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घुन-कीटों का खात्मा, सीताफल के तेल से तैयार हुआ किसानों का जैविक हथियार

Last Updated:July 07, 2026, 12:22 IST

सीताफल के बीजों के तेल से तैयार किया गया जैविक नैनो कीटनाशक किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है. स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के डॉ. मनोज मीणा ने नैनो टेक्नोलॉजी की मदद से ऐसा प्राकृतिक उत्पाद विकसित किया है, जो लंबे समय तक संग्रहित अनाज को घुन, इल्ली और अन्य कीटों से सुरक्षित रखने में प्रभावी साबित हुआ है. इस नवाचार को दो पेटेंट मिल चुके हैं और इसकी सराहना राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष कार्यक्रम में भी हुई.

बीकानेर. खेतों में होने वाली फसलों की सुरक्षा के लिए अब प्रकृति से ही समाधान निकल रहा है. स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के गेस्ट फैकल्टी डॉ. मनोज मीणा ने सीताफल के बीजों के तेल से ऐसा जैविक नैनो कीटनाशक विकसित किया है, जो लंबे समय तक संग्रहित अनाज को घुन, इल्ली और सुरसुरी जैसे नुकसानदायक कीटों से सुरक्षित रखने में बेहद प्रभावी साबित हुआ है. इस अभिनव शोध ने न केवल किसानों के लिए नई उम्मीद जगाई है, बल्कि इसकी बदौलत डॉ. मीणा को राष्ट्रपति भवन में आयोजित जनजातीय गौरव उत्सव-2026 के विशेष कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया, जहां उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भी संवाद किया.

डॉ. मनोज मीणा ने बताया कि यह शोध उनके पीएचडी कार्य का हिस्सा था, जिसे उन्होंने उदयपुर के अभियांत्रिकी महाविद्यालय में डॉ. दीपक राजपुरोहित के निर्देशन में पूरा किया. करीब ढाई साल तक चले इस शोध में उन्होंने नैनो टेक्नोलॉजी की मदद से सीताफल के बीजों के तेल का उपयोग कर जैविक नैनो इमल्शन तैयार किया. यह पूरी तरह प्राकृतिक उत्पाद है, जिसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक तत्व का इस्तेमाल नहीं किया है.  उन्होंने बताया कि किसान जब गेहूं, चना, बाजरा, मूंग और अन्य खाद्यान्न फसलों का लंबे समय तक भंडारण करते हैं तो उनमें घुन, इल्ली और अन्य कीट लग जाते हैं, जिससे अनाज की गुणवत्ता और मात्रा दोनों प्रभावित होती हैं.

ऐसे में यह जैविक नैनो कीटनाशक अनाज को सुरक्षित रखने का प्रभावी और पर्यावरण अनुकूल विकल्प बन सकता है.  डॉ. मीणा का कहना है कि वर्तमान समय में कृषि में सिंथेटिक रसायनों का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जिससे मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. ऐसे दौर में पौधों पर आधारित यह जैविक तकनीक किसानों के लिए सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प साबित हो सकती है.  उन्होंने बताया कि जैसे पहले लोग नीम की पत्तियों या हल्दी का उपयोग कर अनाज को सुरक्षित रखते थे, उसी अवधारणा को आधुनिक नैनो टेक्नोलॉजी के साथ विकसित कर यह उत्पाद तैयार किया गया है. इस महत्वपूर्ण शोध को राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ी पहचान मिली है, डॉ. मीणा को इस नवाचार के लिए दो पेटेंट प्राप्त हो चुके हैं.

यह शोध भविष्य में कृषि क्षेत्र में लाएगा बड़ा बदलाव

मई माह में उन्हें भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की ओर से ईमेल के माध्यम से राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष कार्यक्रम का निमंत्रण मिला था. 2 जून को आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने चयनित शोधकर्ताओं से संवाद करते हुए समाजोपयोगी अनुसंधान और नवाचार को देश के विकास की आधारशिला बताया. इस दौरान शोधार्थियों को राष्ट्रपति भवन और राष्ट्रपति संग्रहालय का भ्रमण भी कराया गया और राष्ट्रपति के जीवन पर आधारित पुस्तक भेंट की गई. कार्यक्रम में केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम सहित मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे. डॉ. मीणा ने कहा कि राष्ट्रपति से संवाद उनके जीवन का सबसे प्रेरणादायक अनुभव रहा.

इससे किसानों के लिए उपयोगी अनुसंधान को आगे बढ़ाने का नया उत्साह मिला है. उनका लक्ष्य इस तकनीक को जल्द से जल्द प्रयोगशाला से किसानों के खेतों तक पहुंचाना है, ताकि रसायन मुक्त कृषि को बढ़ावा मिल सके और किसानों को सुरक्षित व किफायती विकल्प उपलब्ध हो.  विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. राजेंद्र बाबू दुबे ने डॉ. मीणा की उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह सफलता विश्वविद्यालय के शोध और नवाचार की गुणवत्ता का प्रमाण है. वहीं अनुसंधान निदेशक डॉ. एन.के. शर्मा ने कहा कि विश्वविद्यालय में किसानों की जरूरतों से जुड़े अनुसंधानों को लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है. उन्होंने विश्वास जताया कि डॉ. मीणा का यह शोध भविष्य में कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने की क्षमता रखता है.

About the AuthorMonali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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