मिस्र में आज जहां रेगिस्तान वहां करोड़ों साल पहले था समुद्र, अबू-तरतूर पठार पर मिली शार्क की कब्रगाह

नई दिल्ली: मिस्र के सूखे रेगिस्तान में वैज्ञानिकों ने एक हैरान करने वाली खोज की है. इजिप्ट के अबू-तरतूर पठार पर एक प्राचीन शार्क कब्रिस्तान मिला है. यह जगह आज भले ही सूखी और बंजर है. लेकिन करोड़ों साल पहले यहां एक विशाल और गहरा समुद्र हुआ करता था. क्रेटेशियस काल में अफ्रीकी महाद्वीप का उत्तरी हिस्सा पूरी तरह से पानी में डूबा हुआ था. अब उसी प्राचीन समुद्र के तल में दफन शार्क के अनगिनत दांत मिले हैं. पैलियोन्टोलॉजिस्ट्स को खुदाई के दौरान शार्क की कम से कम सात अलग-अलग प्रजातियों के दांत मिले हैं. यह खोज इस बात का सबूत है कि प्राचीन समय में यहां मछलियों का एक बड़ा इकोसिस्टम मौजूद था. काहिरा यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने इस इलाके में खुदाई करके कई अहम राज खोले हैं. ये शार्क जीवाश्म बताते हैं कि कभी यह रेगिस्तान खूंखार शिकारियों का घर हुआ करता था.
रेगिस्तान की रेत में कैसे मिले विशाल समुद्र के सबूत?
हमारी पृथ्वी आज जैसी दिखती है वैसी करोड़ों साल पहले नहीं थी. क्रेटेशियस काल के दौरान हमारी धरती का माहौल बहुत अलग था. करीब 145 से 66 मिलियन साल पहले धरती का तापमान काफी ज्यादा था. उस समय ध्रुवों पर बर्फ नाम मात्र की भी नहीं थी. इसके कारण समुद्र का जलस्तर आज के मुकाबले बहुत ज्यादा था. आज हम जिस जमीन पर रहते हैं उसका बड़ा हिस्सा पानी के नीचे था. इसमें उत्तरी अफ्रीका का बड़ा इलाका भी शामिल है. टेक्टोनिक प्लेट्स की गतिविधियों के कारण यहां एक बड़ा समुद्र बन गया था. अबू-तरतूर पठार उसी प्राचीन समुद्र का एक हिस्सा था. आज यह जगह भले ही रेगिस्तान में बदल चुकी है. लेकिन चट्टानों में दबे जीवाश्म अपने अंदर उस समय का पूरा इतिहास समेटे हुए हैं.
शार्क के दांतों ने वैज्ञानिकों को क्या नई जानकारी दी?
इस सूखी जमीन में फास्फेट के बड़े भंडार मौजूद हैं. फास्फेट वहां ज्यादा पाया जाता है जहां समुद्री जीवन बहुत सक्रिय होता है. डुवी फॉर्मेशन का फास्फेट भंडार प्राचीन समुद्र का एक बड़ा अवशेष है. यह उस समय के समुद्री पानी के बेहद उपजाऊ होने का पक्का सबूत भी देता है. काहिरा यूनिवर्सिटी के रिसर्चर तारेक यासीन की टीम ने यहां बड़ी खोज की है. ‘क्रेटेशियस रिसर्च’ में पब्लिश एक पेपर में उन्होंने इस बारे में विस्तार से बताया है. पिछली रिसर्च में यासीन और उनके साथियों को शार्क की दो प्रजातियों के दांत मिले थे. यह एक बड़ा संकेत था कि उस समय समुद्र में कई बड़े शिकारी मौजूद थे. इसके बाद उन्होंने अबू-तरतूर में और ज्यादा गहराई से रिसर्च करने का फैसला किया.
14 दांत पांच प्रजातियों के थे. (Credit : Yassin et al., Cretac. Res., 2026)
डुवी फॉर्मेशन की काली और पीली परतों में क्या छिपा था?
रिसर्चर्स की टीम जब अबू-तरतूर वापस लौटी तो उन्हें बड़ी सफलता मिली. डुवी फास्फेट की काली और पीली परतों ने कई राज उगल दिए. उन्हें खुदाई में शार्क के 14 और दांत मिले. ये दांत शार्क की पांच नई प्रजातियों के थे. ये सभी प्रजातियां अबू-तरतूर में पहले कभी नहीं खोजी गई थीं. प्राचीन शार्क की पहचान करना काफी मुश्किल काम होता है. अक्सर वैज्ञानिकों के पास सबूत के तौर पर सिर्फ उनके दांत ही होते हैं. दांतों की बनावट में मामूली अंतर ही उनकी प्रजाति तय करता है. लेकिन डुवी से मिले दांतों में यह अंतर काफी साफ और स्पष्ट था. कुछ दांत सुई की तरह लंबे और पतले थे. जबकि कुछ चौड़े और किनारे से आरी जैसे थे. ये दांत शिकार को काटने के लिए बिल्कुल सही आकार के थे.
