानते हैं इसलिए इन कमर्शियल फ़ार्म से आए अंडों को भी लोग नॉन-वेज ही मान लेते हैं.

अंडों की कहानी क्या

कई लोग कहते हैं कि भले ही उनमें चूज़े ना होते हों, लेकिन अंडे आते तो मुर्ग़ी के शरीर से ही हैं. तो वो तर्क तो दूध पर भी लागू है. दूध में गाय-भैंस के शरीर से ही आता है. लेकिन वो पारंपरिक रूप से शाकाहारी माना जाता है. सेम केस शहद का है. वो भी तो मधुमक्खियों से लिया जाता है. लेकिन वो भी शाकाहारी ही माना जाता है. क्योंकि ना तो दूध में कोई जीव हत्या होती है, ना ही शहद निकालने में जीव हत्या होती है. तो दूध को, दही को, मक्खन को, घी को, शहद को, सबको शाकाहारी माना जाता है, जबकि वो लॉजिक कमर्शियल पोल्ट्री फ़ार्म के अंडों पर नहीं लगाया जाता. और अंडों को नॉन-वेज ही मानते हैं लोग. फ़्री रेंज अंडे या देसी अंडे ही नहीं, सारे ही अंडे नॉन-वेज माने जाते हैं. वीगन की बात अलग है.

वीगन आहार की कैटेगरी में तो मुर्ग़ी के अंडे भी नहीं आ सकते

आजकल कई लोग वेजिटेरियन ही नहीं, वीगन भी हो गए हैं. वीगन लोग तो पशुओं से निकला हुआ कोई भी आहार नहीं लेते. चाहे दूध हो, दही हो, मक्खन हो, घी हो, कुछ भी हो. ऊन भी नहीं पहनते क्योंकि वो भी भेड़ से ली जाती है. तो वीगन आहार की कैटेगरी में तो मुर्ग़ी के अंडे भी नहीं आ सकते, चाहे उनमें चूज़े हों या ना हों. लेकिन वेजिटेरियन लोग भी हर तरह के अंडों को नॉन-वेज ही मानते हैं, इसलिए ये विवाद होता रहता है. कई जो खाते भी हैं, वो कुछ दिनों पर नहीं खाते, जैसे मंगलवार को नहीं खाते. जबकि दूध या शहद के बारे में ऐसा कोई नहीं सोचता कि फ़लां दिन नहीं खाना चाहिए. तो वो तो ख़ैर लोगों की मर्ज़ी है. और क्या खाना है क्या नहीं खाना ये हर एक पर्सनल चॉयस है, और रहनी भी चाहिए. और प्रोटीन की बहस तो अलग ही बहस है. लेकिन किसी आहार को वेज या नॉन-वेज कहने का आधार तो क्लियर रहे. सौ बात की एक बात.

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