Rajasthan

जब दुनिया पर्यावरण से अनजान थी, नागौर में गुरु जांभोजी ने सिखाया प्रकृति बचाना, आज भी कायम है परंपरा

नागौर: आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीवों की सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंतित है, तब राजस्थान की धरती की एक ऐसी परंपरा याद आती है, जिसने इन मुद्दों को करीब साढ़े पांच शताब्दी पहले ही अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था. यह कहानी है गुरु जांभोजी और बिश्नोई पंथ की, जिसकी शुरुआत नागौर की धरती से हुई और जिसके 29 नियम आज भी हजारों लोगों की जीवनशैली का आधार बने हुए हैं.

नागौर जिले के पीपासर में जन्मे गुरु जांभोजी ने सांसारिक जीवन से अलग राह चुनी. उन्होंने अपनी पैतृक संपत्ति गरीबों में बांट दी और पीपासर के आसपास हरिचर्चा, ईश्वर भजन और सत्संग शुरू किया. इसके बाद समराथल में कार्तिक बदी अष्टमी, विक्रम संवत 1542 को कलश स्थापना के साथ उन्होंने बिश्नोई पंथ की स्थापना की. उनका संदेश केवल धर्म और भक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि मानव जीवन को प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ जोड़ता था.

29 नियमों में छिपा था पर्यावरण संरक्षण का संदेश

गुरु जांभोजी ने अनुयायियों के लिए 29 नियमों की आचार संहिता बनाई. इनमें आध्यात्मिक साधना, स्वच्छता, संयम और सदाचार के साथ जीवों पर दया तथा हरे वृक्षों की रक्षा जैसे सिद्धांत शामिल थे. इन्हीं 20 और 9 यानी 29 नियमों को अपनाने वाले को बिश्नोई कहा गया. रेगिस्तानी राजस्थान में जहां पेड़-पौधों का अस्तित्व बहुत जरूरी है, वहां खेजड़ी जैसे वृक्षों को बचाने की भावना समाज की परंपरा बन गई. पांच शताब्दियों से ज्यादा समय बीतने के बावजूद ये नियम आज भी बिश्नोई समाज के सामाजिक और धार्मिक जीवन में दिखाई देते हैं.

जांभोजी की वाणी ने बदल दी लोगों की सोच

गुरु जांभोजी की वाणी को बिश्नोई पंथ की विचारधारा का आधार माना जाता है. उनके 123 सबदों में सत्य, भक्ति, संयम, जीव दया और प्रकृति संरक्षण का संदेश मिलता है. उन्होंने जाति और कुल के बजाय मनुष्य के कर्म को उसकी श्रेष्ठता का आधार माना. परंपरागत विवरणों के अनुसार, उनके उपदेशों से प्रभावित होकर मल्लूखां ने गोहत्या बंद करवाई और मांसाहार का त्याग किया. कर्नाटक के नवाब शेख सद्दो को भी गुरु जांभोजी ने जीव दया का संदेश दिया, जिसके बाद गोहत्या बंद करवाने का उल्लेख मिलता है.

हरियाणा-पंजाब से गुजरात तक फैली है आस्था

गुरु जंभेश्वर महाराज को राजस्थान के अलावा हरियाणा और पंजाब में भी बड़ी श्रद्धा से पूजा जाता है. मध्य प्रदेश और गुजरात के कुछ हिस्सों में भी बिश्नोई समाज की अच्छी संख्या है. जातिगत सीमाओं से ऊपर उठकर जाट, राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य सहित अलग-अलग समाजों के लोगों ने इस पंथ को अपनाया. बिश्नोई परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए आज भी प्रयास जारी है. श्री जंभेश्वर पर्यावरण एवं जीव रक्षा प्रदेश संस्था वर्ष 2012 से संस्कार शिविर आयोजित कर रही है. 20 दिवसीय इन शिविरों में 13 से 17 वर्ष के बच्चों को 29 धर्म नियम, पांच आरतियां, एक धुन और छह मंत्रों के साथ जांभाणी साहित्य की शिक्षा दी जाती है.

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