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Jeera Price: नागौर में औंधे मुंह गिरे जीरे के दाम, किसानों को अब सता रहा भारी नुकसान का डर, मंडियों में पसरा सन्नाटा!

Nagaur-Merta Mandi Jeera Bhav Today 2026: राजस्थान के नागौर जिले सहित पूरे मारवाड़ क्षेत्र में जीरे के बाजार भावों में लगातार आ रही गिरावट ने स्थानीय किसानों की चिंता को बहुत अधिक बढ़ा दिया है. इस बार किसानों ने सीजन की शुरुआत में बेहतर दाम मिलने की बड़ी उम्मीद लगाई थी. इसी मुनाफे की चाह में उन्होंने अपनी उपज का एक बड़ा हिस्सा मंडियों में तुरंत बेचने के बजाय भविष्य के लिए गोदामों में स्टॉक कर लिया था. किसानों को पूरी उम्मीद थी कि आने वाले समय में मांग बढ़ेगी और उन्हें अपनी फसल का अच्छा मुनाफा मिल सकेगा. हालांकि, बाजार में लगातार छाए मंदी के बादलों ने उनकी इन उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है. पिछले कुछ ही समय के भीतर जीरे के भाव 2 से 5 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक नीचे गिर चुके हैं, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति पर सीधा और गहरा असर पड़ा है.

नागौर जिले की प्रसिद्ध मेड़ता मंडी में जीरे की कीमतों में आई इस अप्रत्याशित गिरावट ने किसानों की परेशानी को और ज्यादा बढ़ा दिया है. आंकड़ों पर नजर डालें तो अप्रैल महीने में जो जीरा 24 हजार रुपए प्रति क्विंटल से अधिक की ऊंची कीमत पर बिक रहा था, वही जीरा अब घटकर महज़ 16 हजार से 21 हजार रुपए प्रति क्विंटल के बीच सिमट कर रह गया है. यानी बीते कुछ ही महीनों के भीतर जीरे के दामों में 4 से 5 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक की भारी गिरावट दर्ज की जा चुकी है. स्थानीय किसानों का कहना है कि डीजल, मजदूरी और खाद समेत खेती की कुल लागत लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन बाजार में फसल का उचित और लाभकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा. इसके चलते कभी बंपर कमाई देने वाली और मुख्य नकदी फसल माने जाने वाली जीरे की खेती अब किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित होने लगी है.

अंतरराष्ट्रीय तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित होने से थमा निर्यातकृषि क्षेत्र के जानकारों और बड़े व्यापारियों का मानना है कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का सीधा और नकारात्मक असर भारतीय जीरे के बाजार पर देखने को मिल रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते राजनयिक तनाव के साथ-साथ ईरान और इजरायल के बीच जारी सैन्य संघर्ष के कारण प्रमुख समुद्री व्यापार मार्ग और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन पूरी तरह प्रभावित हुई है. इसके चलते भारत से विदेशों में होने वाला जीरे का निर्यात काफी धीमा पड़ गया है. पहले जिन यूरोपीय और खाड़ी देशों में भारी मात्रा में भारतीय जीरा भेजा जाता था, वहां अब वैश्विक मंदी और सुरक्षा कारणों से मांग बेहद कमजोर हो गई है. निर्यात ठप होने का यह सीधा असर अब भारत के घरेलू बाजारों पर भी साफ दिखने लगा है, जहां खरीदार कम होने से कीमतें लगातार टूट रही हैं.

