उदयपुर की इस गली से चलता था मेवाड़ का शासन, जानिए क्यों पड़ा ‘सही वालों की गली’ नाम

Last Updated:July 01, 2026, 08:39 IST
Dharohar Udaipur Sahi Walon Ki Gali: उदयपुर की ऐतिहासिक गलियों में स्थित ‘सही वालों की गली’ मेवाड़ के प्रशासनिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाती है. इतिहासकार राजेंद्र नाथ पुरोहित के अनुसार, करीब साढ़े तीन सौ वर्ष पुरानी यह गली कभी महाराणाओं के विश्वसनीय मुनीमों, लेखाकारों और प्रशासनिक अधिकारियों का केंद्र थी. यहीं राज्य के महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार किए जाते थे और अंतिम स्वीकृति के बाद उन पर आधिकारिक मोहर लगाई जाती थी. पुराने समय में किसी भी राजकीय आदेश, जागीर या जमीन से जुड़े दस्तावेज तब तक मान्य नहीं माने जाते थे, जब तक उन पर यहां से ‘सही’ नहीं हो जाती थी. इसी परंपरा के कारण इस स्थान को ‘सही वालों की गली’ नाम मिला. आज भी यह गली अपने प्राचीन भवनों, पारंपरिक स्थापत्य और ऐतिहासिक पहचान के कारण पर्यटकों व इतिहास प्रेमियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है.
झीलों की नगरी उदयपुर अपनी खूबसूरत झीलों, महलों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है. लेकिन इस शहर की तंग गलियों में भी ऐसा इतिहास छिपा हुआ है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. ऐसी ही एक ऐतिहासिक गली है ‘सही वालों की गली’, जो उदयपुर के पुराने शहर में स्थित है. यह गली सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि मेवाड़ के प्रशासनिक तंत्र का महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करती थी.
इतिहासकार राजेंद्र नाथ पुरोहित के अनुसार, उदयपुर की यह गली करीब साढ़े तीन सौ वर्ष पुरानी मानी जाती है. उस दौर में मेवाड़ के महाराणाओं के विश्वसनीय मुनीम, लेखाकार और प्रशासनिक अधिकारी इसी क्षेत्र में निवास करते थे. राज्य के महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार करने, राजकोष का हिसाब-किताब रखने और शाही आदेशों की अंतिम प्रक्रिया यहीं पूरी होती थी. यही कारण है कि समय के साथ यह इलाका ‘मुनीमों का मोहल्ला’ और बाद में ‘मुनीम पाड़ा’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया, जो आज भी अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है.
इतिहासकार राजेंद्र नाथ पुरोहित के अनुसार, पुराने समय में किसी भी राजकीय आदेश, जमीन के पट्टे, जागीर से जुड़े दस्तावेज या अन्य महत्वपूर्ण निर्णय तब तक मान्य नहीं माने जाते थे, जब तक उन पर यहां से अंतिम हस्ताक्षर या आधिकारिक मोहर, जिसे उस समय ‘सही’ कहा जाता था, नहीं लग जाती थी. इसी परंपरा के कारण समय के साथ इस स्थान को ‘सही वालों की गली’ के नाम से पहचान मिलने लगी, जो आज भी अपने ऐतिहासिक महत्व को संजोए हुए है.
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इतिहासकार के अनुसार, मेवाड़ के महाराणा जब भी कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेते थे, तो उसकी अंतिम स्वीकृति इसी गली में दी जाती थी. यहां तैनात अधिकारी दस्तावेजों की बारीकी से जांच करते थे और सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद उन पर आधिकारिक मोहर लगाई जाती थी. मोहर लगने के बाद ही वह आदेश पूरे मेवाड़ राज्य में वैध और प्रभावी माना जाता था. यही प्रक्रिया इस गली के ऐतिहासिक महत्व को आज भी विशेष पहचान दिलाती है..
आज भले ही यह गली एक सामान्य और संकरी सड़क के रूप में दिखाई देती हो, लेकिन इसकी हर दीवार और हर मोड़ मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास की गवाही देते हैं. यहां से गुजरने वाले अधिकांश लोगों को शायद यह पता भी नहीं होता कि कभी इसी स्थान पर राज्य के महत्वपूर्ण निर्णयों को अंतिम स्वीकृति दी जाती थी. यहीं से जारी आदेश पूरे मेवाड़ में लागू होते थे, जिससे यह गली प्रशासनिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती थी.
पुराने शहर की यह गली आज भी अपने ऐतिहासिक स्वरूप को काफी हद तक संजोए हुए है. यहां बने प्राचीन भवन, संकरी गलियां और पारंपरिक स्थापत्य मेवाड़ के गौरवशाली अतीत की झलक दिखाते हैं. कभी राजकीय गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रही यह जगह आज इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. विरासत और संस्कृति में रुचि रखने वाले लोग यहां पहुंचकर मेवाड़ की प्रशासनिक परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहर को करीब से जानने और महसूस करने का अवसर प्राप्त करते हैं.
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