Fodder Storage Technique | Bharatpur Fodder Storage | भरतपुर में मिट्टी और घास के कूपों में सुरक्षित रहता है पशुओं का चारा

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गांवों का देसी जुगाड़, मिट्टी-घास से बने कूप में महीनों सुरक्षित रहता है चारा
Last Updated:August 27, 2026, 08:41 IST
Traditional Fodder Storage: भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में पशुओं के चारे को महीनों तक सुरक्षित रखने के लिए आज भी मिट्टी और घास-फूस से कूप बनाने की पारंपरिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. यह कूप चारे को बारिश और नमी से बचाते हैं, जिससे चारा खराब नहीं होता. हालांकि अब प्लास्टिक और तिरपाल के बढ़ते प्रयोग से इन कूपों की संख्या घट रही है, फिर भी कई किसान इस पर्यावरण-अनुकूल और किफायती पारंपरिक ज्ञान को सहेजे हुए हैं.
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Bharatpur: भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद पशुओं के चारे को सुरक्षित रखने की सदियों पुरानी पारंपरिक तकनीक आज भी पूरी तरह जीवंत है. राजस्थान के इस जिले में किसान खेतों और घरों के आसपास मिट्टी और घास-फूस का उपयोग करके विशेष प्रकार के कूप (कुप्प) तैयार करते हैं. इन कूपों में पशुओं के लिए सूखा चारा कई महीनों तक बिना किसी नुकसान के सुरक्षित रखा जाता है. यह स्थानीय स्तर पर अपनाई जाने वाली तकनीक ग्रामीणों की पारंपरिक समझ, उत्कृष्ट शिल्पकला और सीमित संसाधनों के कुशल इस्तेमाल की एक बेमिसाल मिसाल पेश करती है.
इन पारंपरिक कूपों का निर्माण एक योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है. किसान सबसे पहले चारे को धूप में अच्छी तरह सुखाकर तैयार करते हैं ताकि उसमें नमी की मात्रा न्यूनतम रहे. नमी कम होने से चारे में फफूंद लगने का खतरा खत्म हो जाता है. इसके बाद खेत या घर के पास एक ऐसे ऊंचे स्थान का चयन किया जाता है जहां बरसात के पानी के रुकने या जमा होने की संभावना न के बराबर हो. चुने गए स्थान पर मिट्टी और घास-फूस के मिश्रण से गोल आकार का कूप बनाया जाता है. इसकी दीवारों को अतिरिक्त मजबूती प्रदान करने के लिए गीली मिट्टी के साथ घास-फूस को मिलाकर गूंथा जाता है. कूप का ढांचा तैयार होने के बाद उसमें सूखे चारे को परत-दर-परत कसकर भरा जाता है. अंत में ऊपरी हिस्से को भी मिट्टी और घास से पूरी तरह सील कर दिया जाता है ताकि हवा और पानी अंदर न जा सके.
मौसम के प्रभाव से पूर्ण सुरक्षाग्रामीणों के अनुसार मिट्टी और घास-फूस से बने इन कूपों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें रखा चारा भीषण गर्मी, सर्दी और बारिश के बावजूद महीनों तक तरोताजा बना रहता है. कूप की विशेष संरचना चारे को सीधे बारिश और हवा की नमी के संपर्क में आने से बचाती है. साथ ही इसे चारों तरफ से ढककर रखने के कारण इसमें कीड़े-मकौड़े या अन्य कीट लगने की संभावना भी नहीं रहती. जब भी किसानों को जरूरत होती है, वे कूप के एक हिस्से से आवश्यकतानुसार चारा निकालकर पशुओं को खिलाते हैं और फिर उसे वापस ढक देते हैं.
आधुनिकता का बढ़ता प्रभाव और बदलावहालांकि, समय बीतने के साथ-साथ इस पारंपरिक व्यवस्था में भी तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है. आधुनिक साधनों के बढ़ते इस्तेमाल और बदलती ग्रामीण जीवनशैली के कारण कई किसान अब श्रमसाध्य मिट्टी के कूप बनाने के बजाय प्लास्टिक की पन्नी, तिरपाल और शेड का इस्तेमाल करने लगे हैं. प्लास्टिक पन्नी की मदद से कम समय और कम लागत में चारे को ढककर सुरक्षित रख लिया जाता है.
पारंपरिक ज्ञान की अनूठी मिसालगांव के बुजुर्गों का कहना है कि पहले भरतपुर के हर घर और खेत में ऐसे कूप अनिवार्य रूप से देखने को मिलते थे, लेकिन अब इनकी संख्या में धीरे-धीरे कमी आ रही है. इसके बावजूद कई किसान अपनी समृद्ध विरासत और प्राकृतिक तरीकों पर भरोसा बनाए हुए हैं. यह तकनीक स्पष्ट करती है कि बिना किसी आधुनिक मशीनरी या बड़े खर्च के भी हमारे ग्रामीण समाज ने अपने स्थानीय संसाधनों और समृद्ध अनुभव के आधार पर पशुपालन को सुगम बनाने की बेहतरीन व्यवस्था विकसित की थी.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Bharatpur,Bharatpur,Rajasthan
First Published :
August 27, 2026, 08:41 IST



