Ancient Drug Use : 25000 साल पहले ही नशे में रहने लगे थे इंसान! रोज खाते थे ये भूरी गोल चीज, मसालों में आज भी होती है इस्तेमाल

इंसानों को नशे की लत 25,000 पहले ही लग गई थी. अब तक वैज्ञानिक यही मानते थे कि जब इंसानों ने एक जगह बसकर खेती करना सीखा, तभी से शराब और दूसरे नशों की शुरुआत हुई. लेकिन इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप से मिले एक नए सबूत ने इस पूरी थ्योरी को पलटकर रख दिया है. वैज्ञानिकों को सुलावेसी में 25,000 साल पुराने इंसानी दांत मिले हैं. इनकी जांच में पता चला है कि उस दौर के शिकारी इंसान रोज एक भूरी और गोल चीज मुंह में रखकर धीरे-धीरे चबाते रहते थे. इसी चीज स उन्हें हल्का नशा हो जाता था. ये चीज आज भी सब्जी में डाले जाने वाले मसालों में इस्तेमाल की जाती है.
क्या है वो चीज जिससे 25 हजार साल पहले नशा करते थे इंसान
ये गोल चीज कोई और नहीं, बल्कि वही सुपारी है जिसे आज पान, गुटखे और मसालों में इस्तेमाल किया जाता है. इस खोज ने साबित कर दिया है कि इंसान आज से 25,000 साल पहले भी नशे का मजा ले रहा था. ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की ये रिसर्च पूरी दुनिया में किसी भी नशीले पौधे के इस्तेमाल का अब तक का सबसे पुराना सबूत बन गई है.
सालों से किताबों और रिसर्च में यही पढ़ाया जाता रहा है कि इंसानों में नशा करने की आदत तब पड़ी, जब उसने खेती करना शुरू किया. पुरानी थ्योरी के मुताबिक, इंसानों ने सबसे पहले लगभग 13,000 साल पहले इजरायल वाले इलाके में जौ की मदद से बीयर यानी पहली फर्मेंटेड ड्रिंक बनाई थी. इसके बाद कांस्य युग यानी आज से करीब 3,500 साल पहले नशीले पौधों के इस्तेमाल की बातें कही जाती थीं.
लेकिन ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने इस पुरानी सोच को पूरी तरह खारिज कर दिया है. यूनिवर्सिटी के ‘ऑस्ट्रेलियन रिसर्च सेंटर फॉर ह्यूमन इवोल्यूशन’ के प्रोफेसर एडम ब्रम का कहना है कि पुरानी थ्योरी बहुत अधूरी थी. वो इस बात को मान ही नहीं रही थी कि इंसानों में नशे की आदत कितनी गहरी और पुरानी हो सकती है. सुलावेसी द्वीप की खोज ने साफ कर दिया है कि जब दुनिया में आइस एज चल रहा था, तब भी गुफाओं में रहने वाला इंसान अपने दिमाग को अलग एहसास और राहत देने के लिए नशीली चीजों का इस्तेमाल कर रहा था.
दुनिया का चौथा सबसे लोकप्रिय नशा है सुपारी
आज भी सुपारी दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला चौथा बड़ा नशा है. अगर पहले तीन नंबरों की बात करें, तो उनमें शराब, कैफीन और निकोटिन आते हैं. पश्चिमी देशों में भले ही लोग सुपारी के बारे में ज्यादा न जानते हों, लेकिन भारत से लेकर पैसिफिक महासागर के द्वीपों तक इसका जबरदस्त इस्तेमाल होता है. आज दुनिया की कुल आबादी का हर 10 में से 1 इंसान यानी लगभग 60 करोड़ लोग रोज किसी न किसी रूप में सुपारी या पान खाते हैं.
आज के दौर में जब लोग सुपारी खाते हैं तो इसे कत्थे, बुझे हुए चूने और दूसरे मसालों के साथ मिलाकर पान या गुटखा बनाते हैं. इसमें चूना सबसे खास काम करता है. चूने की वजह से एक केमिकल रिएक्शन होता है, जिससे सुपारी के अंदर मौजूद नशीला तत्व ‘एरेकोलीन’ खून में बहुत तेजी से घुल जाता है और तुरंत दिमाग पर असर दिखाता है. लेकिन वैज्ञानिक सालों से परेशान थे कि इंसानों ने सुपारी खाना पहली बार कब शुरू किया होगा. दरअसल, पुरातात्विक खुदाई में सुपारी के बीज इतने हजार सालों तक सुरक्षित बचे ही नहीं रहते.
25,000 साल पुराने दांतों ने खोला गहरा राज
वैज्ञानिकों की ये तलाश इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप पर जाकर खत्म हुई. वहां खुदाई के दौरान दो प्राचीन इंसानों के बेहद दुर्लभ कंकाल और दांत मिले. ‘साइंस एडवांसेस’ नाम के नामी जर्नल में छपी इस रिसर्च में बताया गया है कि इनमें से एक इंसान लगभग 25,000 से 16,000 साल पहले का था. वहीं दूसरा इंसान आज से करीब 7,600 से 6,300 साल पहले का था.
