Nagaur News: गुरु जंभेश्वर और मेड़ता राज का अनोखा इतिहास, केर की लकड़ी बनी खांडा, रोटू-गुलर को मिला धाम का दर्जा

Last Updated:September 06, 2026, 12:18 IST
Nagaur News: राजस्थान की धरती पर गुरु जंभेश्वर महाराज से जुड़ी रोटू और गुलर धाम की कहानी आस्था, इतिहास और लोकविश्वास का अनोखा संगम है. लोक मान्यता के अनुसार गुरु जंभेश्वर ने राव दूदा को केर की लकड़ी दी, जो चमत्कारिक रूप से सप्तधातु के खांडे में बदल गई. आगे चलकर यही खांडा रोटू पहुंचा, जबकि उसकी मूठ गुलर में रह गई. रोटू में गुरु जंभेश्वर के चरण चिह्नों वाली शिला भी श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। सदियों पुरानी ये कथाएं आज भी श्रद्धालुओं को इतिहास और भक्ति से जोड़ती हैं.
राजस्थान की धरती पर लोक आस्था और इतिहास से जुड़ी ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमें संत परंपरा, चमत्कार और राजवंशों का अनोखा मेल देखने को मिलता है. गुरु जंभेश्वर महाराज का संबंध पीपासर, समराथल और मुकाम के साथ-साथ नागौर क्षेत्र के रोटू और गुलर गांव से भी गहराई से जुड़ा है. यही वजह है कि श्रद्धालु इन दोनों स्थानों को रोटू धाम और गुलर धाम के नाम से जानते हैं.
इतिहास और लोक मान्यताओं के अनुसार मेड़ता के राव दूदा को जब देश निकाला मिला, तब वे बीकानेर की ओर जा रहे थे. रास्ते में उन्होंने पीपासर के निकट रात्रि विश्राम के लिए तंबू लगाया. सुबह उनकी मुलाकात बालक रूप में गुरु जंभेश्वर से हुई. राव दूदा ने अपनी पीड़ा सुनाई तो बालक जंभेश्वर ने उन्हें केर की लकड़ी देते हुए कहा कि उनका राज्य उन्हें वापस मिलेगा. इस घटना ने राव दूदा के जीवन की दिशा बदल दी.
राव दूदा को केर की साधारण लकड़ी देखकर मन में शंका हुई. तब गुरु जंभेश्वर ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति से उस लकड़ी को सप्तधातु की तलवार यानी खांडा बना दिया, जबकि उसकी मूठ लकड़ी की ही रही. खांडा हाथ में आते ही राव दूदा की आस्था और विश्वास दृढ़ हो गया. गुरु ने उन्हें मूण्डवा के लाखोलाव तालाब के पास डेरा डालने और जमीन खोदने का निर्देश दिया. लोक परंपरा में माना जाता है कि इसके बाद राव दूदा को अपना खोया हुआ राज्य वापस मिला.
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कहानी की सबसे रोचक कड़ी राव दूदा की तीसरी पीढ़ी के राव जगन्नाथ से जुड़ती है. 17वीं शताब्दी में वे गुलर गांव में एक बारात में गए थे. वहां किसी व्यक्ति ने ताना मारते हुए कहा कि मेड़तियों का राज गुरु जंभेश्वर के दिए खांडे के बल पर चल रहा है. लोगों के उकसाने पर राव जगन्नाथ ने खांडे से एक बकरे पर वार कर दिया. निर्दोष पशु पर वार होते ही खांडे की मूठ राव के हाथ में रह गई और खांडा दूर आसोजा की डूंगरी की पहाड़ी पर जा गिरा.
लोक मान्यता के अनुसार खांडा डेगाना के समीप आसोजा की डूंगरी तक पहुंच गया, जबकि उसकी मूठ गुलर में ही रह गई. संत केसोजी गोदारा बिश्नोई समाज के संत और साहित्यकार माने जाते हैं. बताया जाता है कि उन्हें स्वप्न में गुरु जंभेश्वर का आदेश मिला कि आसोजा की डूंगरी से खांडा लाकर रोटू में सुरक्षित रखा जाए. इसके बाद संत केसोजी खांडा रोटू लेकर आए. आज भी यहां श्रद्धालुओं को खांडा दर्शन करवाया जाता है.
रोटू का महत्व केवल खांडे की कथा तक सीमित नहीं है. विक्रम संवत 1572 में बैशाख सुदी तीज यानी अक्षय तृतीया के दिन गुरु जंभेश्वर भगवान भक्तिनी उमा बाई का मायरा भरने रोटू पहुंचे थे. लोक आस्था के अनुसार उमाबाई के घर के सामने भगवान रथ से उतरे और जैसे ही उन्होंने एक पत्थर की शिला पर चरण रखा, वह शिला पिघल गई. पत्थर पर भगवान के चरण चिह्न अंकित हो गए, जो आज भी मंदिर में श्रद्धा का केंद्र हैं.
रोटू और गुलर की पहचान आज केवल दो गांवों के रूप में नहीं, बल्कि गुरु जंभेश्वर की स्मृतियों और बिश्नोई समाज की आस्था के प्रमुख केंद्रों के रूप में होती है. रोटू में खांडे की पूजा और दर्शन की परंपरा आज भी जारी है, जबकि गुलर में खांडे की मूठ मंदिर में सुरक्षित बताई जाती है. केर की लकड़ी से शुरू हुई यह कथा आज भी इतिहास, लोकविश्वास और गुरु जंभेश्वर की भक्ति को एक सूत्र में जोड़ती है.
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September 06, 2026, 12:18 IST



