टोंक में BJP की हैट्रिक लगेगी या कांग्रेस करेगी वापसी? जानें पूरा सियासी गणित

टोंक. राजस्थान में पंचायत चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज होने लगी है. टोंक जिला परिषद का चुनाव इस बार कई मायनों में खास रहने वाला है. परिसीमन के बाद जिला परिषद सदस्यों की संख्या 25 से बढ़कर 31 हो गई है. वहीं जिला प्रमुख की सीट अनुसूचित जाति (SC) की महिला के लिए आरक्षित की गई है. ऐसे में चुनाव का मुकाबला केवल बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचने की रणनीति का भी होगा.
टोंक जिले में जिला परिषद के चुनाव तीसरे और चौथे चरण में होने हैं. बीजेपी लगातार तीसरी बार जिला प्रमुख की कुर्सी पर अपना कब्जा बनाए रखने की कोशिश करेगी, जबकि कांग्रेस पिछले 10 साल से चला आ रहा सूखा खत्म करना चाहेगी. इस चुनाव में टोंक विधायक सचिन पायलट और कांग्रेस सांसद हरीश मीणा की साख दांव पर रहेगी. वहीं बीजेपी की ओर से प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री कन्हैयालाल चौधरी की भूमिका अहम मानी जा रही है.
जिला प्रमुख की सीट SC महिला के लिए आरक्षित, मालपुरा-टोडारायसिंह पर नजरइस बार टोंक जिला परिषद के कुल 31 वार्डों में से तीन सीटें अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. जिला प्रमुख का पद भी SC महिला के लिए आरक्षित होने से इन सीटों का राजनीतिक महत्व बढ़ गया है. खास तौर पर मालपुरा-टोडारायसिंह विधानसभा क्षेत्र से आने वाले तीन वार्डों को जिला प्रमुख की दौड़ के लिहाज से अहम माना जा रहा है. राजनीतिक नजरिए से देखें तो इन सीटों पर प्रत्याशियों का चयन दोनों दलों के लिए काफी महत्वपूर्ण होगा. जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचने के लिए पार्टी को जिला परिषद में बहुमत के साथ सही समीकरण भी बनाने होंगे. ऐसे में टिकट वितरण के दौरान जातीय समीकरण, स्थानीय नेताओं का प्रभाव और जीतने की संभावना जैसे मुद्दे चर्चा में रहेंगे. हालांकि जिला प्रमुख कौन बनेगा, यह चुनाव परिणाम और पार्टी के भीतर होने वाले फैसलों पर निर्भर करेगा. फिलहाल आरक्षण के कारण SC महिला उम्मीदवारों के चयन पर सबकी नजर रहेगी.
टोंक में कांग्रेस का लंबा इतिहास, 2015 के बाद बदला सियासी समीकरण
टोंक जिला परिषद के इतिहास पर नजर डालें तो लंबे समय तक कांग्रेस का दबदबा रहा है. वर्ष 1959 से 2015 तक जिला परिषद में कांग्रेस का प्रभाव बना रहा. इस दौरान कई नेता जिला प्रमुख की कुर्सी पर पहुंचे. चंद्रबिहारी व्यास 1959 से 1977 तक जिला प्रमुख रहे. इसके बाद कंचन देवी, अलताफ हुसैन चिश्ती, सरोज गुर्जर, रामविलास चौधरी और कल्ली देवी ने पांच-पांच साल तक जिला प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली.
द्वारका प्रसाद बैरवा भी टोंक जिला परिषद के प्रमुख चेहरों में रहे. वे 1988 से 1991 तक जिला प्रमुख रहे और बाद में 2000 से 2005 तक फिर इस पद पर पहुंचे. वहीं 1977 से 1982 और 1991 से 1995 तक जिला प्रमुख की कुर्सी पर प्रशासक रहे.
वर्ष 2015 में पहली बार बीजेपी के सत्यनारायण चौधरी जिला प्रमुख बने. इसके बाद 2020 में बीजेपी की सरोज बंसल ने जिला प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली. इस तरह पिछले दो चुनावों में बीजेपी जिला परिषद की कमान अपने पास रखने में सफल रही.
अब बीजेपी के सामने तीसरी बार जिला प्रमुख बनाकर अपनी पकड़ मजबूत करने की चुनौती है. दूसरी तरफ कांग्रेस अपने पुराने राजनीतिक आधार को फिर से मजबूत करना चाहती है. पार्टी के लिए यह चुनाव केवल जिला परिषद में वापसी का मौका नहीं, बल्कि ग्रामीण राजनीति में अपनी ताकत दिखाने की परीक्षा भी है.
सचिन पायलट का प्रभावटोंक विधानसभा क्षेत्र में सचिन पायलट का राजनीतिक प्रभाव रहा है. हालांकि पूरे जिले की पंचायत राजनीति में इस प्रभाव को कितनी सीटों में बदला जा सकेगा, यह चुनाव के दौरान साफ होगा. कांग्रेस सांसद हरीश मीणा और स्थानीय संगठन के सामने भी जिला परिषद में बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती रहेगी. कांग्रेस में टिकट वितरण के दौरान सचिन पायलट के साथ जिला अध्यक्ष सउद सईदी की भूमिका पर भी नजर रहेगी.