जब वैज्ञानिकों ने इन प्राचीन इंसानों के दांतों को माइक्रोस्कोप से देखा तो वो दंग रह गए. दांतों के ऊपर अजीब तरह की घिसावट थी और गोल-गोल गहरे गड्ढे बने हुए थे. ये घिसावट किसी आम खाना चबाने या हड्डियां चबाने से नहीं बन सकती थी. ध्यान से जांच करने पर वैज्ञानिकों को समझ आया कि ये निशान लगातार पूरी सुपारी को मुंह में रखकर घंटों चूसने की वजह से बने थे. ये इतिहास में पहली बार देखा गया एक नया बायो-आर्कियोलॉजिकल मार्कर था.
बिना चूने के कैसे चढ़ता था नशा? लैब में हुआ हैरान करने वाला टेस्ट
वैज्ञानिकों के सामने अब एक नई पहेली खड़ी हो गई थी. अब तक की साइंस यही मानती थी कि सुपारी का नशीला केमिकल ‘एरेकोलीन’ तभी असर करता है जब उसमें चूना मिलाया जाए. लेकिन 25,000 साल पहले इंसानों के पास चूना बनाने की तकनीक नहीं थी तो फिर उन्हें बिना चूने के नशा कैसे चढ़ता था.
इस रहस्य को सुलझाने के लिए प्रोफेसर एडम ब्रम की टीम ने लैब में एक अनोखा प्रयोग किया.
वैज्ञानिकों ने बिना कटी पूरी सुपारी को आर्टिफिशियल लार यानी नकली थूक में कई घंटों तक भिगोकर रखा.
इसके बाद उससे जो लिक्विड तैयार हुआ, उसका टेस्ट मेंढक के अंडों की कोशिकाओं में मौजूद इंसानी रिसेप्टर्स पर किया गया.
ये रिसेप्टर्स असल में दिमाग के उन स्विचों की तरह काम करते हैं, जो हमारी सोच और मूड को कंट्रोल करते हैं.
प्रयोग के नतीजों ने सबको चौंका दिया. पता चला कि अगर कोई इंसान बिना चूने के भी सिर्फ साबुत सुपारी को मुंह में रखकर चूसता रहे, तो भी उससे इतनी मात्रा में एरेकोलीन कैमिकल निकल जाता है जो दिमाग की एक्टिविटी को बदल सके और हल्का नशा दे सके. इसके बाद जब प्राचीन दांतों के अंदर केमिकल्स की जांच की गई तो उनके अंदर भी एरेकोलीन पाया गया. इससे ये बात सौ फीसदी साबित हो गई कि वो लोग सुपारी चूस रहे थे.
दांत दर्द की दवा बनी जी का जंजाल: लत का खतरनाक चक्र
अब सवाल उठता है कि उन प्राचीन इंसानों ने सुपारी चूसना शुरू क्यों किया होगा. क्या वो सिर्फ नशे का मजा लेना चाहते थे. वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे मजे से ज्यादा एक बड़ी मजबूरी रही होगी. सुपारी के अंदर मौजूद ‘एरेकोलीन’ केमिकल न सिर्फ नशा देता है, बल्कि ये एक नेचुरल पेनकिलर भी है.
आइस एज के समय हंटर-गैदरर्स यानी शिकारी इंसानों के पास आज की तरह टूथपेस्ट या डेंटिस्ट तो थे नहीं. उनके दांतों में अक्सर भयंकर कीड़े लगते थे और दर्द रहता था. दांत दर्द से तुरंत राहत पाने के लिए उन्होंने सुपारी को मुंह में रखकर चूसना शुरू किया होगा लेकिन ये इलाज उनके लिए आगे चलकर बहुत बड़ी आफत बन गया.
दांतों का पूरी तरह घिसना: लगातार सख्त सुपारी चूसने की वजह से उनके दांतों की बाहरी मजबूत परत घिसकर खत्म हो गई.
नसों का बाहर आना: घिसावट इतनी ज्यादा हो गई कि दांतों के अंदर की नाजुक नसों वाला हिस्सा (पल्प चैंबर) बिल्कुल बाहर निकल आया.
भयंकर इंफेक्शन और दर्द: नसें खुली तो खाना खाने में चीखें निकल जाती थीं और मुंह में गंभीर इंफेक्शन फैलने लगा.
मजबूरी का चक्र: दर्द बढ़ा तो उस दर्द को दबाने के लिए उन्होंने और ज्यादा सुपारी चूसना शुरू कर दिया. ज्यादा सुपारी चूसने से दांत और तेजी से सड़ने लगे. इस तरह वो न चाहते हुए भी दर्द और लत के एक जानलेवा लूप में फंस गए.
इंसानी इतिहास और विकास को देखने का बदला नजरिया
ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी और इंडोनेशिया के वैज्ञानिकों की इस खोज ने इतिहास के पन्नों को नए सिरे से लिखने पर मजबूर कर दिया है. ये रिसर्च बताती है कि नशीले पौधों का इस्तेमाल इंसान की सोच और जिंदगी का हिस्सा बहुत पुराना है.
आज से 25,000 साल पहले जब इंसान सिर्फ पत्थरों के औजार बनाता था, गुफाओं में रहता था और जानवरों का शिकार करता था, तब भी वो अपने शारीरिक दर्द को कम करने और मूड बदलने के लिए कुदरत की चीजों का इस्तेमाल करना सीख चुका था. इस खोज से साफ हो गया है कि हमारी आज की कई आदतें और लत असल में हजारों साल पुरानी परंपराओं की ही देन हैं.



