कांग्रेस के CM और नेहरू के पक्के दोस्त, फिर गोविंद बल्लभ पंत को BJP क्यों आज भी करती है प्यार?

UP CM Govind Ballabh Pant: पंडित गोविंद बल्लभ पंत की जयंती 10 सितंबर को पूरे देश में मनाई गई. देश के कई दिग्गज नेताओं ने उन्हें याद किया. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी. पंत कांग्रेस के दिग्गज नेता और नेहरू के करीबी थे, लेकिन कई मुद्दों पर उनकी विचारधारा अलग थी. आज कांग्रेस के साथ बीजेपी भी उनका सम्मान करती है. ‘UP CM के गजब किस्से’ के इस भाग में बताएंगे कि पंत की सियासत में ऐसा क्या था, जिसकी वजह से बीजेपी भी उन्हें अपनी राजनीतिक विरासत में जगह देती है.
नेहरू के करीबी, लेकिन सोच में अंतर
मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, पंत और जवाहरलाल नेहरू के रिश्ते काफी करीबी थे. साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लखनऊ में पुलिस की लाठीचार्ज से नेहरू को बचाने के लिए पंत उनके ऊपर गिर भी गए थे. लेकिन करीबी होने के बावजूद दोनों नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद भी थे. इतिहासकारों के हवाले से सामने आए विवरण में पंत को हिंदी का समर्थक और कई मामलों में रूढ़िवादी विचारों वाला नेता बताया गया है.
साधु को उतारा, नरेंद्र देव से मुकाबला
1948 के एक उपचुनाव में पंत की राजनीति का यह अलग पहलू भी दुनिया को पता चला था. जब कांग्रेस के समाजवादी नेताओं के अलग होने के बाद आचार्य नरेंद्र देव के खिलाफ पंत ने बाबा राघव दास को चुनाव मैदान में उतारा था. रिपोर्ट के मुताबिक, यह मुकाबला धार्मिक और वैचारिक आधार पर भी लड़ा गया. पंत ने राघव दास के लिए जमकर प्रचार किया और वह करीब 1,300 वोट से चुनाव जीत गए. बाद में बाबा राघव दास का नाम राम जन्मभूमि से जुड़े घटनाक्रम में भी आया. जब 1949 में अयोध्या में रामलला की मूर्ति रखे जाने के बाद केंद्र की ओर से उसे हटाने का दबाव था. रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय भी राघव दास ने मूर्ति हटाए जाने पर विधानसभा और कांग्रेस से इस्तीफा देने की चेतावनी दी थी.
हिंदी और हिंदू पहचान वाला पहलू
पंत की राजनीति में हिंदी का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा. इसको लेकर पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय अपनी किताब में लिखते हैं कि पंत उर्दू को मुस्लिम भाषा और हिंदी को हिंदू भाषा के तौर पर देखते थे. यही वह पहलू है, जिसे बीजेपी की मौजूदा राजनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है.
BJP को पंत में क्या दिखता है?
Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी लंबे समय से नेहरू और नेहरू-गांधी परिवार की आलोचना के साथ कांग्रेस के दूसरे नेताओं की विरासत को सामने रखती रही है. पंत के मामले में पार्टी उनके उन विचारों और राजनीतिक रुख को अपने वैचारिक सरोकारों के करीब मानती है, जो नेहरू की सोच से अलग थे. इसके अलावा पंत की पारिवारिक विरासत का भी एक पहलू है. उनकी बहू इला पंत 1991 में बीजेपी में शामिल हुई थीं और 1998 में नैनीताल लोकसभा सीट से नारायण दत्त तिवारी को हराया था. पंत के बेटे केसी पंत भी बाद में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए और अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 2000 से 2004 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे.
पंत को सिर्फ एक खांचे में नहीं रख सकते
हालांकि पंत की कहानी सिर्फ बीजेपी के वैचारिक नजरिए तक सीमित नहीं है. वह कांग्रेस के बड़े नेता और नेहरू के करीबी थे. साथ ही भूमि सुधारों से लेकर सामाजिक सुधारों तक उनकी भूमिका रही. रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने हिंदू कोड बिल को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई थी, जिसमें हिंदू महिलाओं को तलाक और पैतृक संपत्ति में अधिकार जैसे प्रावधान मिले. इसलिए गोविंद बल्लभ पंत की राजनीति को किसी एक विचारधारा के खांचे में रखना आसान नहीं है. यही गोविंद बल्लभ पंत की राजनीति का सबसे दिलचस्प पहलू है. वह कांग्रेस के नेता थे, नेहरू के साथी थे, लेकिन हर मुद्दे पर नेहरू की लाइन पर नहीं चलते थे. शायद यही वजह है कि आज कांग्रेस और बीजेपी दोनों उनके सम्मान की बात करते हैं, लेकिन बीजेपी उनके उन पहलुओं को ज्यादा प्रमुखता से सामने रखती है, जिनमें उसे अपनी वैचारिक विरासत की झलक दिखाई देती है.



