बॉर्डर बंद, फिर भी 150 पाकिस्तानी दुल्हनों की कैसे हुई भारत में एंट्री? भावुक कर देगी इनकी दर्दभरी कहानी

नई दिल्ली. सरहद की बंदिशें और तनाव के साए भी दिलों के रिश्ते नहीं रोक पाए. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद जब भारत-पाकिस्तान की सीमाएं सील हुईं और वाघा-अटारी के गेट बंद हो गए, तो कई शादियों पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे थे. लंबा और दर्दनाक इंतजार तब खत्म हुआ, जब गृह मंत्रालय ने सिंध के एक प्रतिष्ठित धर्मस्थल के तालमेल से मानवीय आधार पर खास राहत दी. इसके बाद करीब 150 पाकिस्तानी दुल्हनों ने मोहब्बत को मुकम्मल करने के लिए मस्कट, कोलंबो, ढाका, दुबई और कतर के रास्ते ट्रांजिट फ्लाइट्स पकड़ीं. नागपुर, जोधपुर, अहमदाबाद, रायपुर, पुणे और भोपाल जैसे शहरों में पहुंचकर उन्होंने अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की. सरहद पार से आए परिजनों को तय समय सीमा के भीतर लौटना था, इसलिए शादियां सादगी से हुईं. लेकिन इन रिश्तों ने साबित कर दिया कि जब इरादे मजबूत हों, तो कोई भी नक्शा या सरहद ‘सिंदूर’ के बंधन के आड़े नहीं आ सकती.
आम तौर पर, भारत का वीजा रखने वाले पाकिस्तानी वाघा बॉर्डर से आसानी से आ-जा सकते हैं, लेकिन जमीनी बॉर्डर बंद होने की वजह से उन्हें हवाई जहाज से घूमकर आना पड़ा. टीओआई के एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अप्रैल से जून के बीच, लगभग 450 रिश्तेदारों के साथ दुल्हनें भारत आईं. लंबे समय के वीजा पर भारत में रह रहे इंकेश जशनानी की सगाई ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से पहले हुई थी और शादी पिछले साल होनी थी. उनकी होने वाली पत्नी आरती, सिंध के खानपुर तहसील से मुश्किल सफर तय करके मई 2025 में वाघा बॉर्डर से बस एक किलोमीटर दूर ही पहुंची थीं कि तभी भारत ने अटारी गेट बंद कर दिया.
बॉर्डर पार नहीं कर पाए काजल और उनका परिवारएक साल से ज़्यादा समय के बाद, आरती मस्कट होते हुए नागपुर आईं और मार्च में शादी की. वीजा पाबंदियों के कारण उनके साथ सिर्फ उनके भाई आ पाए, जबकि उनके माता-पिता पीछे ही रह गए. वह कहती हैं, “काश बॉर्डर खुल जाएं और मैं उनसे एक बार मिल सकूं.” भारतीय नागरिकता लेने के बाद नागपुर में रहने वाले संजय कलानी की सगाई तीन साल पहले सिंध के घोटकी जिले की काजल से हुई थी, और उन्होंने लगभग उम्मीद छोड़ दी थी. शादी पिछले साल तय हुई थी, लेकिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद काजल और उनका परिवार बॉर्डर पार नहीं कर पाए. उसके बाद इंतजार कभी न खत्म होने वाला लगने लगा. आखिरकार, 5 महीने पहले दोनों की शादी हुई, जब काजल कराची से मस्कट होते हुए दिल्ली और फिर नागपुर पहुंचीं.
भारत में बसना चाहता हैं राभेल जसवानीसंजय के भाई धीरज को भी तब राहत मिली जब उनकी मंगेतर संजना, सिंध के अंदरूनी इलाके घोटकी तहसील के मीरपुर से उसी रास्ते से भारत आईं. भारत आने वाली उड़ानों में एक दूल्हा भी शामिल था. सिंध के घोटकी से राभेल जसवानी अपने माता-पिता के साथ नागपुर में श्रिया से शादी करने आए थे और तब से यहीं रह रहे हैं. उन्होंने कहा, “मैं भारत में बसना चाहता हूं और जब बॉर्डर खुल जाएंगे तो अपने माता-पिता को भी यहां ले आऊंगा.”
300 लड़कियां शादी के इंतजार मेंश्राइन (दरबार) की ओर से TOI के साथ शेयर किए गए एक नोट के अनुसार, सिंध के घोटकी शहर में स्थित मशहूर शदानी दरबार ने पाकिस्तान में फंसी दुल्हनों का मुद्दा उठाने में अहम भूमिका निभाई. दरबार के पीठाधीश, संत युधिष्ठिरलाल शदानी, जो उत्तराधिकारियों की कतार में नौवें स्थान पर हैं, अब रायपुर में रहते हैं. 18वीं सदी के संत शादाराम साहिब की याद में बनाया गया शदानी दरबार सीमा के दोनों ओर रहने वाले समुदाय के लिए बहुत अहमियत रखता है. समुदाय के नेता राजेश झाम्बिया का कहना है कि यह सिंध से आया पहला जत्था है और भारत सरकार को इंतजार कर रही दूसरी दुल्हनों के लिए भी ऐसा ही कदम उठाना चाहिए. भारत में अभी भी 300 लड़कियां शादी के बंधन में बंधने का इंतजार कर रही हैं.



