Nominee Rule : बैंक अकाउंट, म्यूचुअल फंड या इंश्योरेंस, सिर्फ नॉमिनी होने से नहीं मिल जाता पैसे पाने का अधिकार

Last Updated:August 08, 2026, 18:08 IST
Nominee Rule Update : जब आप किसी भी तरह का अकाउंट खुलवाते हैं तो नॉमिनी चुनने के लिए कहा जाता है. आपको यही लगता होगा कि नॉमिनी चुनने के बाद किसी अनहोनी पर सारा पैसा आपके चुने गए नाम को मिल जाएगा तो गलत हैं. नॉमिनी का नियम ऐसा नहीं कहता है, बल्कि यह सिर्फ आपके संस्थान को यह संकेत देता है कि अनहोने के बाद किस व्यक्ति से संपर्क करना है. फिर नॉमिनी के साथ और क्या करना चाहिए.सिर्फ नॉमिनी चुनने से पैसों पर अधिकार नहीं मिलता है.
नई दिल्ली. बैंक अकाउंट, म्यूचुअल फंड, इंश्योरेंस या फिर पीएफ खाता. कहीं भी रुपये-पैसे का मामला आते ही सबसे पहले आपसे नॉमिनी भरने के लिए कहा जाता है. आप भी अपने अकाउंट में नॉमिनी का नाम डालने के बाद निश्चिंत हो जाते हैं कि अब किसी अनहोनी पर सारा पैसा आपके नॉमिनी को मिल जाएगा. लेकिन, जरा ठहरें. भारतीय कानून ऐसा नहीं कहता कि सिर्फ नॉमिनी में नाम डालने भर से ही पैसों पर मालिकाना हक मिल जाता है. ऐसे में क्या करना चाहिए कि किसी अनहोनी के बाद नॉमिनी को उसका हक कैसे मिले.
दरअसल, जब आप किसी भी तरह का अकाउंट खोलते हैं और संस्थान आपसे नॉमिनी चुनने के लिए कहता है तो सभी को यही लगता है कि बस अब काम पूरा. लेकिन, ऐसा नहीं है आपके नॉमिनी चुनने से इन संस्थानों को सिर्फ यही पता चलता है कि अकाउंट होल्डर की मौत होने पर किससे संपर्क करना है. ज्यादातर लोग यह मान लेते हैं कि अकाउंट होल्डर की मौत के बाद नॉमिनी अपने-आप उस पैसे का मालिक बन जाता है. आज हम आपकी इस कंफ्यूजन को भी दूर कर देते हैं और इसकी जानकारी भी देते हैं.
क्या होता है नॉमिनी का मतलबनॉमिनी की भूमिका आमतौर पर उतनी बड़ी नहीं होती जितना लोग सोचते हैं. ज्यादातर मामलों में नॉमिनी सिर्फ तब तक संपत्ति (शेयर, प्रॉपर्टी या इंश्योरेंस का पैसा) की देखभाल करने वाला (कस्टोडियन) होता है, जब तक कि असली कानूनी वारिसों को वह संपत्ति मिल नहीं जाती. बैंक अकाउंट, म्यूचुअल फंड या दूसरी संपत्तियों में पैसे का असली मालिक कौन होगा, यह आम तौर पर एक वैध वसीयत, उत्तराधिकार कानून और कानूनी वारिसों के अधिकारों से तय होता है, न कि सिर्फ अकाउंट में बताए गए नॉमिनी से.
नॉमिनी चुनने के साथ और क्या करेंअगर मरने वाले व्यक्ति ने कानूनी रूप से वैध वसीयत छोड़ी है, तो संपत्तियां उसी वसीयत के अनुसार बांटी जाती हैं. वसीयत न होने पर लागू उत्तराधिकार कानून यह तय करते हैं कि पैसे और संपत्ति पर किसका सही हक है. हालांकि, साल 2025 में हुए कानूनी बदलाव के बाद भारत में वसीयत अब अनिवार्य नहीं है, फिर भी यह संपत्तियों के आसानी से ट्रांसफर और विवादों की गुंजाइश कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है. यह एक कानूनी प्रक्रिया है जिसके जरिये सिविल कोर्ट वसीयत की असलियत की जांच करता है और उसमें बताए गए एग्जीक्यूटर को मरने वाले व्यक्ति की संपत्ति का प्रबंधन करने की मंजूरी देता है.
सही उत्तराधिकार क्या-क्या डॉक्यूमेंट जरूरी
वसीयत (Will) : यह एक कानूनी दस्तावेज है, जो बताता है कि आपकी संपत्ति कैसे बांटी जानी चाहिए. इसमें नाबालिग बच्चों के लिए गार्जियन का नाम भी तय किया जाता है. यह दस्तावेज संपत्ति बांटने का सबसे आम तरीका है और इस पर जरूर विचार किया जाना चाहिए.
ट्रस्ट (Trusts): संपत्ति को मैनेज करने और कुछ मामलों में एस्टेट टैक्स कम करने या मौत के बाद संपत्ति ट्रांसफर करने की कानूनी प्रक्रिया से बचने में मदद करने के लिए इसे बनाया जाता है.
पावर ऑफ अटॉर्नी (Power of Attorney): अगर आप फैसले लेने में असमर्थ हो जाते हैं तो यह किसी भरोसेमंद व्यक्ति को आपके आर्थिक या कानूनी मामलों को संभालने का अधिकार देता है.
बेनिफिशियरी डेजिग्नेशन (Beneficiary Designations): यह डॉक्यूमेंट ये तय करता है कि जीवन बीमा, रिटायरमेंट अकाउंट और निवेश जैसी संपत्तियां प्रोबेट की प्रक्रिया से गुजरे बिना सीधे चुने गए लाभार्थी को ट्रांसफर हो जाएं.
About the AuthorPramod Kumar Tiwari
प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्वेस्टमेंट टिप्स, टैक्स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…
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New Delhi,Delhi
First Published :
August 08, 2026, 18:02 IST