तुर्की और सीरिया से मिल रही कड़ी टक्कर, खाड़ी देशों ने मोड़ा मुंहभारतीय जीरे की विदेशी मांग फिलहाल कुछ चुनिंदा पड़ोसी देशों तक ही सिमट कर रह गई है. मंडियों के व्यापारियों के अनुसार वर्तमान समय में केवल नेपाल, बांग्लादेश और चीन जैसे देशों से ही भारतीय जीरे की कुछ मांग बनी हुई है. दूसरी तरफ सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ओमान जैसे समृद्ध खाड़ी देशों ने इस बार भारत से जीरे की खरीद में भारी कटौती कर दी है. इसकी सबसे प्रमुख वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय जीरे की अपेक्षाकृत अधिक कीमत होना बताया जा रहा है. इन खाड़ी देशों ने अब भारत के बजाय तुर्की और सीरिया जैसे देशों से सस्ता जीरा खरीदना शुरू कर दिया है. प्रतिस्पर्धी देशों से मिल रही इस कड़ी टक्कर के कारण भारतीय निर्यात नेटवर्क और स्थानीय किसानों की आय दोनों ही बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

पिछले पांच वर्षों में जीरे के भावों का उतार-चढ़ाव: एक नजर मेंअगर पिछले पांच वर्षों के बाजार आंकड़ों का विश्लेषण करें तो जीरे के भावों में हमेशा से ही अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. वर्ष 2022 में जीरा औसतन 17 हजार से 25 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक बिका था. इसके बाद वर्ष 2023 में इसकी कीमतों ने इतिहास रचते हुए और सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए 50 हजार रुपए प्रति क्विंटल का जादुई आंकड़ा पार कर लिया था. इस ऐतिहासिक तेजी को देखकर किसानों का रुझान इसकी तरफ बहुत बढ़ा. हालांकि, इसके बाद वर्ष 2024 और 2025 में भाव फिर से अपने सामान्य स्तर पर लौट आए. अब वर्ष 2026 में कीमतें और ज्यादा गिरकर 16 से 21 हजार रुपए प्रति क्विंटल के निचले स्तर तक पहुंच गई हैं, जिससे किसानों को उनकी उम्मीद के विपरीत बेहद कम आय प्राप्त हो रही है.

प्रति बीघा भारी लागत और कम उत्पादन ने बढ़ाई किसानों की कमरतोड़ मुसीबतजीरे की खेती बेहद संवेदनशील मानी जाती है और इसमें प्रति बीघा आने वाली लागत भी काफी अधिक होती है, जो किसानों की रातों की नींद उड़ा रही है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, एक बीघा जीरे की फसल को पूरी तरह तैयार करने में बुवाई, जैविक व रासायनिक खाद, उन्नत बीज, निराई-गुड़ाई, विभिन्न रोगों से बचाव के लिए कीटनाशक दवाओं के बार-बार छिड़काव और 3 से 5 बार की महंगी सिंचाई सहित लगभग 14 से 15 हजार रुपए तक का नकद खर्च आ जाता है. इतनी भारी लागत और कड़ी मेहनत के बावजूद मौसम की अनिश्चितताओं के बीच प्रति बीघा औसतन केवल 2 से 3 क्विंटल ही वास्तविक उत्पादन मिल पाता है. ऐसे में यदि बाजार भाव इसी तरह लगातार नीचे बने रहे, तो किसानों के लिए अपनी मूल लागत निकालना भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है.

नागौर के सुगंधित जीरे की देश-दुनिया में है मांग, अब सुधार का इंतजारमेड़ता और नागौर जिले में पैदा होने वाला जीरा अपनी बेहतरीन गुणवत्ता और खास स्वाद के कारण न केवल राजस्थान प्रदेश में, बल्कि पूरे देश और दुनिया के बाजारों में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, इस क्षेत्र की विशेष काली मिट्टी और जलवायु में पैदा होने वाला जीरा अन्य क्षेत्रों के मुकाबले कहीं अधिक सुगंधित और औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है. जीरा इस क्षेत्र के ग्रामीण जनजीवन के लिए एक अहम नकदी फसल है, जिससे हर वर्ष हजारों परिवारों की आर्थिक गाड़ी चलती है. लेकिन इस बार सीजन के बीच में आई भारी गिरावट ने किसानों की उम्मीदों को करारा झटका दिया है. अब नागौर के पीड़ित किसान और स्थानीय व्यापारी दोनों ही घरेलू मांग में तेजी आने और अंतरराष्ट्रीय निर्यात के रास्ते दोबारा सुगम होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं ताकि जीरे के भावों में फिर से उछाल आ सके.

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