Rajasthan

आगे-आगे कोतल घोड़लो… 600 घोड़ों का सौदा, युद्ध और ढोल की थाप, इस लोकगीत में छिपी है ऐतिहासिक रणनीति

Last Updated:June 27, 2026, 13:08 IST

Rajasthan folk song Kotal Ghoda : राजस्थान के लोकगीत आगे आगे कोतल घोड़लो की कथा में महाराजा अभय सिंह की रणनीति, 600 घोड़ों को ढोल पर नाचने की ट्रेनिंग देकर जयपुर की सेना की योजना विफल होती है. शक्ति सिंह के अनुसार यह कहानी उस समय की है, जब जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने जोधपुर के महाराजा अभय सिंह से 600 घोड़े खरीदे थे. घोड़ों की आपूर्ति के लिए महाराजा अभय सिंह ने चार महीने का समय मांगा.

जोधपुर. राजस्थान की लोक संस्कृति में कई ऐसे गीत हैं, जिनके पीछे इतिहास की अनसुनी कहानियां छिपी हुई हैं. ऐसा ही एक प्रसिद्ध लोकगीत है आगे-आगे कोतल घोड़लो… यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि राजपूताना की सूझबूझ, युद्धनीति और शाही परंपराओं का जीवंत प्रतीक माना जाता है. शक्ति सिंह ने इस लोकगीत से जुड़ी ऐतिहासिक कथा साझा करते हुए बताया कि कैसे खूबसूरती से सजा एक घोड़ा युद्ध का नहीं, बल्कि शाही जुलूस की शान बढ़ाने का माध्यम बन गया.

शक्ति सिंह ने बताया कि कोतल घोड़ा उस विशेष घोड़े को कहा जाता है, जिसे आकर्षक तरीके से सजाया जाता है और जो किसी भी शाही जुलूस या शोभायात्रा में सबसे आगे चलता है. राजस्थान के लोकगीत आगे-आगे कोतल घोड़लो… में इसी घोड़े का उल्लेख मिलता है. यह घोड़ा युद्ध के लिए नहीं, बल्कि राजसी वैभव, परंपरा और सम्मान का प्रतीक माना जाता था. इसलिए इसका श्रृंगार भी बेहद भव्य और विशेष ढंग से किया जाता था.

600 घोड़ों का सौदा और महाराजा अभय सिंह की अनोखी रणनीतिशक्ति सिंह के अनुसार यह कहानी उस समय की है, जब जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने जोधपुर के महाराजा अभय सिंह से 600 घोड़े खरीदे थे. घोड़ों की आपूर्ति के लिए महाराजा अभय सिंह ने चार महीने का समय मांगा. तय समय पूरा होने पर सभी घोड़े जयपुर भेज दिए गए. कुछ समय बाद इन्हीं घोड़ों के साथ जयपुर की सेना ने जोधपुर पर चढ़ाई कर दी. तब महाराजा अभय सिंह ने उन घोड़ों को प्रशिक्षित करने वाले व्यक्ति को बुलाया और उसे अपना हुनर दिखाने का आदेश दिया.

ढोल की थाप पर नाचने लगे घोड़ेयुद्ध के मैदान में एक ओर मारवाड़ की सेना और दूसरी ओर जयपुर की सेना आमने-सामने खड़ी थी. तभी घोड़ों के प्रशिक्षक ने ढोल बजाना शुरू किया. ढोल की आवाज सुनते ही जयपुर की सेना के सभी घोड़े युद्ध करने के बजाय नाचने लगे. दरअसल, चार महीनों के दौरान उन घोड़ों को इस तरह प्रशिक्षित किया गया था कि वे ढोल की थाप सुनते ही नृत्य करने लगें. इस कारण वे युद्ध में उपयोगी नहीं रहे और जयपुर की सेना की रणनीति कमजोर पड़ गई. शक्ति सिंह ने बताया कि यही वजह है कि कोतल घोड़ा युद्ध का नहीं, बल्कि शाही जुलूस और परंपराओं की शोभा बढ़ाने वाला घोड़ा माना जाता है. इसी ऐतिहासिक प्रसंग ने राजस्थान के प्रसिद्ध लोकगीत आगे-आगे कोतल घोड़लो… को लोक संस्कृति में विशेष पहचान दिलाई.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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