रेगिस्तान का कड़वा तुंबा बना कमाई का जरिया; बीकानेर में तैयार हो रहे आचार, कैंडी और चूर्ण

Last Updated:July 09, 2026, 20:06 IST
Rajasthan Tumba Ka Achaar: स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय ने तुंबा से अचार, कैंडी और चूर्ण बनाकर किसानों के लिए आय का नया स्रोत खोला है. डेढ़ महीने की प्रोसेसिंग से कड़वाहट कम होती है. यह शुगर मरीजों के लिए भी फायदेमंद है. डॉ. ममता सिंह ने बताया कि सबसे पहले तुंबा को तीन दिन तक सामान्य पानी में भिगोकर रखा जाता है और इस दौरान पानी को नियमित रूप से बदला जाता है. इसके बाद करीब तीन सप्ताह तक इसे चूने के पानी में डुबोकर रखा जाता है.
बीकानेर. रेगिस्तान में अक्सर बेकार समझा जाने वाला कड़वा तुंबा अब किसानों के लिए आय का नया स्रोत बन सकता है. स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय ने तुंबा को मूल्यवर्धित उत्पादों में बदलकर इसकी उपयोगिता बढ़ा दी है. विश्वविद्यालय के सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय में वर्ष 2020 से ‘मरूशक्ति एग्रो इनोवेटिव फूड्स’ के तहत तुंबा से आचार, कैंडी और चूर्ण तैयार किए जा रहे हैं. इन उत्पादों को बाजार में भी अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है.
विश्वविद्यालय की यह पहल रेगिस्तान में सहज उपलब्ध इस वनस्पति को रोजगार और स्वास्थ्य से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है. सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय की सहायक प्राचार्य डॉ. ममता सिंह ने बताया कि तुंबा की चिकित्सीय उपयोगिता काफी अधिक है, लेकिन अत्यधिक कड़वाहट के कारण इसे सीधे खाना संभव नहीं होता. इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय ने इसकी विशेष प्रोसेसिंग तकनीक विकसित की.
डेढ़ महीने की प्रोसेसिंग के बाद तैयार होते हैं उत्पादडॉ. ममता सिंह ने बताया कि सबसे पहले तुंबा को तीन दिन तक सामान्य पानी में भिगोकर रखा जाता है और इस दौरान पानी को नियमित रूप से बदला जाता है. इसके बाद करीब तीन सप्ताह तक इसे चूने के पानी में डुबोकर रखा जाता है. इस प्रक्रिया के दौरान हर तीसरे दिन पानी बदला जाता है, जिससे इसकी कड़वाहट काफी हद तक कम हो जाती है. पूरी प्रोसेसिंग और उत्पाद तैयार करने में लगभग डेढ़ महीने का समय लगता है.
किसानों को भी दिया जा रहा प्रशिक्षणडॉ. सिंह ने बताया कि कई किसान विश्वविद्यालय आकर बताते थे कि उनके खेतों में तुंबा बड़ी मात्रा में उगता है, लेकिन उसका कोई उपयोग नहीं हो पाता. इसी को देखते हुए विश्वविद्यालय ने तुंबा से मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने की पहल शुरू की. अब किसानों और विद्यार्थियों को इसकी प्रोसेसिंग का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, ताकि वे इसे स्वरोजगार का माध्यम बना सकें.
बाजार में बढ़ रही है मांगविश्वविद्यालय वर्तमान में तुंबा का आचार 250 रुपये प्रति किलोग्राम, कैंडी 150 रुपये प्रति किलोग्राम और चूर्ण 100 ग्राम के पैक में 50 रुपये में उपलब्ध करा रहा है. डॉ. ममता सिंह के अनुसार इन उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है.
शुगर के मरीजों के लिए भी माना जाता है लाभकारीडॉ. सिंह ने बताया कि तुंबा के औषधीय गुणों के कारण इसे विशेष रूप से मधुमेह (शुगर) के मरीजों के लिए लाभकारी माना जाता है. उनका कहना है कि यदि इसका वैज्ञानिक तरीके से उपयोग और प्रसंस्करण किया जाए, तो यह भविष्य में किसानों के लिए अतिरिक्त आय का अच्छा साधन साबित हो सकता है.
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आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें
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