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Chirag Paswan | Mausam Vaigyanik | Opinion: शेर की मांद में घुसकर चिराग पासवान किसको दे रहे चैलेंज, क्या बनेंगे नए ‘मौसम वैज्ञानिक’?

Chirag Paswan Pressure Politics: लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान इन दिनों जिस अंदाज और जिस मुखरता से बतिया रहे हैं, उससे बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश छोड़ दीजिए दिल्ली तक सियासत गरमा गया है. सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों पर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या नए ‘मौसम वैज्ञानिक’ का अवतार होने वाला है? दरअसल, एक तरफ चिराग पासवान कुछ ही दिन पहले बिहार के सम्राट सरकार पर ‘शर्म’ वाला बयान दे देते हैं, और दूसरी तरफ ‘शेर’ के मांद में घुसकर शेर को दहाड़ने पहुंच जाते हैं. क्या यूपी चुनाव 2027 को लेकर चिराग पासवान का बीजेपी पर प्रेशर पॉलिटिक्स है या फिर उन्होंने पिता रामविलास पासवान की तरह हवा का रुख पहले ही भांप लिया? जानें चिराग पासवान ने क्यों कहा यूपी में 403 सीटों पर लड़ने के लिए तैयार हैं?

चिराग का बदला-बदला अंदाज बीते कुछ दिनों से मीडिया में खूब सर्खियां बटोर रहा है. उनका यह अंदाज इसलिए भी ध्यान खींच रहा है क्योंकि उनकी पार्टी केंद्र और बिहार में एनडीए का हिस्सा है. ऐसे में सरकार के खिलाफ खुलकर बोलना और साथ ही दूसरे बड़े राज्य में अपनी पार्टी का संगठन फैलाने की बात करना महज सामान्य राजनीतिक बयान नहीं माना जा रहा. राजनीतिक गलियारे में चिराग पासवान के इस बयान को कई अर्थों में लिया जा रहा है. कुछ इसे प्रेशर पॉलिटिक्स कह रहे हैं तो कुछ इसे देश में हालिया में घटित घटनाक्रम का साइड इफेक्ट के तौर पर देख रहे हैं, तो कुछ पिता के नक्शे कदम पर जाने के संकेत की तरफ देखते हैं.

एनडीए का हिस्सा रहते हुए चिराग क्यों अलग राय रखते रहे हैं?

बीजेपी को बार-बार ‘कनखी’ क्यों मार रहे हैं चिराग?

हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि चिराग पासवान एनडीए से अलग होकर या कोई नया राजनीतिक गठबंधन बनाने जा रहे हैं. लेकिन इतना जरूर है कि उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन को बिहार से बाहर भी मजबूत करने के बहाने बड़ा लकीर खींचने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन चिराग पासवान ने हाल के दिनों में बिहार की कानून-व्यवस्था को लेकर अपनी ही सरकार पर तीखे सवाल उठाए हैं. महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उन्होंने कहा कि सरकार का हिस्सा होने के नाते वह जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते और मौजूदा हालात को लेकर उन्हें शर्मिंदगी महसूस होती है.

पहले जातिगत जनगणना, लैटरल एंट्री और अब यूपी चुनाव

इससे पहले उन्होंने समस्तीपुर में लड़की से छेड़खानी के आरोपियों के खिलाफ जमुई जैसी कार्रवाई की मांग की थी और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को सीधे संबोधित करते हुए सवाल उठाया था कि बिहार पुलिस के इकबाल को आखिर क्या हो गया है. यानी चिराग अब सिर्फ विपक्ष पर हमला करने वाले नेता की भूमिका में नहीं हैं. वह सत्ता पक्ष का हिस्सा होते हुए भी सरकार से जवाब मांग रहे हैं. यही उनकी राजनीति में बदलाव का सबसे अहम संकेत माना जा सकता है.

चिराग ने एसआईआर प्रक्रिया पर भी सवाल पूछे.

सम्राट चौधरी पर सवाल क्यों महत्वपूर्ण है?

बिहार में चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी के दो मंत्री सम्राट चौधरी कैबिनेट में हैं. ऐसे में चिराग का कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर मुख्यमंत्री और सरकार को घेरना गठबंधन के भीतर अपनी अलग राजनीतिक आवाज बनाए रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है. दूसरी तरफ, चिराग की पार्टी के भीतर से उन्हें भविष्य के मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश किए जाने वाले बयान भी सामने आए हैं. यानी एक तरफ पार्टी के नेता चिराग को बिहार के अगले बड़े चेहरे के तौर पर पेश कर रहे हैं और दूसरी तरफ चिराग सरकार में रहते हुए भी सरकार से सवाल पूछ रहे हैं.

