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जालोर की ‘हाथी घास’ I rajasthan news I Jalore news I

Last Updated:June 29, 2026, 19:36 IST

जालोर जिले में भीषण गर्मी और चारे की कमी के बीच किसानों के लिए हाथी घास (नेपियर घास) एक बड़ी राहत बनकर उभरी है. यह घास 12 से 16 फीट तक ऊँची होती है और एक बार लगाने के बाद कई वर्षों तक लगातार हरा चारा देती रहती है. इसकी खासियत है कि हल्की सिंचाई में भी यह तेजी से फिर से हरी हो जाती है. पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं, जिससे दूध उत्पादन में बढ़ोतरी होती है. किसानों का कहना है कि इससे चारे की लागत कम हुई है और पशुपालन अधिक लाभदायक बन गया है.

जालोर. जिले में इन दिनों एक खास तरह की घास किसानों और पशुपालकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है. यह है प्राकृतिक हाथी घास, जिसे नेपियर घास भी कहा जाता है. भीषण गर्मी और चारे की कमी के बीच यह घास किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं मानी जा रही है. जहां एक तरफ गर्मी के मौसम में ज्यादातर हरा चारा सूख जाता है, वहीं हाथी घास अपनी मजबूत जड़ों के कारण दूसरी घासों के मुकाबले ज्यादा टिकाऊ रहती है. थोड़ी सिंचाई मिलने पर यह जल्दी फिर से हरी हो जाती है और लगातार चारा देती रहती है. इस घास की सबसे बड़ी खासियत इसकी ऊंचाई और उत्पादन क्षमता है. यह घास 12 से 16 फीट तक ऊंची हो सकती है, और इसकी पत्तियां लंबी व चौड़ी होती हैं, यही वजह है कि इसे लोकल भाषा में “हाथी घास” कहा जाता है.

जालोर के किसान बलवंत ने लोकल18 को बताया कि…यह घास मीठी और पौष्टिक होती है, जिससे पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं. इसे खिलाने से गाय और भैंसों को भरपूर पोषण मिलता है, जिससे उनका स्वास्थ्य बेहतर रहता है और दूध उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है. किसानों के लिए एक और बड़ी राहत यह है कि इस घास को एक बार लगाने के बाद करीब 8 से 10 साल तक बार-बार बुवाई की जरूरत नहीं पड़ती. कटाई के बाद यह फिर तेजी से उग जाती है, जिससे लगातार चारे की उपलब्धता बनी रहती है और लागत भी कम हो जाती है.

पहले गर्मी में चारे की बहुत दिक्कत होती थी, लेकिन अब हमने हाथी घास लगाई है तो काफी फायदा मिला है. एक बार लगाने के बाद बार-बार बोना नहीं पड़ता और पशु भी इसे बहुत पसंद करते हैं। इससे दूध भी पहले से ज्यादा मिल रहा है. गर्मी के इस मौसम में जहां हरियाली ढूंढना मुश्किल हो जाता है, वहीं जालोर के खेतों में लहलहाती यह हाथी घास किसानों के लिए बहुत ही फायदेमंद और उपयोगी साबित हो रही है. जालोर के किसान अब पारंपरिक चारे की जगह इस प्राकृतिक घास को तेजी से अपना रहे हैं। इससे न केवल चारे की समस्या कम हो रही है, बल्कि पशुपालन भी ज्यादा लाभदायक बनता जा रहा है.

About the AuthorMonali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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