Bharatpur News: डिजिटल दौर में दम तोड़ रही बहुरुपिया कला, कभी गांव-गांव गूंजती थी कलाकारों की आवाज

Last Updated:September 08, 2026, 11:47 IST
Bharatpur News: भरतपुर के ब्रज क्षेत्र में कभी मेलों, धार्मिक आयोजनों और गांवों की गलियों की रौनक बढ़ाने वाली बहुरुपिया कला अब अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. राजा-महाराजा, साधु-संत और देवी-देवताओं का रूप धरकर लोगों का मनोरंजन करने वाले कलाकारों की जगह अब मोबाइल, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने ले ली है.
भरतपुर. राजस्थान की लोक संस्कृति और परंपराएं देशभर में अपनी अलग पहचान रखती हैं. इन्हीं परंपराओं में शामिल है बहुरुपिया कला, जो कभी गांव-गांव और शहरों की गलियों में लोगों के मनोरंजन का प्रमुख साधन हुआ करती थी. बहुरुपिए अलग-अलग किरदारों का रूप धारण कर अपनी अदाकारी, संवाद और हाव-भाव से लोगों का मनोरंजन करते थे लेकिन बदलते समय के साथ इस पारंपरिक लोककला के सामने अब अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है.
भरतपुर के ब्रज क्षेत्र में भी बहुरुपिया कला का लंबे समय से खासा प्रभाव रहा है. मेलों, धार्मिक आयोजनों और गांवों के सार्वजनिक कार्यक्रमों में बहुरुपियों का पहुंचना लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र हुआ करता था. कलाकार कभी राजा-महाराजा, कभी साधु-संत तो कभी देवी-देवताओं और ऐतिहासिक किरदारों का रूप धारण कर लोगों के बीच पहुंचते थे, उनके अभिनय और मनोरंजक अंदाज को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हो जाते थे.
बहुरुपिया कला राजस्थान की लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा
बहुरुपिया कलाकारों की खासियत केवल उनका पहनावा या मेकअप नहीं था बल्कि किसी किरदार को पूरी तरह अपने अभिनय में उतार लेना उनकी कला का हिस्सा था. सीमित संसाधनों के बावजूद ये कलाकार अपनी प्रतिभा के दम पर लोगों को घंटों तक बांधे रखते थे यही वजह थी कि बहुरुपिया कला राजस्थान की लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई थी. हालांकि, अब मनोरंजन के साधन पूरी तरह बदल चुके हैं. मोबाइल फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया, टेलीविजन और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने लोगों के मनोरंजन का तरीका बदल दिया है. पहले जहां लोग कलाकारों को देखने के लिए घरों से बाहर निकलते थे वहीं अब मनोरंजन उनके मोबाइल स्क्रीन तक पहुंच गया है.
इसका सीधा असर बहुरुपिया कलाकारों की रोजी-रोटी और उनकी कला की लोकप्रियता पर पड़ा है. आज भी कुछ कलाकार इस परंपरा को जिंदा रखने के लिए बहुरुपिया बनकर लोगों के बीच पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें पहले जैसा दर्शकों का उत्साह और सम्मान नहीं मिल पाता. नई पीढ़ी भी इस कला से धीरे-धीरे दूर होती जा रही है. ऐसे में जरूरत है कि बहुरुपिया कला को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर राजस्थान की लोक विरासत के रूप में संरक्षित किया जाए. कलाकारों को मंच, आर्थिक सहायता और नए अवसर मिलें, ताकि यह अनोखी कला आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके, वरना कभी गांव-गांव गूंजने वाली बहुरुपियों की आवाज डिजिटल शोर में कहीं खोकर रह जाएगी.
About the Authorमोनाली पाल
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
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Bharatpur,Rajasthan
First Published :
September 08, 2026, 11:47 IST