यूपी की 403 सीटों पर दावा 

मंगलवार को चिराग पासवान ने यूपी चुनाव 2027 को लेकर बड़ा बयान दे दिया है. चिराग ने कहा एलजेपी (रामविलास) यूपी चुनाव 20278 में पूरी मजबूती से लड़ेगी और पार्टी सभी 403 सीटों के लिए तैयारी कर रही है. उन्होंने साफ किया कि गठबंधन हुआ तो गठबंधन के तहत चुनाव लड़ेंगे और अगर अकेले लड़ना पड़ा तो उसके लिए भी पार्टी तैयार है. इससे एक बात साफ है, चिराग यूपी को सिर्फ प्रतीकात्मक विस्तार के तौर पर नहीं देख रहे. पार्टी संगठन को राज्य की सभी विधानसभा सीटों तक ले जाने की तैयारी की जा रही है. इससे पहले जुलाई में भी चिराग 403 सीटों पर तैयारी की बात कह चुके थे. उस समय उन्होंने यूपी के लिए ‘पंडित-पासी-पासवान’ के फॉर्मूले की बात भी की थी और ‘ए टू जेड’ को साथ लेकर चलने की रणनीति बताई थी.

‘पंडित-पासी-पासवान’ फॉर्मूले पर जीतेंगे यूपी चुनाव?

चिराग की यूपी रणनीति सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं दिखती. 28 सितंबर को प्रयागराज में उनकी पार्टी ने ‘यूथ बोले तो’ कार्यक्रम किया, जिसमें उन्होंने युवाओं से सीधा संवाद किया. पार्टी ने इसे 2027 चुनाव से पहले यूपी में अभियान की शुरुआत के तौर पर पेश किया. युवाओं के लिए पोर्टल बनाने और उनकी समस्याओं को सीधे सुनने की बात भी चिराग ने कही है.

चिराग पासवान की एलजेपीआर ने रामविलास पासवान और कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग की

मायावती की कमी को यूपी में पूरा करने का सपना

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है. बीएसपी की राजनीतिक पकड़ कमजोर होने के बाद कई दलित-केंद्रित पार्टियां यूपी में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं. इनमें चिराग पासवान की भी शामिल हैं. लेकिन चिराग की चुनौती यह है कि यूपी की दलित राजनीति में पहले से मायावती और चंद्रशेखर आजाद जैसे प्रमुख चेहरे मौजूद हैं. ऐसे में चिराग अगर यूपी में उतरते हैं तो उन्हें सिर्फ पासवान वोट तक सीमित रहने के बजाय दूसरे सामाजिक समूहों में भी अपनी जगह बनानी होगी. यही वजह है कि उनका ‘ए टू जेड’ और ‘पंडित-पासी-पासवान’ वाला फॉर्मूला महत्वपूर्ण हो जाता है.

क्या BJP से दूरी बनाने का संकेत है?

चिराग बीजेपी या एनडीए से दूरी बनाने जा रहे हैं? उन्होंने यूपी में भी साफ कहा है कि गठबंधन हुआ तो गठबंधन के तहत चुनाव लड़ेंगे. लेकिन उनकी राजनीति में एक बात जरूर दिखाई दे रही है कि वह गठबंधन के भीतर रहते हुए अपनी अलग पहचान बनाए रखना चाहते हैं. बिहार में कानून-व्यवस्था पर सरकार को घेरना और यूपी में स्वतंत्र रूप से सभी सीटों की तैयारी की बात करना इसी दिशा में देखा जा सकता है. हाल में उन्होंने चुनाव आयोग को लेकर भी सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए और संवैधानिक संस्था से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की थी. इस रुख को भी एनडीए के कुछ अन्य सहयोगियों की तुलना में अपेक्षाकृत स्वतंत्र राजनीतिक लाइन के तौर पर रिपोर्ट किया गया है.

चिराग के हालिया तेवरों को बिहार की राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता.

बिहार में सीएम नहीं बनने का ‘टीस’

चिराग के हालिया तेवरों को बिहार की राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता. उनकी पार्टी के नेताओं ने चिराग को भविष्य का मुख्यमंत्री बनाने की बात कही है. लेकिन बिहार की मौजूदा सत्ता संरचना और एनडीए के भीतर नेतृत्व का सवाल अलग विषय है. इसलिए यह कहना कि चिराग को मुख्यमंत्री न बनाए जाने की ‘टीस’ के कारण ही वह यूपी का रुख कर रहे हैं. हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि चिराग अपनी पार्टी को सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रखना चाहते. उनकी नजर अब एक साथ बिहार की सत्ता की राजनीति और यूपी के बड़े राजनीतिक बाजार पर दिखाई दे रही है.

कुलमिलाकर चिराग के बयानों को केवल एक जुमला नहीं माना जा सकता. इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति नजर आ रही है. चिराग पासवान के बिहार में जन सुराज के प्रशांत किशोर से भी रिश्ते अच्छे हैं. दोनों कई मौकों पर एक दूसरे के दोस्त बोल चुके हैं. दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर चर्चाएं शुरू हो गईं हैं कि चिराग भी अपने पिता की तरह ‘मौसम वैज्ञानिक’ बनने जा रहे हैं. दरअसल एलजेपी संस्थापक रामविलास पासवान को आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने ‘मौसम वैज्ञानिक’ का उपाधि दी थी. लालू यादव ने एक बार कहा था कि रामविलास पासवान को पहले ही पता चल जाता है, जहाज अब डूबने वाला है और वह उसको छोड़कर चले जाते हैं. हाल के दिनों में केंद्र सरकार में मंत्री रहते हुए भी चिराग पासवान का यह तेवर दिखाना और बीजेपी की शर्तों पर चलने वाले ‘जूनियर पार्टनर’ नहीं होने का दम भरना क्या कुछ और लक्षण है?

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