Agriculture: न जमीन की जरूरत, न महंगी मशीनरी, भूसे से उगाएं मशरूम की यह किस्म, 300 रुपये किलो है कीमत

नागौर: परंपरागत खेती करने वाले किसानों के लिए मशरूम की खेती फायदे का सौदा है. इस खेती में कम लागत में अधिक मुनाफा मिलता है. राजस्थान में जलवायु के लिहाज से ढींगरी यानी ऑयस्टर मशरूम की खेती अनुकूल मानी जाती है. इसकी खासियत यह है कि इसके लिए बड़े खेत या महंगी मशीनरी की जरूरत नहीं होती. किसान घर के किसी कमरे और शेड में भी इसकी खेती कर सकते हैं. इतना ही नहीं, गेहूं के भूसे और धान के पुआल जैसे कृषि अवशेषों का इस्तेमाल कर किसान इन बेकार समझे जाने वाले संसाधनों को कमाई के साधन में बदल सकते हैं.
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग सिंह ने बताया कि प्रकृति में मशरूम की करीब 14 से 15 हजार प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन इनमें से सभी मशरूम खाने योग्य नहीं होती हैं. इनमें मुख्य रूप से बटन मशरूम, ढींगरी मशरूम, दूधिया मशरूम और पुआल मशरूम की खेती की जाती है. इनमें ढींगरी मशरूम की खेती किसानों के लिए खास उपयोगी है. इसकी खेती सालभर की जा सकती है और बाजार में इसकी मांग भी बनी रहती है. इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और विभिन्न विटामिन पाए जाते हैं. इसके अलावा इसमें कई औषधीय तत्व भी मौजूद होते हैं.
ऐसे तैयार करें मशरूम की उपज
ढींगरी मशरूम की खेती के लिए सबसे पहले गेहूं के भूसे या धान के पुआल को तैयार करना होता है. इसके लिए करीब 200 लीटर क्षमता वाले ड्रम में भूसा डालकर उसमें गर्म पानी डाला जाता है. भूसे को करीब 5 से 7 घंटे तक उपचारित किया जाता है. उपचार के दौरान प्रति लीटर पानी में 2 ग्राम की दर से मेंकोजेब मिलाया जाता है. इसके बाद भूसे को पानी से निकालकर साफ पॉलिथीन या तिरपाल पर फैला दिया जाता है. भूसे में करीब 60 प्रतिशत नमी बनाए रखना जरूरी होता है.
एक क्विंटल भूसे के लिए 10 किलो स्पॉन की जरूरत
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट के अनुसार मशरूम उत्पादन में अच्छे और ताजे बीज यानी स्पॉन का इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है. ऐसे में किसानों को भूसा तैयार करने से पहले ही स्पॉन खरीद लेना चाहिए. करीब एक क्विंटल सूखे भूसे के लिए लगभग 10 किलो मशरूम बीज की आवश्यकता होती है. करीब 4 किलो गीले भूसे में 100 ग्राम बीज मिलाकर इसे 60×40 सेंटीमीटर आकार की पॉलिथीन थैली में भरा जाता है. थैली का मुंह रबर बैंड से बंद कर दिया जाता है और उसमें 10 से 15 छोटे छेद किए जाते हैं, ताकि हवा का उचित आवागमन बना रहे.
18-20 दिन में तैयार होने लगता है कवक जाल
स्पॉन डालने के बाद पॉलिथीन की थैलियों को अनुकूल वातावरण में रखा जाता है. करीब 18 से 20 दिन बाद थैलियों के अंदर सफेद रंग का कवक जाल यानी माइसीलियम फैलने लगता है. जब भूसा सफेद कवक जाल से अच्छी तरह ढक जाए तो पॉलिथीन को हटा दिया जाता है. इसके बाद कमरे की नमी के अनुसार पानी का छिड़काव किया जाता है. ध्यान रखना जरूरी है कि मशरूम उत्पादन वाले स्थान पर अत्यधिक पानी या सीधी धूप न पहुंचे.
भूमिहीन किसान भी कर सकते हैं मशरूम की खेती
ढींगरी मशरूम की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके लिए कृषि योग्य जमीन होना जरूरी नहीं है. किसान कमरे, बांस या ईंटों से बने छोटे कमरे में भी इसकी खेती कर सकते हैं. इसमें ध्यान रखना जरूरी है कि कमरे में खिड़की और दरवाजे पर जाली लगी होनी चाहिए और हवा के आवागमन की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए. मशरूम पर सूर्य की सीधी किरणें नहीं पड़नी चाहिए. इस खेती में सही तापमान, नमी और साफ सफाई बनाए रखने से उत्पादन भी अधिक मिलता है.
छतरी मुड़ने लगे तो समझें तुड़ाई का आ गया समय
ढींगरी मशरूम की तुड़ाई में भी सावधानी जरूरी है. जब मशरूम की छतरी का बाहरी किनारा ऊपर की तरफ मुड़ने लगे, तब यह तोड़ने योग्य हो जाती है. किसान ध्यान रखें कि वे उसकी तुड़ाई हमेशा पानी के छिड़काव से पहले करें. सामान्य तौर पर इसका फसल चक्र करीब 50 से 60 दिन का होता है. समय पर तुड़ाई करने से मशरूम की गुणवत्ता बेहतर रहती है और बाजार में अच्छी कीमत मिलने की संभावना बढ़ जाती है.
200 से 300 रुपये किलो तक मिल सकता है भाव
मशरूम की बाजार में लगातार मांग बनी रहती है. खासकर शहरों में होटल, रेस्टोरेंट और घरों के बीच इसकी मांग अधिक रहती है. ढींगरी मशरूम से सब्जी, पकौड़े, अचार, कटलेट, कोफ्ता और अन्य खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं. इसके अलावा इसे सुखाकर भी लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सकता है. बाजार में ढींगरी मशरूम की कीमत करीब 200 से 300 रुपये प्रति किलो तक रहती है.
कृषि अवशेषों से किसान बढ़ा सकते हैं आमदनी
ढींगरी मशरूम की खेती में गेहूं और चावल के भूसे तथा पुआल जैसे कृषि अवशेषों का इस्तेमाल होता है. यानी खेतों में अक्सर बेकार समझे जाने वाले अवशेषों को उपयोगी बनाकर किसान अतिरिक्त आय हासिल कर सकते हैं. कम जगह, सीमित संसाधन और कम लागत के कारण छोटे और सीमांत किसान भी इस खेती को आसानी से करके अपनी आय बढ़ा सकते हैं. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग सिंह के अनुसार मशरूम की खेती शुरू करने वाले किसानों को पहले इसका प्रशिक्षण लेना चाहिए.
मशरूम अनुसंधान निदेशालय, सोलन, हिमाचल प्रदेश में मशरूम उत्पादन से जुड़े प्रशिक्षण नियमित रूप से ऑनलाइन और ऑफलाइन उपलब्ध कराए जाते हैं. इसके अलावा राजस्थान कृषि महाविद्यालय उदयपुर में भी मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लिया जा सकता है. यहां किसानों को मशरूम का बीज भी उपलब्ध कराया जाता है.