टिकट वितरण में स्थानीय नेताओं की भी परीक्षापिछले नगर परिषद चुनाव में टिकट वितरण को लेकर जिला अध्यक्ष की भूमिका चर्चा में रही थी, हालांकि इसके बावजूद कांग्रेस नगर परिषद में अपना बोर्ड बनाने में सफल रही थी. इस बार जिला परिषद और पंचायत समिति के टिकट तय करते समय पार्टी के भीतर सहमति बनाना आसान नहीं माना जा रहा. अलग-अलग नेताओं की पसंद और स्थानीय समीकरणों के बीच जीतने वाले उम्मीदवार चुनना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती हो सकती है. अगर टिकट वितरण में गुटबाजी हावी हुई तो इसका असर चुनावी नतीजों पर भी पड़ सकता है.
बीजेपी में कन्हैयालाल चौधरी के साथ इन नेताओं की रहेगी भूमिकाबीजेपी के लिए भी टिकट वितरण आसान नहीं रहने वाला. जिले में कैबिनेट मंत्री कन्हैयालाल चौधरी की भूमिका इस बार महत्वपूर्ण मानी जा रही है. पार्टी के जिला अध्यक्ष चंद्रवीर सिंह चौहान के साथ पूर्व सांसद सुखबीर सिंह जौनापुरिया और पूर्व विधायक अजित सिंह मेहता भी उम्मीदवारों के चयन में भूमिका निभा सकते हैं. बीजेपी के सामने पिछले दो चुनावों में मिली सफलता को दोहराने की चुनौती है. वर्ष 2015 में सत्यनारायण चौधरी और 2020 में सरोज बंसल के जिला प्रमुख बनने के बाद पार्टी अब लगातार तीसरी बार अपनी पसंद का जिला प्रमुख बनाना चाहेगी.
ये जिला परिषद है, बड़े नेताओं का प्रभाव काफी नहींजिला परिषद के चुनाव में केवल बड़े नेताओं का प्रभाव ही काफी नहीं होता. वार्ड स्तर पर उम्मीदवार की पकड़, स्थानीय कार्यकर्ताओं की सक्रियता और चुनाव के समय पार्टी के भीतर तालमेल भी अहम होता है. ऐसे में बीजेपी को टिकट वितरण में सभी समीकरण साधने होंगे. किसी वार्ड में दावेदारों के बीच नाराजगी पैदा होती है तो उसका असर आसपास की सीटों पर भी पड़ सकता है.
आठ पंचायत समितियों में भी बीजेपी-कांग्रेस के बीच मुकाबलाटोंक जिले की आठ पंचायत समितियों में प्रधान बनाने को लेकर भी बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला रहने की संभावना है. जिला परिषद के साथ पंचायत समिति चुनावों के नतीजे भी जिले की ग्रामीण राजनीति की तस्वीर तय करेंगे. दोनों दलों के लिए जरूरी होगा कि वे जिला परिषद के साथ पंचायत समितियों में भी अपने उम्मीदवारों को मजबूत स्थिति में रखें.
नरेश मीणा ने दिलचस्प बना दिया चुनावी माहौलइसी बीच नरेश मीणा ने भी चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान किया है. उन्होंने देवली और उनियारा पंचायत समिति में सदस्य और प्रधान बनवाने में मुख्य भूमिका निभाने का दावा किया है. नरेश मीणा बहुजन समाज पार्टी (BSP) के चुनाव चिह्न हाथी के साथ अपने प्रत्याशी मैदान में उतारेंगे. उनकी चुनावी रणनीति का असर कितना होगा, यह उम्मीदवारों की स्थिति और चुनाव परिणाम सामने आने के बाद ही पता चलेगा. हालांकि, उनके मैदान में आने से देवली और उनियारा की पंचायत राजनीति में मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है. यहां बीजेपी और कांग्रेस के अलावा बीएसपी के उम्मीदवार भी समीकरणों को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे.
इस बार किसके हाथ आएगी टोंक की ग्रामीण सत्ता?टोंक जिला परिषद चुनाव में मुकाबला कई स्तरों पर होगा. बीजेपी के सामने लगातार तीसरी बार जिला प्रमुख बनाने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस 10 साल बाद वापसी की उम्मीद के साथ मैदान में उतरेगी. जिला प्रमुख की सीट SC महिला के लिए आरक्षित होने से उम्मीदवारों का चयन और भी महत्वपूर्ण हो गया है. एक तरफ सचिन पायलट और सांसद हरीश मीणा के लिए कांग्रेस की ताकत साबित करने का मौका है, तो दूसरी तरफ मंत्री कन्हैयालाल चौधरी और बीजेपी संगठन के सामने अपना राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने की परीक्षा है. टिकट वितरण में गुटबाजी, स्थानीय नेताओं की पसंद और आठ पंचायत समितियों के समीकरण भी चुनाव की दिशा तय कर सकते हैं. अब सवाल यही है कि टोंक में बीजेपी जिला प्रमुख की कुर्सी पर लगातार तीसरी बार कब्जा जमा पाएगी या कांग्रेस अपना 10 साल का सूखा खत्म कर फिर से वापसी करेगी? इसका जवाब चुनाव परिणाम देंगे, लेकिन इतना तय है कि इस बार टोंक की ग्रामीण सत्ता के लिए मुकाबला दिलचस्प रहने वाला है.



