‘बारिश में बेघर रही, बच्चे पाकिस्तानी कहकर चिढ़ाते थे’: अब 18 साल की जिल्लत के बाद मिला भारतीय होने का मान

Pakistan Refugees Indian Citizenship: कराची से 2008 में जब राजनंदिनी उर्फ सावी करीब 50-60 लोगों के जत्थे के साथ भारत आई थीं, तो लगा था कि अपनों के बीच महफूज छत मिलेगी. मगर हकीकत बेहद कड़वी निकली. तीन बच्चों को अकेले पाल रही 31 साल की इस मां के हिस्से सिर्फ शक, ताने और बेघर रहने का दर्द आया. लोग किराए पर कमरा तक देने से कतराते थे और कई बरसाती रातें बिना छत के ही काटनी पड़ीं. 18 साल के लंबे संघर्ष और तिरस्कार के बाद आखिरकार 13 अक्टूबर को वह पल आया, जब राजनंदिनी को भारत की आधिकारिक नागरिकता का सर्टिफिकेट थमाया गया. अब वह और उनके बच्चे सीना तानकर कह सकते हैं कि वे भारतीय हैं.
शक के साए से नागरिकता के सम्मान तकअहमदाबाद में आयोजित विशेष कार्यक्रम में राजनंदिनी की आंखों में सिर्फ खुशी के आंसू थे. गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने मंच से उनके संघर्ष का खास तौर पर जिक्र किया. किसी जमाने में खुद को बेगाना महसूस करने वाली इस महिला का हौसला पूरे हॉल में गूंज उठा. सालों तक जिस समाज में पहचान छुपाने और सफाई देने की मजबूरी थी, उसी समाज में अब उन्हें बराबरी का हक और सम्मान मिला है. तीन मासूमों के सिर पर अब एक मजबूत पहचान की स्थायी छत है.
2008 में कराची से बचकर भारत आई राजनंदिनी ने 18 साल तक झेली जिल्लत और बेबसी. तीन बच्चों की अकेली मां को पाकिस्तान का होने की वजह से कोई घर तक किराए पर नहीं देता था. अहमदाबाद में 158 शरणार्थियों को नागरिकता प्रमाण पत्र सौंपकर उनके हक पर मुहर लगाई गई. नए नियमों के तहत जिला कलेक्टरों को नागरिकता देने के मिले अधिकारों से प्रक्रिया में तेजी आई.
158 शरणार्थियों के जीवन में नई सुबहअहमदाबाद के इस कार्यक्रम में राजनंदिनी अकेली नहीं थीं, बल्कि उनके साथ 158 शरणार्थियों के बरसों पुराने दर्द पर मरहम लगा. इनमें से 126 लोगों को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत और 32 लाभार्थियों को जिला कलेक्टर कार्यालय के जरिए भारतीय नागरिकता के प्रमाण पत्र सौंपे गए. सीएए में हुए संशोधन के बाद देश के सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जिला स्तर पर नागरिकता देने का रास्ता आसान हुआ है. सालों से भारत में शरणार्थी का ठप्पा लगाकर जी रहे इन परिवारों के लिए यह सिर्फ एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि सम्मान से जीने का पासपोर्ट है.
‘कभी पाकिस्तान लौटने के बारे में नहीं सोचा’राजनांदिनी ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि महामारी के दौरान कोविड-19 से उनके पति राजेंद्र (उर्फ़ बाबू) की मौत के बाद, कई लोगों ने उन्हें पाकिस्तान लौटने की सलाह दी क्योंकि भारत में उनका कोई और रिश्तेदार नहीं है. उनके माता-पिता, आठ बहनें और तीन भाई सिंध प्रांत के पूर्वी कराची के चनेसर गोठ इलाके में रहते हैं. लेकिन उन्होंने लौटने से इनकार कर दिया, सिलाई का काम करके अपने बच्चों की परवरिश जारी रखी और अब उन्हें भारतीय नागरिकता मिल गई है. उन्होंने कहा, “मैंने कभी पाकिस्तान वापस जाने के बारे में नहीं सोचा. क्योंकि यहां हालात चाहे कितने भी बुरे क्यों न लगें, बॉर्डर के उस पार हालात इससे भी ज़्यादा बुरे हैं… मैं कराची वापस जाकर अपने बच्चों की ज़िंदगी बर्बाद नहीं करना चाहती.”
पाकिस्तान से आई पूनम गिहारा ने बताई अपनी कहानीअहमदाबाद के ऑडिटोरियम में 35 साल की पूनम गिहारा अपनी 22 साल की बेटी केसर और दामाद रोहन के साथ बैठी थीं. उन्हें उम्मीद थी कि आखिरकार उन्हें भारत की नागरिकता मिल जाएगी. पूनम मूल रूप से पाकिस्तान के सिंध प्रांत के हैदराबाद में ‘काली रोड’ (जिसका नाम बदलकर अब ‘हाली रोड’ कर दिया गया है और जहां हिंदुओं की अच्छी-खासी आबादी रहती है) की रहने वाली हैं. उन्होंने बताया कि 2008 में उनके कुछ रिश्तेदारों के वहां से चले जाने के बाद, 2013 में वह 70 लोगों के एक समूह के साथ भारत आईं; इस समूह में ज़्यादातर उनके परिवार के ही सदस्य थे.
पूनम ‘थार एक्सप्रेस’ से भारत आईं. यह समझौता एक्सप्रेस के बाद दूसरी क्रॉस-बॉर्डर ट्रेन थी, जो 2006 से 2019 तक भारत और पाकिस्तान के बीच चली. यह राजस्थान के जोधपुर में भगत की कोठी रेलवे स्टेशन और पाकिस्तान के सिंध प्रांत में कराची कैंटोनमेंट रेलवे स्टेशन के बीच चलती थी. उन्होंने कहा, “हमने ज़ीरो पॉइंट पार किया और फिर मुनाबाओ (राजस्थान) पहुंचे. वहां से हम जोधपुर गए, फिर अहमदाबाद में बसने से पहले एक हफ्ते तक दिल्ली के एक गुरुद्वारे में रुके.”
पूनम ने बताया, हमें आज भी सुनने पड़ते हैं तानेपूनम ने बताया कि पाकिस्तान से आने के बाद से ही उन्हें ताने सुनने पड़े हैं. महिला ने बताया, “हमें बहुत ताने सुनने पड़े और आज भी सुनने पड़ते हैं. यहां तक कि बच्चे भी मुंह पर हमें पाकिस्तानी कहने में कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं करते. हम इस पर झगड़ने के बजाय इसे नजरअंदाज करने की कोशिश करते हैं.” जब उनसे पूछा गया कि क्या भारतीय नागरिकता मिलने से लोगों का उनके प्रति नजरिया बदल सकता है, तो उन्होंने कहा, “हमें कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं है. कुत्ते तो भौंकते ही रहेंगे, हम उससे परेशान नहीं हो सकते.”