किस तरह के खूंखार शिकारी इस समुद्र में राज करते थे?
एक दांत का आकार करमबिट चाकू की तरह घुमावदार था. दुनिया भर के जीवाश्म रिकॉर्ड के आधार पर इनकी पहचान की गई है. वैज्ञानिकों ने इन दांतों को पांच विलुप्त प्रजातियों का बताया है. इनमें क्रेटालम्ना सीएफ मैरोकाना और स्कैपानोरिन्चस सीएफ रैफियोडोन शामिल हैं. इसके अलावा सेराटोलम्ना सीएफ सेराटा और स्क्वैलिकोरैक्स की दो प्रजातियां भी मिली हैं. ये सभी पांचों प्रजातियां अबू-तरतूर के लिए बिल्कुल नए रिकॉर्ड हैं. इनमें से दो प्रजातियां तो पूरे इजिप्ट के लिए नई हैं. सुई जैसे दांतों वाली शार्क का मिलना सबसे ज्यादा हैरान करने वाला था. अफ्रीका में इस प्रजाति का यह पहला ज्ञात जीवाश्म हो सकता है. यह खोज वहां शार्क की कई प्रजातियों की मौजूदगी को साबित करती है. उस समय अलग-अलग तरह के खतरनाक शिकारी उस पानी में राज करते थे.
शार्क की ये प्रजातियां एक साथ कैसे सर्वाइव करती थीं?
ये शार्क आपस में शिकार के लिए नहीं लड़ती थीं. वे एक बड़े समुद्री वातावरण में अपनी अलग-अलग जगह बनाकर रहती थीं. उनके दांतों की बनावट उनके अलग शिकार के तरीके को बताती है. स्क्वैलिकोरैक्स की मौजूदगी बताती है कि वे किनारे के पास शिकार करती थीं. जबकि स्कैपानोरिन्चस गहरे पानी में रहने वाली शार्क थी. कुछ प्रजातियां खुले समुद्र में रहना ज्यादा पसंद करती थीं. इस पूरे इलाके में मछलियों और प्लैंकटन की कोई कमी नहीं थी. गहरे समुद्र से ऊपर आते पोषक तत्व पानी को उपजाऊ बनाते थे. इससे छोटे जीवों की संख्या बढ़ती थी जो बड़ी मछलियों का शिकार बनते थे. और उन बड़ी मछलियों का शिकार ये खूंखार शार्क करती थीं. यह एक पूरा इकोसिस्टम था जो लाखों सालों तक यहां फलता-फूलता रहा.
क्या ये सभी शार्क एक ही समय में इस कब्रगाह में मरी थीं?
शार्क का यह कब्रिस्तान कई मायनों में बहुत दिलचस्प है. जिस समय ये शार्क यहां रहती थीं तब वहां बहुत कम तलछट जमा होता था. इसलिए यह फास्फेट बेड एक लंबे समय को बहुत छोटी परत में दिखाता है. इस कब्रिस्तान में मिली सभी शार्क एक ही दिन में नहीं मरी थीं. असल में यह अलग-अलग समय में मरे हुए जीवों का एक बड़ा जमावड़ा है. यह बताता है कि उत्तरी अफ्रीका के किनारे पर ऐसे इकोसिस्टम बहुत आम थे. मोरक्को और सीरिया के फास्फेट भंडार भी इसी बात का इशारा करते हैं. आज उस शार्क स्वर्ग का कुछ भी बाकी नहीं बचा है. टेथिस सागर गायब हो चुका है और समुद्र तल रेगिस्तान बन गया है. लेकिन चट्टान में फंसे शार्क के ये दांत हमें एक पूरी खोई हुई दुनिया की कहानी सुनाते हैं.
वैज्ञानिकों ने रिसर्च में शार्क को लेकर और क्या खुलासे किए?
शार्क के दांतों का यह जीवाश्म इतिहास की एक बहुत बड़ी पहेली सुलझाता है. रिसर्च के अनुसार लैम्निफॉर्म शार्क जैसे क्रेटालम्ना बहुत गहरे पानी में रहती थीं. उनकी मौजूदगी वहां एक स्थिर और शांत वातावरण का इशारा करती है. वहां पानी के नीचे कई बड़े बदलाव लगातार होते रहते थे. समुद्र की गहराई से पोषक तत्वों का ऊपर आना एक बड़ी घटना थी. इसी वजह से वहां मछलियों को खाने के लिए भरपूर भोजन मिलता था. इस पूरे समुद्री इलाके को शार्क बिजनेस का एक बड़ा केंद्र माना जा सकता है. इस नई रिसर्च ने वैज्ञानिकों को पुराने डेटा को भी फिर से देखने पर मजबूर किया है.



