Rajasthan

बिना अनुमति पीपल लगाया तो लगता था ₹50 का भारी जुर्माना

Last Updated:July 09, 2026, 16:53 IST

Bikaner Tree Plantation History: तत्कालीन बीकानेर रियासत में वर्ष 1946-47 में धार्मिक आस्था की आड़ में होने वाले भूमि अतिक्रमण और विवादों को रोकने के लिए एक अनोखा कानून लागू किया गया था. इसके तहत सरकारी या उससे सटी जमीन पर बिना प्रशासनिक अनुमति के पीपल का पौधा लगाने पर 50 रुपये का जुर्माना लगता था, जो उस दौर में एक बड़ी राशि थी. पौधरोपण के लिए तहसीलदार के पास आवेदन करना होता था और 30 दिनों में अनुमति मिलती थी. यह नियम तत्कालीन बीकानेर दरबार की दूरदर्शी प्रशासनिक सोच और पर्यावरण संतुलन का एक बड़ा उदाहरण है.

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Bikaner: आज के आधुनिक समय में पर्यावरण संरक्षण और हरियाली को बढ़ावा देने के लिए सरकार और आम जनता द्वारा अधिक से अधिक पौधे लगाने की अपील की जाती है. इसके विपरीत राजस्थान के बीकानेर शहर का इतिहास इस मामले में बेहद अनोखा और दिलचस्प रहा है. आज से करीब 80 साल पहले तत्कालीन बीकानेर रियासत में पीपल जैसे अत्यंत पूजनीय और धार्मिक महत्व वाले वृक्ष के पौधरोपण के लिए भी बकायदा स्पष्ट नियम और कड़े कानूनी प्रावधान निर्धारित थे. वर्ष 1946-47 के दौरान बीकानेर दरबार ने ऐसे नियम लागू किए थे, जिसके तहत बिना अनुमति पीपल लगाने पर 50 रुपये का आर्थिक दंड भुगतना पड़ता था, जो उस दौर में एक बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी.

राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी एवं प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. नितिन गोयल ने इस ऐतिहासिक कानून के पीछे की मुख्य वजहों का खुलासा किया है. सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म में पीपल के वृक्ष को भगवान विष्णु का साक्षात स्वरूप माना जाता है. इसकी पूजा, जल अर्पण और परिक्रमा करने का विशेष धार्मिक महत्व है. इसी आस्था का फायदा उठाकर उस दौर में कुछ चालाक लोग सरकारी भूमि या उससे सटी जमीनों पर पीपल का पौधा लगा देते थे, ताकि भविष्य में धार्मिक आस्था की आड़ लेकर उस पूरी जगह पर अपना अवैध अधिकार या अतिक्रमण जमा सकें. इस वजह से समाज में भूमि विवाद तेजी से बढ़ने लगे और कई बड़े झगड़े सीधे बीकानेर दरबार की चौखट तक पहुंचने लगे. इसके बाद खुद आम जनता ने भी दरबार से मांग की कि पीपल के पौधरोपण को लेकर कोई सुव्यवस्थित नियम बनाए जाएं. जनता की इसी मांग और प्रशासनिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए बीकानेर दरबार ने वर्ष 1946-47 में विधिवत रूप से नए नियम और कानून लागू किए.

30 दिनों में मिलती थी अनुमति, नियम तोड़ने पर था ₹50 का भारी जुर्मानाबीकानेर दरबार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी राजकीय भूमि या फिर अपनी किसी ऐसी निजी जमीन पर पीपल का पौधा लगाना चाहता था, जिसकी सीमा सरकारी भूमि से सटी हुई हो, तो उसे सबसे पहले संबंधित तहसीलदार के कार्यालय में एक लिखित आवेदन प्रस्तुत करना होता था. आवेदन मिलने के बाद प्रशासन आसपास के लोगों से आपत्तियां मांगता था और 30 दिनों के भीतर इस पर अंतिम निर्णय लेना अनिवार्य था. यदि इस निर्धारित अवधि में किसी भी प्रकार की कोई वैध आपत्ति नहीं आती थी, तभी व्यक्ति को पौधरोपण की कानूनी अनुमति प्रदान की जाती थी.

प्रशासनिक नियमों को कड़ाई से लागू करने के लिए बीकानेर दरबार ने इसमें भारी आर्थिक दंड का भी प्रावधान जोड़ा था. यदि कोई व्यक्ति इस निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना या चोरी-छिपे पीपल का पौधा लगाता था, तो उस पर 50 रुपये का जुर्माना लगाया जाता था. उस जमाने में 50 रुपये की कीमत इतनी अधिक थी कि लोग डर के मारे नियमों का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं करते थे और पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करने के लिए बाध्य रहते थे.

धार्मिक आस्था और दूरदर्शी प्रशासनिक सोच का अद्भुत समन्वयडॉ. नितिन गोयल के अनुसार तत्कालीन बीकानेर रियासत की यह अनूठी व्यवस्था केवल भूमि पर नियंत्रण रखने तक ही सीमित नहीं थी. इसका मुख्य उद्देश्य पीपल जैसे पवित्र वृक्ष की धार्मिक गरिमा और पवित्रता को बनाए रखना, भविष्य में होने वाले बड़े भूमि विवादों को समय रहते रोकना और पर्यावरण को सुव्यवस्थित तरीके से संवर्धित करना भी था. करीब आठ दशक पुराने ये ऐतिहासिक अभिलेख इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि बीकानेर के शासक उस दौर में भी पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और कानूनी व्यवस्था के प्रति कितने अधिक गंभीर और दूरदर्शी थे. आज जब देश भर में बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान चलाए जा रहे हैं, तब बीकानेर के इतिहास का यह गौरवशाली अध्याय पर्यावरण और प्रशासनिक संतुलन का एक अत्यंत प्रेरक उदाहरण पेश करता है.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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