Meenakari Art: 78 साल की उम्र में भी कायम है हुनर का जादू, जयपुर की मीनाकारी को दुनिया तक पहुंचा रहे डॉ. इंद्र सिंह

Last Updated:September 30, 2026, 11:56 IST
Jaipur Meenakari Art: जयपुर की मशहूर मीनाकारी कला को 78 साल से संजो रहे डॉ. इंद्र सिंह कुदरत ने यह हुनर अपने पिता से सीखा. सोने-चांदी पर रंगों और बारीक डिजाइन की इस कला को उन्होंने बेटों तक पहुंचाया, जिन्हें भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है. आज जयपुर की मीनाकारी कला देश-विदेश तक अपनी पहचान बना रही है.
जयपुर. जयपुर अपनी कला, संस्कृति और खासतौर पर ज्वैलरी के लिए दुनियाभर में पहचान रखता है, यहां की जड़ाव ज्वैलरी और मीनाकारी कला आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है. इसी विरासत को 78 वर्षीय मीनाकारी कलाकार डॉ. इंद्र सिंह कुदरत लंबे समय से संभाल रहे हैं. उन्हें इस कला के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार और शिल्प गुरु सम्मान मिल चुका है, उनके पिता सरदार कुदरत सिंह को भी मीनाकारी कला का जादूगर माना जाता था.
डॉ. इंद्र सिंह कुदरत बताते हैं कि उन्होंने मीनाकारी की कला अपने पिता सरदार कुदरत सिंह से सीखी, उनके अनुसार जयपुर में मीनाकारी की शुरुआत राजा-महाराजाओं के समय हुई. यह कला लाहौर से जयपुर पहुंची थी और उनके पूर्वजों को जयपुर बुलाकर यहां बसाया गया था. इसके बाद परिवार की कई पीढ़ियों ने इस कला को आगे बढ़ाया, इसी परंपरा को डॉ. इंद्र सिंह कुदरत ने भी अपनाया और देश-विदेश में अपनी पहचान बनाई.
सोने-चांदी पर होती है खास मीनाकारी
डॉ. इंद्र सिंह के मुताबिक मीनाकारी बेहद बारीक और मेहनत वाली कला है, इसमें सोने और चांदी जैसी धातुओं पर रंगीन खनिज पदार्थों की मदद से सुंदर डिजाइन बनाए जाते हैं. इसमें फूल, पत्तियां और पक्षियों जैसी आकृतियों का इस्तेमाल प्रमुखता से किया जाता है. मीनाकारी में लाल, गुलाबी, नारंगी, नीला, हरा, पीला और काला जैसे चमकीले रंगों का प्रयोग किया जाता है. यही रंग ज्वैलरी को खास चमक और आकर्षण देते हैं.
विदेशों तक पहुंची जयपुर की कला
आज मीनाकारी से बनी ज्वैलरी और सजावटी वस्तुएं सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं हैं. देश-विदेश से आने वाले मेहमानों और राष्ट्राध्यक्षों को भी भारतीय कला की पहचान के तौर पर ऐसी वस्तुएं भेंट की जाती हैं. डॉ. इंद्र सिंह बताते हैं कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थाईलैंड यात्रा के दौरान थाई प्रधानमंत्री के पति पिटक सुकसावत को मीनाकारी कला से सजाए गए बाघ के आकार के कफलिंक उपहार में दिए थे.
बेटों ने भी संभाली विरासत
डॉ. इंद्र सिंह कुदरत का कहना है कि कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, लेकिन सरकारी प्रोत्साहन से कलाकारों को आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है. कलाकारों को सम्मान और देश-विदेश में अपनी कला प्रदर्शित करने के मौके भी मिल रहे हैं. उन्होंने बताया कि जैसे उन्होंने अपने पिता से मीनाकारी सीखी, वैसे ही उनके दोनों बेटे भी इस कला से जुड़े हुए हैं और उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. इस तरह जयपुर की सदियों पुरानी मीनाकारी कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच रही है.
About the Authorमोनाली पाल
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
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Jaipur,Rajasthan
First Published :
September 30, 2026, 11:56 IST



